वामपंथ/ फासीवादी एजेंडे की नई कड़ी है “असामान्य जनसांख्यिकीय बदलाव” समिति के गठन की घोषणा

वामपंथ/ फासीवादी एजेंडे की नई कड़ी है “असामान्य जनसांख्यिकीय बदलाव” समिति के गठन की घोषणा

संकटों से घिरी भाजपा लगातार धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की राजनीति में संलिप्त है। यह अब किसी से छिपा नहीं है कि जब भी केन्द्र की भाजपा-नीत एनडीए सरकार जनता के ज्वलंत सवालोंकृमहँगाई, बेरोज़गारी, आर्थिक संकट और जनअसंतोषकृसे घिरती है, तब वह विभाजन, भय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को तेज कर देती है। इसी क्रम में सरकार ने कथित “असामान्य जनसांख्यिकीय बदलाव” की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है।

2014 के बाद से यह प्रवृत्ति बार-बार दिखाई दी है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण जैसे कदमों को भी व्यापक रूप से इसी राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा गया। अब “जनसांख्यिकीय चिंताओं” के नाम पर नागरिकता और मताधिकार से जुड़े प्रश्नों को पुनः राजनीतिक बहस के केंद्र में लाया जा रहा है।

हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा को कुछ राज्यों में सफलता अवश्य मिली है, किन्तु इसके बावजूद भविष्य को लेकर उसकी बेचौनी स्पष्ट दिखाई देती है। इसके पीछे कारण भी साफ हैं। एक ओर महँगाई और बेरोज़गारी ने आम जनता का जीवन कठिन बना दिया है, वहीं दूसरी ओर कृषि संकट लगातार गहरा रहा है। खेती की बढ़ती लागत, उर्वरकों की कमी और फसलों के उचित मूल्य न मिलने से किसानों में व्यापक असंतोष है। मनरेगा के कमजोर पड़ने और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की बदतर स्थिति ने ग्रामीण संकट को और तीखा कर दिया है।

युवा वर्ग भी गहरे असंतोष में है। बार-बार पेपर लीक, परीक्षाओं का रद्द होना, रिक्त पदों पर नियुक्तियों में देरी और शिक्षा व्यवस्था की असमानताओं ने युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास को बढ़ाया है। सोशल मीडिया पर उभरे व्यंग्यात्मक राजनीतिक अभियानों की लोकप्रियता इसी बेचौनी का संकेत है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया के तनावपूर्ण हालात और वैश्विक पेट्रोलियम संकट का असर भारत में महँगाई के रूप में दिखाई दे रहा है। पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में वृद्धि ने रोजमर्रा के जीवन को और कठिन बना दिया है। रुपये की गिरती कीमत, आर्थिक असमानता और औद्योगिक सुस्ती ने स्थिति को और गंभीर बनाया है।

इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने “असामान्य जनसांख्यिकीय परिवर्तनों” की जांच के लिए समिति गठित की है। जातिगत जनगणना और उसके संभावित सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान की चिंताएँ भी इस कदम के पीछे देखी जा रही हैं। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2025 को लाल किले से अपने भाषण में “जनसांख्यिकीय बदलाव” को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि “घुसपैठ” के माध्यम से देश की जनसंरचना बदलने की कोशिश की जा रही है। इस प्रकार के वक्तव्यों को विपक्ष और लोकतांत्रिक समूहों ने समाज में भय और अविश्वास पैदा करने वाला बताया है।

आलोचकों का कहना है कि इस तरह की भाषा विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास को बढ़ाती है और अल्पसंख्यकों तथा प्रवासी आबादी को संदेह के घेरे में खड़ा करती है। इतिहास में फासीवादी और अतिराष्ट्रवादी शक्तियों ने सत्ता को मजबूत करने के लिए अक्सर “जनसांख्यिकीय खतरे”, “राष्ट्र की शुद्धता” और “आंतरिक दुश्मन” जैसे नारों का सहारा लिया है।

जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों और प्रवासियों को राष्ट्र के लिए खतरा बताया। इटली में मुसोलिनी ने राष्ट्रवादी उन्माद के माध्यम से लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों और श्रीलंका में तमिलों के विरुद्ध चलायी गयी राजनीति में भी जनसंख्या संबंधी भय का इस्तेमाल किया गया। इतिहास यह बताता है कि ऐसी राजनीति अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और सामाजिक सौहार्द को कमजोर करती है।

समिति की घोषणा ऐसे समय की गयी है जब सीमावर्ती राज्योंकृविशेषकर असम और पश्चिम बंगालकृमें “घुसपैठ” का मुद्दा लगातार राजनीतिक रूप से उछाला जाता रहा है। आलोचकों का आरोप है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और नागरिकता संबंधी अभियानों का इस्तेमाल विशेष समुदायों और वर्गों को राजनीतिक रूप से हाशिये पर धकेलने के लिए किया जा रहा है।

रोजगार की तलाश में राज्यों के बीच होने वाले आंतरिक प्रवासन को भी कई बार संदेह की दृष्टि से प्रस्तुत किया जाता है। आशंका जतायी जा रही है कि समिति की सिफारिशें भविष्य में नागरिकता और मताधिकार को लेकर कठोर नीतियों का आधार बन सकती हैं।

भारत का संविधान नागरिकता को धर्म, जाति या भाषा के आधार पर नहीं बल्कि समान अधिकारों के सिद्धांत पर परिभाषित करता है। इसलिए किसी विशेष समुदाय को “जनसांख्यिकीय खतरे” के रूप में प्रस्तुत करना संविधान की मूल भावनाकृधर्मनिरपेक्षता और समानताकृके विपरीत माना जा रहा है।

आलोचकों का मानना है कि इस प्रकार की राजनीति समाज में विभाजन को गहरा करती है और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा अत्यंत आवश्यक है।

समिति में पूर्व न्यायाधीश जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर को अध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा पूर्व नौकरशाहों, सुरक्षा तंत्र से जुड़े अधिकारियों और नीति विशेषज्ञों को सदस्य नियुक्त किया गया है। समिति को एक वर्ष में रिपोर्ट सौंपने का दायित्व दिया गया है।

विपक्षी दलों और लोकतांत्रिक समूहों का आरोप है कि समिति की संरचना और उसके अधिकार क्षेत्र से सरकार की राजनीतिक मंशा झलकती है। उनका कहना है कि समिति का उपयोग आगामी चुनावों से पहले ध्रुवीकरण की राजनीति को तेज करने के लिए किया जा सकता है।

भारत का लोकतंत्र लंबे स्वतंत्रता संघर्ष और असंख्य बलिदानों की देन है। इसलिए नागरिक अधिकारों, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द की रक्षा आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है।

जरूरत इस बात की है कि सभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील शक्तियाँ विभाजनकारी राजनीति के विरुद्ध व्यापक जनचर्चा और लोकतांत्रिक प्रतिरोध को मजबूत करें। नागरिकता, समानता और संवैधानिक अधिकारों के प्रश्नों को राजनीतिक ध्रुवीकरण से ऊपर उठाकर देखने की आवश्यकता है। यही लोकतंत्र और सामाजिक एकता की रक्षा का रास्ता है।

लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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