गौतम चौधरी
बिहार के नालंदा के खंडहरों में घूमते हुए अधिकांश लोग ईंट-पत्थरों, स्तूपों और टूटी हुई दीवारों को देखते हैं। कुछ लोग वहाँ प्राचीन विश्वविद्यालय की भव्यता खोजते हैं। कुछ लोग उसके विनाश की कथा सुनाने को बेताब हो जाते हैं। क्या नालंदा का वह भ्रग्नावशेष केवल इतना ही है कि उससे भी आगे है? नालंदा की वास्तविक कहानी न तो केवल उसकी स्थापना की है और न ही उसके विनाश की। इन तमाम कथाओं से बहुत आगे है, नालंदा का वह खंडहर।
नालंदा की कहानी एक ऐसे बौद्धिक आदर्श की कहानी है जिसकी शुरुआत संभवतः बुद्ध के महान शिष्य सारिपुत्र से होती है और जो लगभग एक हजार वर्षों तक एशिया के सबसे बड़े ज्ञान-केंद्र के रूप में विकसित होती है। नालंदा का इतिहास सारिपुत्र से प्रारंभ होता है। यह कहानी ब्राह्मण और श्रवण परंपरा के एकात्म की कहानी भी है, जिसे आज बेहद विभत्स पटकथा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह केवल एक विश्वविद्यालय की कहानी नहीं है। यह उस प्रश्न की कहानी है कि क्या कोई सभ्यता ज्ञान को सत्ता और धर्म से ऊपर रख सकती है।
सारिपुत्र बुद्ध के सबसे विद्वान शिष्य थे। भगवान से खुद कहा, ‘‘जिस दिशा में सारिपुत्र गए उस दिशा में तथागत को जाने की जरूरत नहीं है।’’ बौद्ध परंपरा उन्हें ‘प्रज्ञा में सर्वाेच्च’ कहती है। वे चमत्कारों के नहीं, तर्क और विवेक के प्रतिनिधि थे। सारिपुत्र का जन्म नालंदा के निकट किसी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। चूंकि उनकी माता का नाम सारि था और वे अपनी मां से बहुत प्रेम करते थे, इसीलिए उन्हें सारिपुत्र के नाम से जाना गया। संभवतः यही कारण है कि बाद की पीढ़ियों ने नालंदा को केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि ज्ञान की भूमि के रूप में देखना शुरू किया।
बुद्ध के अनेक शिष्यों में सारिपुत्र विशेष इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने बौद्ध धर्म को केवल आस्था नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे बौद्धिक अनुशासन का रूप दिया। शायद नालंदा की आत्मा यहीं से जन्म लेती है।
पाँचवीं शताब्दी में जब नालंदा महाविहार विकसित होकर महाविद्यालय का स्वरूप ग्रहण किया, तब वह केवल बौद्ध भिक्षुओं का आश्रम नहीं था। वहाँ दर्शन पढ़ाया जाता था। व्याकरण पढ़ाया जाता था। चिकित्सा पढ़ाई जाती थी। तर्कशास्त्र पढ़ाया जाता था। खगोलशास्त्र पढ़ाया जाता था। विदेशी भाषाओं का अध्ययन होता था। चीन, कोरिया, तिब्बत, सुमात्रा और मध्य एशिया से छात्र वहाँ ज्ञान प्राप्त करने आते थे।
आज हम विश्वविद्यालय को आधुनिक संस्था मानते हैं लेकिन नालंदा उस समय विश्वविद्यालय था जब यूरोप में अधिकांश आधुनिक विश्वविद्यालयों का जन्म भी नहीं हुआ था। नालंदा की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी? इस प्रश्न का उत्तर देना साधारण नहीं है। यदि सामान्य शब्दों में कहें तो, उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी इमारतें नहीं थीं। उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी-विवाद।
ज्ञान वहाँ श्रद्धा से नहीं, बहस से प्राप्त होता था। किसी विद्यार्थी को प्रवेश से पहले कठोर मौखिक परीक्षा देनी पड़ती थी। कहा जाता है कि प्रवेश पाने वाले छात्रों का प्रतिशत बहुत कम था। नालंदा की प्रतिष्ठा उसके पुस्तकालयों से कम और उसके बौद्धिक अनुशासन से अधिक निर्मित हुई थी।
लेकिन इन तमाम खूबियों के बाद भी नालंदा का वह ज्ञान केन्द्र समाप्त क्यों हो गया? लोकप्रिय कथा कहती है कि एक इस्लामिक आक्रमणकारी, बख्तियार खिलजी ने उसे जलाकर राख कर दिया। सच पूछिए तो यह आंशिक सत्य है। नालंदा को बाहरी आक्रमणों से क्षति पहुँची, इसमें संदेह नहीं लेकिन इतिहास का बड़ा प्रश्न यह है कि कोई संस्था केवल बाहरी आक्रमण से नष्ट नहीं होती। जब कोई सभ्यता अपने ज्ञान संस्थानों को जीवित रखने की सामाजिक शक्ति खो देती है, तभी बाहरी आक्रमण निर्णायक बनते हैं।
क्या बौद्ध धर्म पहले ही राजनीतिक संरक्षण पर अत्यधिक निर्भर हो चुका था? क्या बौद्धिक जीवन समाज से कटने लगा था? क्या विश्वविद्यालय राजाश्रय पर इतना निर्भर हो गया था कि उसके बिना टिक नहीं सका? ये प्रश्न आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय हैं।
आज हम नालंदा पर गर्व तो करते हैं लेकिन क्या हम उसकी मूल भावना को समझते हैं? हम उसके खंडहर बचाना चाहते हैं लेकिन क्या हम उसकी बौद्धिक संस्कृति बचाना चाहते हैं? नालंदा की महानता इसलिए नहीं थी कि वहाँ एक विशेष धर्म पढ़ाया जाता था। उसकी महानता इसलिए थी कि वहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता थी। वहाँ किसी ज्ञान को अंतिम सत्य नहीं माना जाता था। वहाँ विचारों की परीक्षा होती थी। वहाँ बहस होती थी। वहाँ तर्क का सम्मान था।
अब नालंदा के साथ थोड़ा सारिपुत्र की विरासत पर भी चर्चा करना उचित होगा। सारिपुत्र से लेकर नालंदा तक की यात्रा हमें एक गहरी बात सिखाती है। सभ्यताएँ मंदिरों, महलों और सेनाओं से महान नहीं बनतीं। वे महान बनती हैं जब वे ऐसे संस्थान बनाती हैं जहाँ लोग बिना भय के प्रश्न पूछ सकें। नालंदा की सबसे बड़ी विरासत उसकी ईंटें नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी विरासत वह बौद्धिक साहस है जिसने ज्ञान को श्रद्धा का नहीं, जिज्ञासा का विषय बनाया। और शायद यही वह विरासत है जिसकी आज भारत को सबसे अधिक जरूरत है।
