मणिमाला शर्मा
ब्लर्बरू ष्जब देश के मेधावी युवा नीट जैसी परीक्षा के अंतहीन घोटालों, अदालती अनिश्चितताओं और लचर परीक्षा तंत्र से तंग आकर बारहवीं पास करते ही देश छोड़ने लगें, तो यह केवल एक परीक्षा की नाकामी नहीं है। यह अंडरग्रेजुएट ब्रेन ड्रेनश् हमारी समूची प्रशासनिक साख और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।
देश में जब भी कोई परीक्षा का पेपर लीक होता है तो परीक्षा रद्द हो जाती हैं; फिर से जांच के आदेश दिए जाते हैं, तो मुख्यधारा की मीडिया में केवल दो ही बातें गूंजती हैं,श्मास्टरमाइंड की गिरफ्तारीश् और दोबारा परीक्षा की तारीख। लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिप जाता है जो देश के भविष्य को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। अब नीट परीक्षा के इस अंतहीन तमाशे और बार-बार होने वाले पेपर लीक ने अब भारत में एक नए किस्म के पलायन को जन्म दे दिया है, जिसे हम अंडरग्रेजुएट ब्रेन ड्रेन कह सकते हैं। अब तक देश का युवा डॉक्टर बनने के बाद विदेश जाता था, लेकिन अब इस सड़े हुए परीक्षा तंत्र से तंग आकर देश के मेधावी छात्र बारहवीं पास करते ही भारत छोड़ रहे हैं। वे नीट के इस अनिश्चित और भ्रष्ट दलदल में अपनी उम्र के सबसे कीमती साल बर्बाद करने के बजाय, रूस, कजाकिस्तान या यूरोपीय देशों से डॉक्टरी की पढ़ाई करना बेहतर समझ रहे हैं। नीट पेपर लीक होना सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि यह देश के उस भरोसे का टूटना है जो एक छात्र अपनी व्यवस्था पर करता है।
अब तक पूर्ण रूप से दो बार 2015 और 2026 में नीट पेपर लीक होने के कारण मेडिकल एंट्रेंस परीक्षा को रद्द कर दिया गया है। यह कोई पहली बार नहीं हुआ इससे पूर्व नीट 2016, नीट 2021 और नीट 2024 में भी आंशिक रूप से या स्थानीय स्तर पर पेपर लीक होने की आशंका जताई गई थी लेकिन धाँधली को केवल कुछ सेंटर्स या सीमित छात्रों तक ही फैला माना गया और परीक्षा रद्द नहीं की गई। सरकारें डॉक्टरों की कमी का रोना तो हमेशा रोती रहती हैं, लेकिन उनका यही लचर और नाकाम परीक्षा तंत्र आज देश की सबसे बेहतरीन प्रतिभाओं को अपनी ही मातृभूमि से विमुख कर विदेशी धरती पर धकेल रहा है। देश के भीतर चिकित्सा व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण का दम भरने वाला शासन क्या इस कड़वे सच पर आत्ममंथन करने का साहस दिखाएगा कि उसने अपनी ही नई पीढ़ी को इस कदर बेगाना और विरक्त कर दिया है?
इस चौंकाने वाले पलायन, जनता के आक्रोश और व्यवस्था की गिरती साख को तात्कालिक रूप से बचाने के लिए सरकार ने आनन-फानन में संसद से द पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट फ़रवरी 2024 में पारित कर इसे 21 जून 2024 को पूरे देश में लागू कर दिया गया था। कागजों पर यह कानून बेहद क्रूर और सख्त दिखाई देता है, जिसमें एक करोड़ रुपये तक का भारी-भरकम जुर्माना और दस साल तक की कठोर जेल का प्रावधान है। लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-नियंताओं की आँखों में आँखें डालकर आज यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि इस कानून के लागू होने के बाद भी क्या देश के परीक्षा माफियाओं और उनके राजनीतिक आकाओं में कोई वास्तविक खौफ पैदा हुआ है?
