राम शर्मा
भारत को विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान-परंपराओं वाला देश माना जाता है। शून्य की खोज, दशमलव प्रणाली, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान और गणित में भारत का योगदान विश्व इतिहास का गौरवशाली अध्याय है। आर्यभट्ट ने ग्रहों की गति का वैज्ञानिक अध्ययन किया, चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा विज्ञान को नई दिशा दी और नालंदा तथा तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने पूरी दुनिया को ज्ञान प्रदान किया। विडंबना यह है कि जिस देश की पहचान कभी वैज्ञानिक जिज्ञासा और ज्ञान के कारण थी, उसी देश में आज वैज्ञानिक चेतना के क्षरण की चिंता बढ़ती जा रही है।
यह चिंता केवल इसलिए नहीं है कि लोग धार्मिक स्थलों पर अधिक जा रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि तर्क, प्रमाण और वैज्ञानिक सोच का स्थान धीरे-धीरे भावनाएँ, चमत्कारों की अपेक्षा और अप्रमाणित दावों पर विश्वास लेते दिखाई दे रहे हैं। किसी भी लोकतांत्रिक और आधुनिक समाज के लिए यह प्रवृत्ति दीर्घकाल में विकास के लिए बाधक सिद्ध हो सकती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(क)(ह) में प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य बताया गया है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जिज्ञासा एवं सुधार की भावना का विकास करे। दुर्भाग्य से यह संवैधानिक आदर्श हमारे सामाजिक व्यवहार में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं होता। आज भी बीमारी का उपचार वैज्ञानिक चिकित्सा से अधिक चमत्कारिक उपायों में खोजा जाता है, ग्रह-नक्षत्रों के नाम पर अनेक आर्थिक और सामाजिक निर्णय लिए जाते हैं और सोशल मीडिया पर बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के फैलाए गए संदेश लाखों लोगों द्वारा सत्य मान लिए जाते हैं।
यह भी सत्य है कि देश में धार्मिक आयोजनों, मंदिरों और विभिन्न आध्यात्मिक गुरुओं के प्रवचनों में भारी भीड़ उमड़ रही है। आस्था भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है और उसका सम्मान होना चाहिए। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब आस्था तर्क का स्थान लेने लगे या वैज्ञानिक तथ्यों को चुनौती देने लगे। इतिहास बताता है कि भारतीय दर्शन ने भी प्रश्न पूछने और सत्य की खोज की परंपरा को कभी नहीं रोका। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिकता परस्पर विरोधी नहीं हैं; विरोध तब है जब अंधविश्वास विज्ञान पर हावी होने लगे।
शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी चिंता का विषय है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में विज्ञान तथा गणित की पढ़ाई का स्तर लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अनेक स्थानों पर प्रयोगशालाएँ केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं। विद्यार्थियों को प्रयोग करने, मॉडल बनाने, अनुसंधान करने और समस्याओं का समाधान खोजने की प्रेरणा कम मिलती है। विज्ञान की शिक्षा रटने तक सीमित हो गई है, जबकि वैज्ञानिक सोच प्रयोग, प्रश्न और खोज की संस्कृति से विकसित होती है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि इतिहास, साहित्य, राजनीति विज्ञान या अन्य कला विषय महत्वहीन हैं। एक विकसित समाज को वैज्ञानिकों के साथ-साथ इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों और साहित्यकारों की भी आवश्यकता होती है। वास्तविक समस्या विषयों के महत्व की नहीं, बल्कि विज्ञान और गणित के प्रति घटती रुचि तथा अनुसंधान की कमजोर होती संस्कृति की है। यदि विज्ञान और गणित में उत्कृष्ट प्रतिभाएँ कम होंगी तो देश की तकनीकी क्षमता भी सीमित हो जाएगी।
भारत की सबसे बड़ी कमजोरी शोध एवं विकास पर होने वाला कम निवेश है। किसी भी देश की वैज्ञानिक प्रगति का सबसे बड़ा मापदंड यह है कि वह अनुसंधान पर कितना व्यय करता है। इस दृष्टि से भारत अभी भी अग्रणी देशों से काफी पीछे है। उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आँकड़ों के अनुसार भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल लगभग 0.6 से 0.7 प्रतिशत अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करता है। इसके विपरीत इज़राइल लगभग 6.8 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया लगभग 5.1 प्रतिशत, संयुक्त राज्य अमेरिका लगभग 3.4 प्रतिशत, चीन लगभग 2.6 से 2.7 प्रतिशत, जबकि ओईसीडी देशों का औसत लगभग 2.7 प्रतिशत है। अर्थात भारत की तुलना में दक्षिण कोरिया लगभग आठ गुना, इज़राइल लगभग दस गुना और चीन लगभग चार गुना अधिक अनुपात में शोध पर निवेश करता है।
