BRICS : वर्तमान वैश्विक परिदृष्य में कहां खड़ा है भारत?

BRICS : वर्तमान वैश्विक परिदृष्य में कहां खड़ा है भारत?

विश्व राजनीति के बदलते परिदृश्य में ब्रिक्स आज केवल एक आर्थिक मंच नहीं रह गया है। यह उस वैश्विक असंतोष की अभिव्यक्ति बन चुका है, जो पश्चिमी वर्चस्व, डॉलर-प्रधान वित्तीय व्यवस्था और अमेरिकी नेतृत्व वाली विश्व संरचना के विरुद्ध उभर रहा है। लेकिन इसी के साथ एक गंभीर प्रश्न भी उठ रहा है, क्या भारत वास्तव में ब्रिक्स की मूल राजनीतिक दिशा के साथ खड़ा है, या वह इस मंच के भीतर एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में अमेरिकी हितों की अप्रत्यक्ष रक्षा कर रहा है?

यह प्रश्न अचानक पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे भारत की वर्तमान विदेश नीति, ब्रिक्स मुद्रा पर उसका रुख, चीन के प्रति उसकी आशंकाएँ और अमेरिका के साथ उसकी बढ़ती सामरिक निकटता जैसी अनेक मुद्दे हैं। इतिहास की ओर देखें तो एक दिलचस्प समानता दिखाई देती है। शीतयुद्ध के दौर में भारत औपचारिक रूप से गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता था, लेकिन व्यवहारिक राजनीति में उसका झुकाव सोवियत संघ की ओर स्पष्ट दिखाई देता था। विशेषकर इंदिरा गांधी के दौर में भारत की विदेश नीति ने अनेक मौकों पर सोवियत रणनीतिक हितों के अनुकूल भूमिका निभायी। गुटनिरपेक्षता की भाषा के बावजूद भारत वस्तुतः सोवियत धुरी के सबसे प्रभावशाली साझेदारों में बदल चुका था।

आज परिस्थितियाँ भिन्न अवश्य हैं, लेकिन कुछ समानताएँ फिर उभरती दिख रही हैं। अंतर केवल इतना है कि इस बार भारत प्रत्यक्ष रूप से किसी धुरी में शामिल नहीं है, बल्कि वह बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की भाषा बोलते हुए ब्रिक्स के भीतर एक “मॉडरेटिंग फोर्स” की भूमिका निभाता दिखाई देता है। ब्रिक्स के भीतर रूस और चीन अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक पश्चिम-विरोधी रुख रखते हैं। डॉलर के विकल्प, वैकल्पिक भुगतान तंत्र और साझा मुद्रा जैसे विचार उसी दिशा का हिस्सा हैं। लेकिन भारत इन सभी प्रश्नों पर लगातार सावधानीपूर्ण और सीमित रुख अपनाता रहा है। भारत न तो खुलकर डी-डॉलराइजेशन की राजनीति का समर्थन करता है और न ही वह ब्रिक्स को एक कठोर अमेरिकी-विरोधी मंच में बदलने देने के पक्ष में दिखाई देता है।

यहीं से वह धारणा जन्म लेती है कि ब्रिक्स के भीतर भारत की भूमिका कहीं न कहीं अमेरिकी रणनीतिक हितों के लिए उपयोगी बन रही है। भारत की उपस्थिति इस मंच को पूर्णतः चीन-रूस केंद्रित धुरी बनने से रोकती है। यही कारण है कि अमेरिका भी भारत को लेकर उतनी असहजता नहीं दिखाता, जितनी रूस या चीन को लेकर दिखती है। दरअसल, भारत की वर्तमान विदेश नीति का केंद्रीय तत्व “रणनीतिक स्वायत्तता” कम और “रणनीतिक संतुलन” अधिक दिखाई देता है। भारत एक साथ क्वाड में भी है और ब्रिक्स में भी; अमेरिका का रणनीतिक साझेदार भी है और रूस से रक्षा सहयोग भी बनाए हुए है। यह बहुस्तरीय कूटनीति भारत को लचीलापन अवश्य देती है, लेकिन साथ ही उसकी वैचारिक स्पष्टता को धुंधला भी करती है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भारत ब्रिक्स से हासिल क्या करना चाहता है? यदि उद्देश्य केवल वैश्विक मंचों पर उपस्थिति बनाए रखना है, तो वह लक्ष्य काफी हद तक पूरा हो रहा है। लेकिन यदि ब्रिक्स को वास्तव में पश्चिमी वर्चस्व के विकल्प के रूप में विकसित करना है, तब भारत का वर्तमान रुख उसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक माना जा सकता है। यही कारण है कि ब्रिक्स के भीतर भारत की भूमिका को लेकर दो बिल्कुल अलग धारणाएँ बन रही हैं। एक वर्ग भारत को बहुध्रुवीय संतुलन का जिम्मेदार पक्ष मानता है, जबकि दूसरा उसे उस शक्ति के रूप में देखता है जो भीतर रहकर ब्रिक्स की राजनीतिक धार को कुंद कर रहा है।

संभवतः सत्य इन दोनों के बीच कहीं स्थित है। भारत न तो पूरी तरह अमेरिकी खेमे में है और न ही वह चीन-रूस की वैकल्पिक विश्व व्यवस्था का विश्वसनीय साझेदार बन पाया है। वह फिलहाल अपने आर्थिक, सामरिक और भू-राजनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय तक “संतुलनकारी” भूमिका निभाना आसान नहीं होता। अंततः हर उभरती शक्ति को यह तय करना पड़ता है कि वह यथास्थिति की संरक्षक बनेगी या परिवर्तन की वाहक। ब्रिक्स के भीतर भारत की भूमिका को लेकर उठ रहे प्रश्न इसी ऐतिहासिक द्वंद्व की अभिव्यक्ति हैं।

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