गौतम चौधरी
ऐसे समय में, जब समाज संदेह, अफवाहों, वैचारिक ध्रुवीकरण और परस्पर शत्रुता के कारण लगातार विभाजित होते जा रहे हैं, शांति और सामाजिक संतुलन की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। हम देख रहे हैं, दुनिया के कई देश आपस में इसलिए एक-दूसरे के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि उनकी धार्मिक मान्यता एक-दूसरे से भिन्न हैं। ऐसी परिस्थिति में हमें मानवता को उपर रखना होगा और असहमति को छोड़ स्वीकार्यता को अपनानी होगी। इस मामले में मुसलमान दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं। मुसलमानों के लिए यह जिम्मेदारी केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक नैतिक भी है। इस्लाम, जिसका मूल शब्द ही “सलाम” अर्थात शांति से निकला है, अपने अनुयायियों को जीवन के हर क्षेत्र में करुणा, धैर्य, न्याय और सौहार्द का मार्ग अपनाने की शिक्षा देता है।
दुर्भाग्य से आधुनिक सार्वजनिक विमर्श के शोर, राजनीतिक उकसावों और सोशल मीडिया की उत्तेजनात्मक संस्कृति के बीच इस्लाम का यह मूल संदेश अक्सर दब जाता है। प्रतिक्रिया, क्रोध और प्रतिशोध को शक्ति का प्रतीक मान लिया गया है, जबकि इस्लाम संयम, विवेक और नैतिक गरिमा को वास्तविक ताकत मानता है। ऐसे दौर में पवित्र कुरान और सुन्नत की मूल शिक्षाओं की ओर लौटना अत्यंत आवश्यक हो जाता है-वे शिक्षाएँ जो हमेशा संघर्ष के बजाय शांति, कलह के बजाय संवाद और अफवाह के बजाय सत्य पर जोर देती हैं।
इस मामले में मुफ्ती तुफैल खान कादरी साफ शब्दों में कहते हैं, ‘‘पवित्र कुरान, शांति को केवल एक नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि ईमान का आवश्यक हिस्सा घोषित करता है। अल्लाह फरमाता है-“रहमान के बंदे वे हैं जो धरती पर विनम्रता से चलते हैं, और जब अज्ञानी उनसे कठोरता से बात करते हैं, तो वे शांति की बातें करते हैं।” (सूरह अल-फुरकान 25ः63)
तुफैल साहब फरमाते हैं, ‘‘यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि वे द्वेष का उत्तर द्वेष से नहीं, बल्कि गरिमा और शांति से दें। आज के समय में, जब विशेषकर सोशल मीडिया पर तत्काल प्रतिक्रिया देना सामान्य प्रवृत्ति बन चुका है, यह शिक्षा अत्यंत क्रांतिकारी प्रतीत होती है। यह उकसावे के क्षणों में संयम और अराजकता के बीच विवेकपूर्ण व्यवहार का संदेश देती है।’’
आज की दुनिया में अफवाहें और अप्रमाणित सूचनाएँ सामाजिक अशांति का बड़ा कारण बन चुकी हैं। इस मामले में तुफैल खान साहब कहते हैं, ‘‘कुरान इस विषय में स्पष्ट चेतावनी देता है-‘‘ऐ ईमान वालों! यदि कोई दुष्ट व्यक्ति तुम्हारे पास कोई खबर लाए, तो उसकी जांच कर लो, कहीं ऐसा न हो कि तुम अज्ञानता में किसी को नुकसान पहुंचा बैठो और फिर अपने किए पर पछताओ।” (सूरह अल-हुजुरात 49ः6)
यह आयत आधुनिक सूचना-युग के लिए असाधारण मार्गदर्शन प्रस्तुत करती है। आज बिना सत्यापन के संदेशों को आगे बढ़ा देना सामान्य बात बन गई है, जबकि एक छोटी-सी अफवाह भी किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा नष्ट कर सकती है, सामाजिक तनाव बढ़ा सकती है और हिंसा को जन्म दे सकती है। इस्लाम ऐसी लापरवाही को स्वीकार नहीं करता, बल्कि हर व्यक्ति पर सत्य की जांच करने की नैतिक जिम्मेदारी डालता है।
तुफैल कहते हैं, ‘‘पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत भी इसी शिक्षा को और अधिक स्पष्ट करती है। उन्होंने फरमाया-“मुसलमान वह है जिसके हाथ और जुबान से लोग सुरक्षित रहें।” (सहीह अल-बुखारी)
