गौतम चौधरी
जब आतंकवाद इस्लाम का चादर लपेट ले तो बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है। असल में शास्त्रीय इस्लामी परंपरा इससे बिल्कुल भिन्न है। अभी हाल ही में पश्चिम अफ्रीकी देश माली में जिहादी समूहों द्वारा घातक हमले किए गए। इस हमले ने एक बार फिर एक असहज लेकिन आवश्यक प्रश्न को सामने ला खड़ा किया है-क्या इस्लाम के नाम पर की जाने वाली यह हिंसा वास्तव में इस्लाम की शिक्षाओं के अनुरूप है? एक हजार वर्षों से अधिक पुरानी इस्लामी न्यायशास्त्रीय परंपरा (फ़िक़्ह), पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं (सुन्नत) और प्रतिष्ठित विद्वानों की व्याख्याओं को देखें तो इसका उत्तर स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से नहीं है।
जेएनआईएम (JNIM), अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठन स्वयं को इस्लाम के रक्षक और न्यायपूर्ण संघर्ष के योद्धा के रूप में प्रस्तुत करते हैं लेकिन जब उनके कार्यों को कुरान, हदीस और शास्त्रीय इस्लामी कानून की कसौटी पर परखा जाता है, तो सामने आता है कि उनका रास्ता जिहाद नहीं, बल्कि जिहाद की अवधारणा का विकृत और हिंसक दुरुपयोग है।
इस्लामी युद्ध-संबंधी नियमों में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, धार्मिक साधकों और अन्य गैर-युद्धरत नागरिकों की हत्या सख्ती से प्रतिबंधित किया गया है। यह कोई आधुनिक व्याख्या नहीं, बल्कि इस्लामी परंपरा का स्थापित सिद्धांत है। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने सैन्य कमांडरों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे उन लोगों को नुकसान न पहुंचाएं जो युद्ध में भाग नहीं ले रहे हों। बाद के महान विद्वानों, जैसे इमाम नववी और इब्न कय्यिम, ने भी इन सिद्धांतों को विस्तार से दर्ज किया है।
इतना ही नहीं, शास्त्रीय इस्लामी कानून घरों को नष्ट करने, खेतों को जलाने, संपत्ति को अनावश्यक रूप से नुकसान पहुँचाने और आम लोगों में भय का वातावरण पैदा करने को भी अनुचित ठहराता है। कुरान स्वयं युद्ध की स्थिति में भी संयम और न्याय का आदेश देता है। सूरा अल-बकरा (2ः190) में सीमा-उल्लंघन से बचने की चेतावनी दी गई है, जबकि पवित्र कुरान के सूरा अल-मुमताहिना (60ः8) उन लोगों के साथ भी न्यायपूर्ण व्यवहार की शिक्षा देती है जिन्होंने युद्ध का रास्ता नहीं चुना है। यही सिद्धांत इस्लामी युद्ध-नीति की नैतिक आधारशिला हैं। Al-Nawawi ने ‘शरह सहीह मुस्लिम’ में स्पष्ट लिखा कि महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों, अंधों, साधुओं और अन्य गैर-युद्धरत लोगों को जानबूझ कर निशाना बनाना निषिद्ध है। उसी प्रकार Ibn Qayyim al-Jawziyya ने अपनी पुस्तक, ‘अहकाम अहल अल-ज़िम्मा’ और अन्य रचनाओं में युद्ध के दौरान अनावश्यक विनाश और गैर-युद्धरतों को नुकसान पहुँचाने की निंदा की है। यही नहीं एक और मुस्लिम विद्वान, Muhammad ibn al-Hasan al-Shaybani की प्रसिद्ध कृति ‘अस-सियर अल-कबीर’ (al-Siyar al-Kabir) को इस्लामी अंतरराष्ट्रीय कानून का शुरुआती ग्रंथ माना जाता है। इसमें युद्ध, संधियों और नागरिकों की सुरक्षा पर विस्तृत चर्चा मिलती है।