क्या इस तथाकथित कड़े कानून के तहत अब तक किसी एक भी बड़े शिक्षा माफिया, साठगांठ करने वाले शीर्ष अधिकारियों या प्रश्नपत्र बेचने वाले संगठित सिंडिकेट के सरगना को ऐसी अनुकरणीय सजा मिली है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नजीर बन सके?
सच तो यह है कि आज तक इस देश में किसी बड़े परीक्षा घोटाले के मास्टरमाइंड को रिकॉर्ड समय में न तो सलाखों के पीछे सड़ाया गया है और न ही उनकी संपत्तियां कुर्क करके कोई कड़ा संदेश दिया गया है। इतिहास गवाह है कि जब तक कानून केवल फाइलों की शोभा बढ़ाते हैं और धरातल पर गिरफ्तारियों के रस्म-ओ-रिवाज के बाद भी हर साल पर्चे लीक होते रहते हैं, तब तक यह पूरी कवायद केवल एक प्रशासनिक नौटंकी और जनता के गुस्से को शांत करने वाला इवेंट ही साबित होती है। सरकारें अपराधियों को सलाखों के पीछे दिखाने का विज्ञापन तो करती हैं, लेकिन ढीली चार्जशीट और कमजोर पैरवी के चलते वही अपराधी कुछ महीनों बाद जमानत पर बाहर आकर फिर से नया पेपर लीक करने की स्क्रिप्ट लिख रहे होते हैं।
इस समय केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की टीमें देश के कोने-कोने में छापेमारी कर रही हैं। हर दूसरे दिन अखबारों में सुर्खियां छपती हैं कि फलां राज्य से कोई मास्टरमाइंड पकड़ा गया, किसी के बैंक खाते सीज हुए, तो किसी सॉल्वर गैंग का भंडाफोड़ हुआ। लोग पकड़े जा रहे हैं, कड़ियां जोड़ी जा रही हैं, लेकिन इन सबके बीच देश का युवा मन एक गहरी आशंका और अविश्वास से भरा हुआ है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या वाकई यह समूची जांच अपने तार्किक अंजाम तक पहुँचेगी? या फिर हर बार की तरह यह भी एक सामयिक तमाशा बनकर रह जाएगी?
हमारे शासन तंत्र का अनुभव बताता है कि जैसे ही मीडिया का शोर थमेगा, टीवी चौनलों की प्राइम-टाइम बहसें किसी नए राजनीतिक विवाद की ओर मुड़ेंगी और अखबारों के पन्ने पलटेंगे, वैसे ही इस पूरे मामले को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया जाएगा। जब जनता की याददाश्त धुंधली पड़ने लगेगी, तब पर्दे के पीछे बैठे असली सफेदपोश मगरमच्छ, जिन्होंने इस पूरे खेल में अरबों रुपये कमाए हैं, साफ बचकर निकल जाएंगे। पकड़े सिर्फ मोहरे जाएंगे, वजीर और बादशाह हमेशा की तरह महफूज रहेंगे। शासन को यह जवाब देना होगा कि क्या उसके पास इस जांच को केवल हेडलाइन मैनेजमेंट से आगे ले जाकर परीक्षा तंत्र का शुद्धिकरण करने की वास्तविक राजनीतिक इच्छाशक्ति है?