यही कारण है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, जैव-प्रौद्योगिकी, रक्षा तकनीक, हरित ऊर्जा, रोबोटिक्स और चिकित्सा विज्ञान जैसे क्षेत्रों में विश्व के अग्रणी आविष्कार मुख्यतः इन्हीं देशों से सामने आते हैं। भारत ने भी अंतरिक्ष, डिजिटल भुगतान, वैक्सीन निर्माण और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, परंतु समग्र शोध संस्कृति अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी है।
एक गंभीर समस्या प्रतिभा पलायन की भी है। देश के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी उच्च शिक्षा और शोध के लिए विदेशों का रुख करते हैं। इसका कारण केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि बेहतर प्रयोगशालाएँ, पर्याप्त शोध अनुदान, आधुनिक उपकरण और स्वतंत्र अनुसंधान का वातावरण भी है। यदि भारत को विश्व स्तरीय शोध शक्ति बनना है तो उसे अपने विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों को वैश्विक स्तर की सुविधाएँ उपलब्ध करानी होंगी।
दुखद तथ्य यह भी है कि भारत में कुल अनुसंधान व्यय का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करती है, जबकि विकसित देशों में निजी उद्योग अनुसंधान का प्रमुख वित्तपोषक होता है। भारतीय उद्योगों को अनुसंधान एवं नवाचार में अधिक निवेश करना होगा। विश्वविद्यालय, उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष विज्ञान का युग है। भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था उन्हीं देशों के हाथ में होगी जो ज्ञान और नवाचार में अग्रणी होंगे। यदि भारत केवल उपभोक्ता बना रहा और नई तकनीकों का निर्माता नहीं बन पाया, तो विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य कठिन हो जाएगा।
मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। यदि समाचारों में विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार की उपलब्धियों को पर्याप्त स्थान मिले तथा वैज्ञानिक विषयों को सरल भाषा में समाज तक पहुँचाया जाए, तो युवाओं में विज्ञान के प्रति आकर्षण बढ़ेगा। आज सोशल मीडिया पर अप्रमाणित सूचनाएँ वैज्ञानिक तथ्यों की तुलना में अधिक तेजी से फैलती हैं। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए वैज्ञानिक संवाद को बढ़ावा देना आवश्यक है।
परिवार और विद्यालयों को भी बच्चों में प्रश्न पूछने की आदत विकसित करनी होगी। यदि कोई बच्चा ष्क्योंष् पूछता है तो उसे चुप कराने के बजाय उसका उत्तर खोजने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। विज्ञान जिज्ञासा से जन्म लेता है, भय से नहीं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विज्ञान, गणित, नवाचार और कौशल विकास पर बल दिया गया है। अब आवश्यकता उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। प्रत्येक विद्यालय में आधुनिक प्रयोगशालाएँ हों, विज्ञान प्रदर्शनियों को प्रोत्साहन मिले, विश्वविद्यालयों में शोध अनुदान बढ़े, उद्योगों को अनुसंधान में निवेश के लिए कर प्रोत्साहन दिया जाए तथा देश के प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को विश्वस्तरीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो शोध एवं विकास पर व्यय को आने वाले वर्षों में चरणबद्ध तरीके से कम-से-कम ळक्च् के दो प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित करना होगा।
भारत की महान वैज्ञानिक परंपरा हमें यह सिखाती है कि ज्ञान की प्राप्ति श्रद्धा और जिज्ञासा दोनों से होती है। श्रद्धा मनुष्य को नैतिक बनाती है, जबकि विज्ञान उसे समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता देता है। इसलिए आवश्यकता किसी एक को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलित समन्वय की है।
यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है तो केवल विशाल अर्थव्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। हमें वैज्ञानिक चेतना, अनुसंधान संस्कृति और नवाचार को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाना होगा। जिस दिन देश का प्रत्येक बच्चा बिना भय के प्रश्न पूछ सकेगा, प्रत्येक विश्वविद्यालय शोध का केंद्र बनेगा, प्रत्येक उद्योग नवाचार में निवेश करेगा और प्रत्येक नागरिक प्रमाण के आधार पर निर्णय लेना सीखेगा, उसी दिन भारत वास्तव में ज्ञान महाशक्ति बनने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका होगा। यही वैज्ञानिक भारत की सबसे मजबूत नींव होगी और यही विकसित भारत का वास्तविक मार्ग भी।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