इस्लामी इतिहास में विद्वानों ने एक ऐसे भटके हुए समूह की पहचान की थी जिसे ‘खवारिज’ कहा गया। यह समूह अपने ही साथी मुसलमानों को काफ़िर घोषित कर उनकी हत्या को वैध ठहराता था। पैगंबर ने ऐसे लोगों के उभरने की चेतावनी देते हुए कहा था कि वे कुरान का पाठ तो करेंगे लेकिन उसकी उसकी व्याख्या शैतानी तरीके से करेंगे। आज के कई उग्रवादी संगठन इसी मानसिकता को दोहराते दिखाई देते हैं। ‘तकफ़ीर’ अर्थात दूसरों को धर्मत्यागी घोषित करने की प्रवृत्ति के माध्यम से वे मुसलमानों, विद्वानों, सैनिकों और आम नागरिकों तक को निशाना बनाते हैं। नाम और परिस्थितियाँ बदल गई हैं लेकिन सोच वही है जिसकी चौदह शताब्दियों से मुख्यधारा के इस्लामी विद्वान आलोचना करते आ रहे हैं।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शास्त्रीय इस्लामी न्यायशास्त्र में सशस्त्र जिहाद कभी भी किसी व्यक्ति या छोटे समूह की निजी स्वार्थ योजना का हिस्सा नहीं रहा। कोई भी व्यक्ति स्वयं युद्ध की घोषणा कर दे, सोशल मीडिया के माध्यम से अनुयायी जुटाए और धर्म के नाम पर हिंसा शुरू कर दे-इस अवधारणा का इस्लामी परंपरा में कोई वैध आधार नहीं मिलता। इस मामले में इस्लामिक विद्वान तुफैल खान कादरी कहते हैं, ‘‘जिहाद की घोषणा का अपना एक विधान है। उसी विधान के तहत जिहाद की घोषणा की जाती है। कोई व्यक्ति या समूह जिहाद की घोषणा नहीं कर सकता।’’
इसके विपरीत, इस्लाम, शांति समझौतों, संघर्ष विराम और कूटनीतिक व्यवस्थाओं को अत्यंत महत्व देता है। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम द्वारा हुदैबिया की संधि को स्वीकार करना इसका ऐतिहासिक उदाहरण है। उन्होंने तत्काल राजनीतिक लाभ या युद्ध-गौरव के बजाय मानव जीवन और सामाजिक स्थिरता को प्राथमिकता दी। इस दृष्टि से शांति स्थापित करना कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानी जाती है।
फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि ऐसे संगठन युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कैसे कर लेते हैं। इसका उत्तर केवल धर्म में नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में छिपा है। गरीबी, राजनीतिक निराशा, पहचान का संकट, अशिक्षा और सामाजिक उपेक्षा जैसी परिस्थितियाँ कट्टरपंथी भर्ती के लिए उर्वर जमीन तैयार करता है। उग्रवादी समूह, इन्हीं वास्तविक समस्याओं का लाभ उठाकर हिंसा को धार्मिक कर्तव्य का रूप देने में सफल हो जाते हैं।
इस चुनौती का सामना केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं किया जा सकता। मुस्लिम समुदायों, धार्मिक विद्वानों, शिक्षकों और नागरिक समाज को मिलकर इस वैचारिक छल का पर्दाफाश करना होगा। जिन लोगों ने इस्लामी परंपरा का गंभीर अध्ययन किया है, उनकी आवाज़ इस संघर्ष में सबसे अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली हो सकता है। भारत जैसे देश में अन्य समुदाय के लोगों को भी इसमें हिस्सा लेना चाहिए।
अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहना ठीक रहेगा कि इस्लाम के नाम पर की जाने वाली हिंसा, चाहे उसका निशाना मुसलमान हों या गैर-मुसलमान, न तो शहादत है और न ही जिहाद। जिस परंपरा का प्रतिनिधित्व करने का दावा ये संगठन करते हैं, उसी परंपरा की दृष्टि में उनका आचरण एक गंभीर और दंडनीय अपराध है। शास्त्रीय ग्रंथ इस विषय पर स्पष्ट हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि यह स्पष्टता उन सभी स्थानों तक पहुँचे जहाँ निराशा, असुरक्षा और भ्रम को हिंसा में बदलने की कोशिश की जा रही है।
