गौतम चौधरी
आगामी 30 मई यानी आने वाला कल, चंडीगढ़ में “पिंड बचाओ, पंजाब बचाओ मंच” द्वारा एक सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सहित पंजाब और चंडीगढ़ में सक्रिय लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को आमंत्रित किया गया है। यह आयोजित सेमिनार केवल एक क्षेत्रीय राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। इस सेमिनार में “संघीय ढांचा, राज्यों की स्वायत्तता, संवैधानिक वादे, शक्तियों का विकेंद्रीकरण और चुनौतियाँ” विषय पर गंभीर विमर्श होने की संभावना बतायी जा रही है। यह संवाद वस्तुतः उस गहरे राजनीतिक द्वंद्व की अभिव्यक्ति है, जिससे आज पूरा भारतीय संघ गुजर रहा है। पंजाब के पानी, कृषि, अर्थव्यवस्था और पंजाबी पहचान के प्रश्नों से शुरू होने वाली यह बहस अंततः भारतीय लोकतंत्र की प्रकृति तक पहुँच जाती है।
दिलचस्प यह है कि यह विमर्श ऐसे समय में सामने आ रहा है, जब एक ओर केंद्र में अभूतपूर्व केंद्रीकरण की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है और दूसरी ओर विश्व राजनीति में बहुध्रुवीयता तथा वैकल्पिक शक्ति-संरचनाओं की चर्चा तेज हो रही है। लेकिन विडंबना यह है कि जो भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और ग्लोबल साउथ की बात करता है, वही भारत अपने भीतर लगातार अधिक केंद्रीकृत राजनीतिक-प्रशासनिक ढाँचे की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
यहीं से भारतीय संघवाद का संकट शुरू होता है। पंजाब में यह प्रश्न नया नहीं है। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव से लेकर चंडीगढ़, नदी जल बंटवारे और कृषि नीतियों तक, पंजाब लंबे समय से अधिक स्वायत्तता और संघीय संतुलन की मांग उठाता रहा है। यद्यपि इन मांगों को अनेक बार अलगाववाद या संकीर्ण क्षेत्रीयता के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि केंद्र-राज्य संबंधों का प्रश्न केवल पंजाब का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय संघ का प्रश्न है।
आज दक्षिण भारत के अनेक राज्य वित्तीय संघवाद पर सवाल उठा रहे हैं। पूर्वाेत्तर अपनी सांस्कृतिक और प्रशासनिक स्वायत्तता को लेकर चिंतित है। संसाधनों, भाषा, शिक्षा, कृषि और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर राज्यों और केंद्र के बीच तनाव बढ़ता दिखाई देता है। ऐसे में चंडीगढ़ का यह सेमिनार वस्तुतः भारतीय संघीय ढाँचे पर पुनर्विचार की मांग बन जाता है।
यहां स्पष्ट कर दें कि केंद्रीकरण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता; वह अंततः राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्न भी बन जाता है। जब राज्यों को यह महसूस होने लगे कि उनकी आर्थिक, भाषाई और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं पर केंद्र की राजनीतिक इच्छा हावी हो रही है, तब संघवाद केवल संवैधानिक शब्द नहीं रहता, बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का आधार बन जाता है।
इसी संदर्भ में “पिंड बचाओ, पंजाब बचाओ मंच” द्वारा प्रस्तावित “राज्यों के अधिकारों का घोषणा-पत्र” विशेष महत्व रखता है। यह केवल पंजाब के अधिकारों की बात नहीं है, बल्कि उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या भारत वास्तव में सहकारी संघवाद की दिशा में आगे बढ़ रहा है या एक अत्यधिक केंद्रीकृत राष्ट्र-राज्य में बदलता जा रहा है।
भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता और बहुलता में रही है। यदि राज्यों की स्वायत्तता, भाषाई-सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक अधिकारों को लगातार कमजोर किया गया, तो इसका प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी दिखाई देगा।
इतिहास बताता है कि स्थायी और मजबूत राष्ट्र वही बनते हैं, जो विविधताओं को सम्मान देकर एकता निर्मित करते हैं, न कि केंद्रीकरण और एकरूपता को अंगीकार करता है। संभवतः 30 मई 2026 को चंडीगढ़ के केन्द्रीय श्रीगुरु सिंह सभा में आयोजित प्रस्तावित यह सेमिनार कई मुद्दों पर केन्द्रित है। इसका केन्द्रीय विषय जो भी हो लेकिन सेमिनान उपयोगी होने वाला है।
