ज्ञान चंद पाटनी
धर्मेंद्र प्रधान के केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफे और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की घोषणा के बाद कई प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक तरफ जेन-जी की सक्रियता, साहस और बेबाकी की खुलकर सराहना हो रही है तो दूसरी तरफ उनके प्रदर्शन के तौर-तरीकों, शब्दों, मीम्स और सार्वजनिक व्यवहार पर गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं। आंदोलन का तो पटाक्षेप हो गया है लेकिन इसे लेकर विभिन्न मंचों पर बहस लगातार बनी हुई है।
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को महज कुछ दिनों का परिणाम नहीं माना जा सकता। इसके पीछे वर्षों से जमा असंतोष है। जब लोग यह मानने लगें कि उनकी शिकायतों की अनदेखी की जा रही है। जब परीक्षा प्रणाली, भर्ती प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्था में गड़बड़ियां सामने आने के बावजूद जवाबदेही से बचने की कोशिश की जाए और मर्यादित आलोचना की अनदेखी की जाती है, तब आक्रोश पनपने लगता है। यह जब मौका पाकर फूट जाता है, तब जेन-जी जैसा आंदोलन सामने आता है।
कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन ऐसे लोगों की आवाज भी बना जो खुद लंबे समय से मौन थे। बहुत से लोग थक चुके थे, कुछ डर के कारण चुप थे और कुछ ने यह मान लिया था कि अब कुछ बदलने वाला नहीं। ऐसे माहौल में जेनकृजेड की बेखौफ आवाज, उनकी ऊर्जा और निडरता से लोग प्रभावित हुए। उनको लगा कि व्यवस्था से सवाल किए जा सकते हैं। सरकार जवाबदेही से बच नहीं सकती। यह विरोध पारंपरिक विपक्षी राजनीति से अलग था। यह एक तरह से स्वतरू स्फूर्त आंदोलन बन गया था, जिसमें भावनात्मक तीव्रता अधिक थी।
इसी के साथ एक गंभीर नैतिक प्रश्न भी सामने आया। क्या केवल अच्छा उद्देश्य होना काफी है? आंदोलन न्याय के लिए था, क्या इसलिए उसकी भाषा और आचरण को नजरअंदाज कर दिया जाए? जवाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों में छिपा है। उनका साफ मानना था कि साध्य चाहे कितना ही पवित्र हो, साधन भी पवित्र होना चाहिए। यदि किसी प्रदर्शन में अश्लील, अपमानजनक या असभ्य भाषा का इस्तेमाल किया जाए तो उससे आंदोलन की नैतिक शक्ति कमजोर होती है। इसी कारण जेन-जी के आंदोलन के दौरान इस्तेमाल किए गए शब्दों, इशारों और मीम्स पर सवाल उठ रहे हैं।
यह बात भी स्वीकार करनी होगी कि ऐसी भाषा अचानक पैदा नहीं हुई। भाषा सामाजिक परिवेश से बनती है। यदि घर, स्कूल, विश्वविद्यालय, मीडिया और राजनीति मिलकर जब एक संयमित संवाद संस्कृति नहीं बना पाते, तो युवा वही भाषा अपनाते हैं जो उन्हें सबसे तेज, सबसे प्रभावी और सबसे ध्यानाकर्षक लगती है। फिर डिजिटल क्रांति भी इसके लिए जिम्मेदार है। मीम, ट्रोलिंग, रील और वायरल कंटेंट ने विरोध को एक नए माध्यम दिया। पहले जो बात लंबे भाषण से कही जाती थी, अब वह एक तस्वीर, एक कैप्शन या एक व्यंग्यात्मक पोस्ट के जरिए कही जाती है। इसमें समस्या नहीं है। समस्या तब होती है जब गरिमा का ध्यान नहीं रखा जाता।
सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। सत्ता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि सत्ता संवेदनशील हो, जनता की बात सुनने को तैयार हो और शांतिपूर्ण विरोध की अनदेखी न करे, तो विरोध अपेक्षाकृत संयमित रहता है। हर विरोध का पहला रूप उग्र नहीं होता। बहुत बार शुरुआत शांतिपूर्ण अपील, ज्ञापन, धरना, मार्च या प्रतीकात्मक प्रतिरोध से ही होती है। जब इन माध्यमों को लगातार अनदेखा किया जाए, तब निराशा बढ़ती है। जब सरकारें या सत्ता समर्थक तंत्र बार-बार यह संकेत दें कि मर्यादित विरोध से कुछ नहीं होगा। जब आलोचना का उपहास किया जाए या उसे प्रशासनिक सख्ती से दबाया जाए, तब विरोधी स्वर अधिक तीखे हो जाते हैं। अपनी मांगों की तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसे आपत्तिजनक शब्दों और प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए मर्यादा के टूटने का जिम्मा अकेले आंदोलनकारियों पर नहीं डाला जा सकता। यह सत्ता की भी विफलता है।
सरकारों को यह समझना होगा कि हर विरोध उसका अपमान नहीं होता। विरोध तो सुधार का अवसर देता है। यदि सरकारें अपनी आलोचना को हार की तरह लें और विरोधियों को शत्रु मानने लगे तो मर्यादा का प्रश्न गौण हो जाता है। प्रतिशोध सत्ता को अलोकतांत्रिक राह पर धकेलता है। फिर संवाद की जगह दंड का इस्तेमाल किया जाता है। यह रवैया लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाता है। लोकतंत्र में सत्ता की मनमानी रोकना भी जरूरी होता है। यह काम विपक्ष ही नहीं, नागरिक समाज भी करता है। यदि विपक्ष की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन जाए, उसे कमजोर समझा जाए या उसका उत्पीड़न किया जाए, तो हालात बिगड़ते हैं। जिस शासन में विपक्ष की भूमिका खत्म करने की कोशिश की जाती है, वहां असंतोष को बाहर निकलने के लिए दूसरे रास्ते खोज लिए जाते हैं। ऐसे आंदोलन अधिक आक्रामक, अधिक असंगठित और कई बार अधिक अमर्यादित हो जाते हैं। इसलिए लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए सत्ता को विपक्ष की मौजूदगी स्वीकार करनी होगी। विपक्ष का दमन लोकतंत्र का दमन माना जाना चाहिए।
आंदोलन के दौरान नजर आई जेन-जी की भाषा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, न ही सराहा जा सकता है। जेन-जी में ऊर्जा है, साहस है, रचनात्मकता है लेकिन साथ ही अतिरेक और असंयम भी है। युवाओं को भी यह समझना होगा कि साहस और असभ्यता एक नहीं हैं। बेबाकी और अपमान एक नहीं हैं। सवाल पूछना अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक मर्यादा का उल्लंघन करना लोकतांत्रिक अधिकार नहीं बन जाता। जेन-जी की ऊर्जा भारत के लिए एक संपत्ति है, लेकिन इस संपत्ति को अनुशासन, वैचारिक स्पष्टता और संयम की आवश्यकता है। इसके बावजूद सरकार अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