यह हदीस बताती है कि किसी मुसलमान की पहचान केवल उसके धार्मिक कर्मकांडों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, शब्दों और सामाजिक आचरण से होती है। यदि किसी के शब्द नफरत फैलाते हैं या उसके कर्म समाज में अशांति पैदा करते हैं, तो यह इस्लामी मूल्यों के विपरीत है। मक्का में भीषण अत्याचारों और अपमानों के बावजूद पैगंबर मुहम्मद ने धैर्य, क्षमा और नैतिक दृढ़ता का मार्ग अपनाया। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि वास्तविक शक्ति आक्रामकता में नहीं, बल्कि आत्मसंयम और करुणा में निहित होती है।
तुफैल कहते हैं, ‘‘एक अन्य महत्वपूर्ण हदीस में कहा गया है-“उन लोगों में से मत बनो जिनकी अपनी कोई सोच नहीं होती, जो कहते हैं कि यदि लोग हमारे साथ अच्छा करेंगे तो हम भी अच्छा करेंगे, और यदि वे बुरा करेंगे तो हम भी बुरा करेंगे। बल्कि अपने आप को इस बात का आदी बनाओ कि यदि लोग अच्छा करें तो तुम भी अच्छा करो, और यदि वे बुरा करें तो भी तुम बुरा न करो।” (तिर्मिज़ी 200)
यह शिक्षा नैतिक स्वतंत्रता और चरित्र की ऊँचाई का आह्वान करती है। मुसलमानों को अपने आसपास की नकारात्मकता का प्रतिबिंब बनने के बजाय उससे ऊपर उठने की शिक्षा दी गई है। विशेष रूप से सामाजिक तनाव, सांप्रदायिक उकसावे या राजनीतिक ध्रुवीकरण के समय यह सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।
इसके साथ ही इस्लाम समाज में मेल-मिलाप और एकता को अत्यधिक महत्व देता है। hindi.islamonweb.net के अनुसार, ‘‘कुरान कहता है-“निस्संदेह, मोमिन आपस में भाई-भाई हैं, इसलिए अपने भाइयों के बीच सुलह करा दो, और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम पर दया की जाए।” (सूरह अल-हुजुरात 49ः10)
यह आयत केवल आंतरिक धार्मिक एकता तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी की ओर भी संकेत करती है। मुसलमानों को समाज में पुल बनने की शिक्षा दी गई है, दीवार नहीं। चाहे पड़ोस हो, कार्यस्थल हो, शैक्षणिक संस्थान हों या सार्वजनिक जीवनकृहर स्थान पर उन्हें समझ, संवाद और सद्भाव को बढ़ावा देने वाला आचरण अपनाना चाहिए।
आज जब दुनिया को डर, नफरत और विभाजन की कहानियों से प्रभावित किया जा रहा है, मुसलमानों को सचेत रूप से शांति के दूत के रूप में अपनी भूमिका को पुनः स्थापित करना होगा। इसका अर्थ अन्याय के सामने मौन रहना नहीं है, बल्कि भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय सिद्धांतों, न्याय और नैतिकता पर आधारित प्रतिक्रिया देना है। इसका अर्थ यह है कि क्रोध को अपने व्यवहार पर हावी न होने दिया जाए, बल्कि ईमान और नैतिक विवेक को मार्गदर्शक बनाया जाए।
अफवाहों से बचना, नफरत को अस्वीकार करना और उकसावे का विरोध करना कमजोरी नहीं, बल्कि इस्लामी शिक्षाओं में निहित वास्तविक शक्ति का परिचायक है। हर वह शब्द जो दया के साथ बोला जाता है, हर वह अफवाह जिसे फैलने से रोका जाता है, और हर वह क्षण जब गुस्से के बजाय धैर्य को चुना जाता है-ये सब मिलकर एक अधिक शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण समाज की नींव रखते हैं।
दुनिया को और अधिक संघर्षपूर्ण आवाज़ों की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसे दिलों की जरूरत है जो घाव भर सकें, ऐसे शब्दों की जरूरत है जो लोगों को जोड़ सकें, और ऐसे कर्मों की जरूरत है जो मानवता को प्रेरित कर सकें। मुसलमानों के लिए यही वह मार्ग है जिसकी शिक्षा उनका धर्म प्रारंभ से देता आया हैकृशांति, करुणा, सत्य और मानव गरिमा का मार्ग।
नोट : यह आलेख बरेलवी फिरके के इस्लामिक विद्वान मुफ्ती तुफैल खान की बातचीत और इंटरनेट पर उपलब्ध वैद्धिक सामग्री के आधार पर तैयार किया गया है।