यही ढुलमुल रवैया और नीतिगत खोखलापन सुधारात्मक कमेटियों के हश्र में भी साफ दिखाई देता है। परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित, आधुनिक और पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट समय पर सौंप दी थी, जिसमें 101 अत्यंत महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी सिफारिशें थीं। कमेटी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि शारीरिक रूप से प्रश्नपत्रों को ट्रकों और गाड़ियों में ढोना बंद किया जाए और हाइब्रिड मॉडल अपनाया जाए, जिसके तहत परीक्षा से ऐन वक्त पहले पेपर सीधे परीक्षा केंद्रों की डिजिटल स्क्रीन पर भेजे जाएं और वहीं प्रिंट हों। कमेटी ने यह भी कहा था कि 24 लाख बच्चों का पेन-एंड-पेपर टेस्ट एक ही शिफ्ट में कराना सुरक्षा के लिहाज से आत्मघाती है, इसलिए इसे मल्टी-सेशन और कंप्यूटर आधारित किया जाए।
मगर विडंबना देखिए कि शासन ने इन 101 सिफारिशों को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया। नतीजा क्या हुआ, सभी के सामने है ? सरकारी लापरवाही और ढर्रे के कारण नीट की परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक का सिलसिला थमा नहीं है और अंततः लाखों बच्चों के भविष्य को अधर में लटकाते हुए पुनः परीक्षाओं को टालना या रद्द करना पड़ा। जब देश के सबसे बड़े वैज्ञानिक की कमेटी की रिपोर्ट को भी सरकार कचरों के डिब्बे में डाल देती है, तो यह साबित होता है कि व्यवस्था सुधारना सरकार की प्राथमिकता में है ही नहीं। यह कमेटी भी पूर्व में बनी दर्जनों कमेटियों की तरह सिर्फ एक और सरकारी रिपोर्ट बनकर पुस्तकालयों की धूल चाटती रही, और इसकी कीमत देश के निर्दाेष बच्चों को परीक्षा तंत्र की नाकामी के मानसिक आघात से चुकानी पड़ी।
इस नीतिगत और प्रशासनिक विफलता की सबसे कारुणिक और हृदयविदारक कीमत उस मध्यमवर्गीय परिवार को चुकानी पड़ती है, जिसके जीवन का संघर्ष सत्ता के वातानुकूलित कमरों में बैठे हाकिमों को कभी नजर नहीं आता। उस घर की दहलीज पर कदम रखकर देखिए जहाँ बेटे या बेटी के कमरे की मेज पर अभी भी आधी खुली हुई किताबें, मार्कर और नोट्स पड़े हैं, लेकिन आँखों के आगे पसरे घने अंधेरे के कारण पढ़ाई रुक चुकी है। उस माँ के भीतर की चीख को सुनिए जिसने अपने गहने गिरवी रखकर कोचिंग की मोटी फीस भरी थी, और उस पिता के आंसुओं का हिसाब लगाइए जिसने अपनी पुश्तैनी जमीन का एक टुकड़ा सिर्फ इसलिए बेच दिया ताकि उसका बच्चा समाज में सिर उठाकर कह सके कि वह “डॉक्टर” बनने जा रहा है।
भारत की मेडिकल कोचिंग इंडस्ट्री, जिसका सालाना कारोबार आज 60,000 से 75,000 करोड़ रुपये के बीच पहुँच चुका है, स्कूलों को श्डमीश् संस्थाओं में बदलकर एक समानांतर, अनियंत्रित और शोषक व्यवस्था बन चुकी है। ग्यारहवीं और बारहवीं की सामान्य, जीवंत स्कूली ज़िंदगी को खत्म करके हमने एक पूरी पीढ़ी के सामाजिक और मानसिक विकास की बलि चढ़ा दी है। हमने बच्चों को संवेदनशील इंसान बनाने के बजाय केवल एक मल्टीपल चॉइस क्वेश्चन को हल करने वाले और रैंक की अंधी दौड़ में दौड़ने वाले रोबोट में तब्दील कर दिया है। सबसे ज्यादा मार उन गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि की मेधावी छात्राओं पर पड़ती है, जिनकी पढ़ाई रुकने का मतलब सिर्फ एक साल का नुकसान नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव में उनकी शादी कर दिए जाने या उनके सपनों का हमेशा के लिए दफन हो जाना होता है।
