गौतम चौधरी
देश, समाज, राष्ट्र #उग्रवाद #चुनौती #समाधान #शांतिपूर्ण और लचीले समाज का निर्माण
तेजी से बदलती दुनिया में उग्रवाद केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक स्थिरता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। तकनीकी प्रगति, वैश्विक संपर्क और सूचना के तीव्र प्रवाह के इस युग में उग्रवादी विचारधाराएं पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से फैल जाते हैं। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि उग्रवाद का मुकाबला केवल पुलिस, सेना या कठोर कानूनों के सहारे नहीं किया जा सकता। स्थायी समाधान उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को संबोधित करने में निहित है जो कट्टरपंथी विचारों को आकर्षण और प्रभाव प्रदान करती हैं।
भारत जैसे बहुलतावादी समाज के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है। धर्म, भाषा, संस्कृति और जातीय विविधताओं से परिपूर्ण इस देश ने लंबे समय से यह अनुभव किया है कि शांति केवल सुरक्षा अभियानों से स्थापित नहीं की जा सकती। सुरक्षा उपाय तत्काल खतरों को नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन वे अकेले उन कारणों को समाप्त नहीं कर सकते जिनसे असंतोष और कट्टरता जन्म लेती है। कई बार अत्यधिक प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण अलगाव और अविश्वास की भावना को और गहरा कर देता है, जिससे उग्रवादी तत्वों को नए अवसर मिल जाते हैं।
यही कारण है कि रोकथाम-आधारित रणनीति अधिक प्रभावी मानी जाती है। जब समाज में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर, सामाजिक सुरक्षा और समान भागीदारी सुनिश्चित होती है, तब उग्रवादी विचारधाराओं के लिए जमीन तैयार करना कठिन हो जाता है। जिन युवाओं के सामने भविष्य की सकारात्मक कल्पना होती हैं, वे नफरत, हिंसा और विभाजन पर आधारित संगठनों की ओर अपेक्षाकृत कम आकर्षित होते हैं। इसलिए शांति और सुरक्षा को केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक निवेश और मानव विकास का प्रश्न भी माना जाना चाहिए।
उग्रवादी विचारधाराएं प्रायः आर्थिक असमानताओं, सामाजिक शिकायतों और उपेक्षा की भावनाओं का लाभ उठाती हैं। जब किसी समुदाय को यह महसूस होता है कि उसे विकास की मुख्यधारा से बाहर रखा गया है, तब विभाजनकारी विचारधाराओं के लिए प्रभाव स्थापित करना आसान हो जाता है। इस दृष्टि से समावेशी विकास और समावेशी समाज-राष्ट्र की परिकल्पना उग्रवाद के विरुद्ध सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है। हर नागरिक को, उसकी सामाजिक, धार्मिक, भाषाई या क्षेत्रीय पहचान से परे, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के समान अवसर उपलब्ध होने चाहिए। विकास का लाभ यदि समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँचता, तो असंतोष और असुरक्षा की भावना बनी रहती है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। इसलिए सामाजिक एकजुटता को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है जितना आर्थिक विकास। विभिन्न समुदायों के बीच संवाद, आपसी सम्मान और साझा नागरिक मूल्यों का विस्तार विभाजनकारी प्रवृत्तियों को कमजोर करता है। जब लोग स्वयं को किसी संकीर्ण पहचान से अधिक एक साझा राष्ट्रीय परियोजना का सहभागी मानते हैं, तब नफरत और ध्रुवीकरण की राजनीति का प्रभाव स्वतः सीमित हो जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा भी अब बदल चुकी है। यह केवल सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। स्थानीय समुदाय, शिक्षक, धार्मिक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा संगठन और परिवार अक्सर उन शुरुआती संकेतों को पहचान सकते हैं जो कट्टरपंथ या सामाजिक तनाव की ओर इशारा करते हैं। उनकी विश्वसनीयता और स्थानीय समझ उन्हें शांति निर्माण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भागीदार बनाती है। इसलिए सामुदायिक भागीदारी को सुरक्षा नीति के पूरक तत्व के रूप में नहीं, बल्कि उसके केंद्रीय स्तंभ के रूप में देखा जाना चाहिए।
उग्रवाद के विरुद्ध संघर्ष में नागरिकों और संस्थानों के बीच विश्वास की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब लोगों को न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसा होता है, तो वे न केवल कानून का पालन करते हैं, बल्कि सामाजिक स्थिरता बनाए रखने में सक्रिय सहयोग भी करते हैं। यह विश्वास पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता के आधार पर निर्मित होता है। यदि नागरिकों को यह महसूस हो कि उनकी शिकायतें सुनी जा रही हैं और उनके साथ समान व्यवहार किया जा रहा है, तो असंतोष के हिंसक रूप लेने की संभावना कम हो जाती है।
सरकारों और समुदायों के बीच संवाद को मजबूत करना इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सामुदायिक संपर्क कार्यक्रम, युवाओं की भागीदारी, सार्वजनिक परामर्श और सहयोगात्मक समस्या-समाधान जैसी पहलें न केवल गलतफहमियों को कम करती हैं, बल्कि शिकायतों के शांतिपूर्ण समाधान का मार्ग भी खोलती हैं। साथ ही, विश्वसनीय स्थानीय आवाजें गलत सूचना और उग्रवादी प्रचार का प्रभावी प्रतिरोध कर सकती हैं तथा सहिष्णुता और आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा दे सकती हैं।
यहां एक बात कहना बेहतर होगा कि उग्रवाद का मुकाबला केवल सुरक्षा तंत्र का कार्य नहीं है; यह एक व्यापक सामाजिक दायित्व है। इसके लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थान, नागरिक समाज, मीडिया, समुदाय और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। भारत की लोकतांत्रिक परंपराएं, बहुलवादी संस्कृति और समावेशी विकास की आकांक्षा इस दिशा में उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं।
यदि हम प्रतिक्रिया की बजाय रोकथाम को प्राथमिकता दें, समान अवसरों को सुनिश्चित करें, सामाजिक समावेशन को बढ़ावा दें और नागरिकों व संस्थानों के बीच विश्वास को मजबूत करें, तो एक ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है जो उग्रवाद के प्रति अधिक लचीला, अधिक सुरक्षित और अधिक शांतिपूर्ण हो। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि इस बात में निहित होती है कि उसके नागरिक स्वयं को कितना सम्मानित, सुरक्षित और सहभागी महसूस करते हैं। यही स्थायी शांति, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय प्रगति का सबसे मजबूत आधार है।
