भारत, इजरायल और गाजा : बदलती विश्व व्यवस्था में कूटनीतिक संतुलन की चुनौती

भारत, इजरायल और गाजा : बदलती विश्व व्यवस्था में कूटनीतिक संतुलन की चुनौती

गाजा युद्ध ने एक बार फिर दुनिया के सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा कर दिया है-क्या किसी देश के रणनीतिक हित और उसकी नैतिक जिम्मेदारियाँ एक साथ चल सकती हैं? भारत के संदर्भ में यह प्रश्न और भी जटिल हो जाता है, क्योंकि एक ओर उसके इजरायल के साथ गहरे रक्षा और तकनीकी संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों का समर्थन करता रहा है। ऐसे समय में भारत की विदेश नीति को केवल पक्ष और विपक्ष के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। इसे बदलती वैश्विक व्यवस्था, राष्ट्रीय हितों और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन के प्रयास के रूप में समझना होगा।

भारत और इजरायल के संबंध पिछले कुछ दशकों में तेजी से मजबूत हुए हैं। हालांकि दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए, लेकिन रक्षा सहयोग ने इस रिश्ते को विशेष मजबूती दी। कारगिल युद्ध (1999) के दौरान इजरायल द्वारा भारत को उपलब्ध कराई गई सैन्य सहायता को आज भी दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाता है। उस समय भारत को तत्काल रक्षा आवश्यकताओं का सामना करना पड़ा था और इजरायल ने तेजी से सहयोग किया था।

इसके बाद दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक, ड्रोन, मिसाइल प्रणाली, निगरानी उपकरण और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा। भारत के लिए इजरायल केवल एक राजनीतिक साझेदार नहीं, बल्कि रक्षा आधुनिकीकरण का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी बन गया।

इधर 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए इजरायली सैन्य अभियान ने इस रिश्ते के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। प्रश्न केवल इजरायल और फिलिस्तीन का नहीं रहा, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति, युद्ध के नियमों और मानवाधिकारों से जुड़ गया। यहां एक बात बता देना जरूरी होगा कि गजा में जो युद्ध फिलहाल चल रहा है उसमें हमास की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, जबकि वैश्विक स्तर पर हमास को फिलिस्तीनी जनता का नेतृत्वकर्ता नहीं माना जाता है। इसे कई देशों ने आतंकवादी संगठन माना है।

गाजा में बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत, विस्थापन और मानवीय संकट ने पूरी दुनिया में चिंता पैदा की है। मानवाधिकार संगठनों ने युद्ध में नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता की पहुंच और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के पालन की मांग की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठनों ने भी हथियार आपूर्ति और युद्ध में उनके संभावित उपयोग को लेकर सवाल उठाए हैं।

हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों को लेकर समय-समय पर विवाद रहे हैं। अलग-अलग देशों और समूहों ने कई बार इन संगठनों पर चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाने का आरोप लगाया है। आलोचकों का कहना है कि दुनिया के कई संघर्षों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के मामलों में समान तीव्रता नहीं दिखाई जाती। इसलिए किसी भी रिपोर्ट को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसकी कार्यप्रणाली, स्रोतों और निष्कर्षों का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है।

यही दृष्टिकोण भारत की नीति पर भी लागू होना चाहिए। भारत यदि इजरायल के साथ रक्षा संबंध बनाए रखता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह गाजा में नागरिकों की पीड़ा की अनदेखी कर रहा है। इसी प्रकार यदि भारत फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों की बात करता है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को नकार रहा है।

वास्तविकता यह है कि भारत की विदेश नीति लंबे समय से संतुलन की नीति रही है। शीत युद्ध के दौर में भारत ने गुटनिरपेक्षता अपनाई, लेकिन समय के साथ उसकी रणनीतिक आवश्यकताएँ बदलीं। चीन के उदय, आतंकवाद की चुनौती, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और रक्षा तकनीक की जरूरतों ने भारत को नए साझेदारों की तलाश के लिए प्रेरित किया।

आज की दुनिया 20वीं सदी वाली दुनिया नहीं है। शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट ने सभी देशों को अपनी विदेश नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए मजबूर किया है। भारत भी अपनी सुरक्षा और विकास के हितों को ध्यान में रखते हुए बहुआयामी कूटनीति अपना रहा है।

इसके साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है-क्या रणनीतिक हितों के साथ नैतिक जिम्मेदारी को भी समान महत्व दिया जा सकता है? एक बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में भारत से अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून, नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय मूल्यों के पक्ष में अपनी आवाज बनाए रखे।

भारत की चुनौती यही है कि वह न तो किसी संघर्ष को केवल भू-राजनीतिक समीकरणों तक सीमित करे और न ही भावनात्मक दबाव में अपनी रणनीतिक आवश्यकताओं की अनदेखी करे। दुनिया की बड़ी शक्तियाँ आज इसी संतुलन की तलाश में हैं।

गाजा संकट ने यह भी दिखाया है कि हथियारों का व्यापार केवल आर्थिक या सामरिक विषय नहीं है; इसके साथ नैतिक प्रश्न भी जुड़े हैं। किसी भी देश को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी नीतियाँ अंतरराष्ट्रीय शांति और मानव सुरक्षा के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप हों।

भारत-इजरायल संबंधों को केवल गाजा युद्ध के चश्मे से देखना सही नहीं होगा, और गाजा संकट को केवल कूटनीतिक समीकरणों तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। दोनों वास्तविकताएँ मौजूद हैं। एक ओर भारत के राष्ट्रीय हित और सुरक्षा आवश्यकताएँ हैं, तो दूसरी ओर मानवता और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी का प्रश्न है। एक परिपक्व विदेश नीति वही होती है जो अपने हितों की रक्षा करते हुए विश्व व्यवस्था में नैतिक भूमिका निभाने का प्रयास करे। भारत के सामने चुनौती कठिन है, लेकिन यही चुनौती उसे एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में परिभाषित भी करेगी।

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