डॉ. नीरज भारद्वाज
पहाड़ देखने में बहुत सुंदर और शांत होते हैं। इनका आकर्षण किसी को भी अपनी ओर खींच लेता है। दुनिया के किसी भी साहित्य को उठाकर देख ले उनमें पहाड़ों को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है। कामायनी की शुरुआत तो हिमालय के उत्तुंग शिखर पर बैठे हुए व्यक्ति से ही होती है। पहाड़ी जीवन वास्तव में बहुत शांत होता है। वहां रहने वाले लोग धीरे और मधुर बोलते हैं। साधारण जीवन में रहकर प्रकृति को निहारते रहते हैं, उसकी सेवा करते हैं। प्राकृतिक आपदाओं को भी यहां के लोग झेलते हैं। फिर भी अपनी मस्ती में मस्त जीवन में रहते हैं। प्रकृति के सौंदर्य की बात करते हैं तो उसमें भी पहाड़ अपना विशेष स्थान रखते हैं।
जब कोई व्यक्ति कहीं विशेष कार्य कर लेता है या कठिन कार्य कर लेता है। उसके लिए कुछ मुहावरें भी प्रयोग होते हैं, क्या तुमने पहाड़ तोड़ दिया? या फिर क्या पहाड़ उठा लिया? आदि प्रयोग होते हैं। विचार करें तो दशरथ मांझी ने तो पहाड़ तोड़ ही दिया और उसके बीच से रास्ता भी बनाया। इस दृष्टि से असाधारण या कठिन कार्य, जीवन में कोई न कोई एक दो लोग कर ही लेते हैं।कोई भी कार्य किसको कितना कठिन और सरल लगता है, यह तो उन सब की अपनी सोच की बात है।
पहाड़ों के प्रति आकर्षण और सौंदर्य का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि हमारे देवी-देवताओं का साधना स्थल या कथा स्थल पहाड़ ही रहे हैं। हमारे देवी-देवता जितने समतल में रमे हैं, उतने ही वह पहाड़ों में भी रमे हैं। वहीं उनकी समाधि और कथा का स्थान है। अमरनाथ गुफा के दर्शन करने लोग जाते हैं। केदारनाथ धाम, बदरीनाथ धाम आदि के दर्शन करने लोग जाते हैं। आज भी ऊंचे पहाड़ों की चोटी पर बैठे साधना करनेवाले बहुत सारे संत-महात्मा मिल जायेंगे। जंगलों, पहाड़ों में एकांतवासी बैठे यह पूज्य आत्माएँ अपनी साधना में व्यस्त हैं।
बदलते युग में अब पहाड़ों के प्रति लोगों की दृष्टि और दृष्टिकोण बदल गए हैं। अब पहाड़ों पर शांति नहीं, लोग अशांति और गंदगी फैलाने ज्यादा जाते दिखाई दे रहे हैं। महानगरों पर भीड़ का दबाव अधिक है। नगरों और महानगरों का झंझावात लोगों को धीरे-धीरे खा रहा है। तनाव, घुटन, संत्रास, कलह आदि को दूर करने के लिए व्यक्ति छुट्टी होते ही पहाड़ों की ओर हो लेते हैं। पहाड़ों पर संकरा, घुमावदार, दुर्गम, पतला रास्ता होने के चलते ट्रैफिक बंधकर चलता है। वहां सरपट गाड़ी दौड़ाने का काम नहीं है। साधन, सुविधा और व्यवस्था कम होने के चलते लोगों की भीड़ एक साथ बढ़ जाती है।
पहाड़ों पर भी महानगरों की भीड़ का दबाव दिखाई देने लगता है। सारी व्यवस्था चरमारा जाती है। पहाड़ों पर घंटों-घंटों का जाम लग जाता है, लोग परेशान दिखाई देते हैं। महानगरों का जाम पहाड़ों पर दिखाई देता है। शांत पहाड़ों में अशांति आप ही प्रकट हो जाती है। चारों ओर लोगों की भीड़ दिखाई दे जाती है। पर्यटन के नाम पर बहुत बार लोग गलत हरकतें करते हैं। नदियों को गंदा करते हैं, पहाड़ों को गंदा करते हैं। शांति की जगह पर भी दौड़ती गाड़ियों का शोर और उनका धुआं पहाड़ों को अव्यवस्थित कर देता है। जंगली जीव-जंतु भी बेचौन नजर आते हैं। गाड़ियों की हलचल, रोशनी,आवाज, कोलाहल केवल छुट्टियों के दिनों में ही ज्यादा दिखाई देता है, अन्य सामान्य दिनों में नहीं।
कुछ लोग तीर्थ दर्शन, स्नान, संत दर्शन, कथा सुनने आदि के लिए पहाड़ों पर जाते हैं। लेकिन उसकी आड़ में कितने ही अव्यवहारिकऔर बुराई पैदा करने वाले लोग भी आजाते हैं। एक ऐसी भीड़ दिखाई देती है कि उसमें किसे ठीक और किसे गलत माने। यह भी सोचने की बात है। पहाड़ पर सामान्य जीवन जीने वाले लोगों का जीवन इस अव्यवस्था और एकदम उमड़ी भीड़ के चलते कठिन हो जाता है। शांति अशांति में बदल जाती है।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