अगर ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब इस पूरे संकट का सबसे भयावह, आत्मघाती और दूरगामी असर देश की भावी चिकित्सा व्यवस्था की गुणवत्ता और जन-स्वास्थ्य पर पड़ेगा। जो छात्र इस भीषण मानसिक आघात, व्यवस्था के प्रति उपजे गहरे आक्रोश, अवसाद और श्बिकाऊ तंत्रश् के साए में अपनी मेडिकल की पढ़ाई शुरू करेगा, वो भविष्य में मरीजों के प्रति अपना कैसा दृष्टिकोण रखेगा? जब एक पूरी पीढ़ी अपनी आँखों के सामने योग्यता का कत्ल होते देखेगी और यह सीखकर बड़ी होगी कि इस देश में ईमानदारी की कोई कीमत नहीं है बल्कि रसूख, पैसा और जैक-चेक ही अंतिम सत्य हैं, तो उस डॉक्टर से एक श्सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनशील मसीहाश् बनने की उम्मीद करना ही बेमानी है। जिसने खुद तंत्र के हाथों आर्थिक और मानसिक शोषण झेला हो, वह डॉक्टर बनने के बाद सबसे पहले अपनी उस पूंजी और उस प्रताड़ना का ब्याज वसूलने की कोशिश करेगा। यह चक्र देश के स्वास्थ्य ढांचे को पूरी तरह से संवेदनहीन, अनैतिक और व्यावसायिक बनाने की ओर धकेलेगा, जिसकी अंतिम परिणति गरीब मरीजों की मौत और बर्बादी में होगी।
दरअसल, समस्या केवल एक परीक्षा केंद्र पर हुई चूक या किसी एक राज्य के पेपर लीक की नहीं है। यह श्वन नेशन, वन एग्जामश् के उस केंद्रीकृत और त्रुटिपूर्ण ढांचे की बुनियादी समस्या है, जिसमें देश के करोड़ों छात्रों का पूरा भविष्य, उनकी बरसों की तपस्या, एक ही दिन के चंद घंटों की परीक्षा पर टिका दी गई है। यह मॉडल अपने आप में गहरी क्षेत्रीय और आर्थिक असमानता पैदा करता है। अमीर और साधन संपन्न परिवारों के बच्चे महंगे कोचिंग संस्थानों में पढ़कर इस सिस्टम को क्रैक कर लेते हैं, जबकि ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि का मेधावी छात्र शुरुआत से ही इस दौड़ में पिछड़ जाता है।
इसलिए, समाधान भी अब सतही या कॉस्मेटिक नहीं हो सकते। दोषियों को जेल भेजना तो केवल शुरुआत है, असली काम परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से इतना अभेद्य बनाना है कि उसमें परिंदा भी पर न मार सके। एक ही परीक्षा पर देश की निर्भरता को कम करने के लिए साल में मल्टीपल अटेम्प्ट और बारहवीं के अंकों के वैकल्पिक मूल्यांकन जैसे हाइब्रिड विकल्पों पर अब नीतिगत स्तर पर गंभीरता से विचार करना ही होगा। इसके साथ ही, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को वर्तमान ढांचे से मुक्त कर संसद के अधीन एक स्वायत्त और पूर्णतः जवाबदेह संस्था बनाना होगा, जैसा कि देश के कई शिक्षाविद मांग कर रहे हैं।
यह राष्ट्रीय संकट हमें एक बेहद कड़वी और नग्न सच्चाई के सामने खड़ा करता है। जब देश के सबसे मेधावी युवा को यह लगने लगे कि उसकी ईमानदारी, उसकी रात-दिन की मेहनत और उसकी योग्यता के बावजूद परिणाम पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं होगा, तब वह केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं हारता।वह इस देश की समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायपालिका और संविधान पर से अपना विश्वास खो देता है। और जब लाखों युवा एक साथ अपनी ही मातृभूमि पर यह विश्वास खोने लगें, तो यह केवल शिक्षा विभाग का संकट नहीं रहता, यह राष्ट्र के अस्तित्व और उसके भविष्य का संकट बन जाता है। आज असली परीक्षा उन मजबूर छात्रों की नहीं है, बल्कि इस देश को चलाने वाले शासकों की साख, नीयत और उनके इकबाल की है। अगर यह खोया हुआ भरोसा तुरंत वापस नहीं लाया गया, तो अगली परीक्षा चाहे जब हो, वह केवल एक कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगी। और जिस समाज में शिक्षा और न्याय केवल एक औपचारिकता बन जाएं, वहाँ देश का भविष्य केवल एक संयोग बनकर रह जाता है, कोई गौरवशाली नियति नहीं।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
