भारत की भौगोलिक बनावट और समुद्री संरचना ने एल नीनो के प्रभाव को किया कम

भारत की भौगोलिक बनावट और समुद्री संरचना ने एल नीनो के प्रभाव को किया कम

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की नवीनतम मौसमी समीक्षा ने भारत सहित पूरे एशिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। संगठन का आकलन है कि वर्ष के शेष महीनों में प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति और मजबूत हो सकती है। सामान्य परिस्थितियों में यह समाचार भारत के लिए चिंता का विषय माना जाता, क्योंकि इतिहास बताता है कि अधिकांश कमजोर मानसून वर्षों के पीछे किसी न किसी रूप में एल नीनो की भूमिका रही है। किंतु इस बार तस्वीर पूरी तरह एक पक्षीय नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिंद महासागर में विकसित हो रहा सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव  (Positive Indian Ocean Dipole–IOD)  एल नीनो के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर सकता है। यही कारण है कि आशंका और उम्मीद-दोनों एक साथ दिख रहे हैं।

आइए सबसे पहले एल नीनो को समझते हैं। इसे समझने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि यह कोई तूफान या मौसम प्रणाली नहीं, बल्कि महासागरों और वायुमंडल के बीच होने वाली एक जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया है। सामान्य वर्षों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग-इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के निकट का समुद्री जल अपेक्षाकृत अधिक गर्म रहता है। व्यापारिक पवनें (Trade Winds) इस गर्म जल को पश्चिम की ओर धकेलती रहती हैं। परिणामस्वरूप वहीं अधिक बादल बनते हैं और भारी वर्षा होती है लेकिन जब ये पवनें कमजोर पड़ जाती हैं, तो गर्म जल पूर्व की ओर, दक्षिण अमेरिका के तट तक फैलने लगता है। समुद्र की सतह के तापमान में यह असामान्य वृद्धि ही एल नीनो कहलाती है। इससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण बदल जाता है और उसका प्रभाव दूर-दूर तक दिखाई देता है। भारत में इसका सबसे बड़ा प्रभाव दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है।

हालाँकि यह समझना भी आवश्यक है कि हर एल नीनो भारत में सूखा नहीं लाता और हर अच्छा मानसून एल नीनो की अनुपस्थिति में ही नहीं होता। यह एक सांख्यिकीय संबंध है, कोई कठोर नियम नहीं। पिछले कुछ दशकों में कई ऐसे वर्ष आए हैं जब एल नीनो मौजूद था, फिर भी भारत में वर्षा अपेक्षाकृत संतोषजनक रही। इसका कारण यह है कि भारतीय मानसून केवल प्रशांत महासागर से संचालित नहीं होता; उस पर हिंद महासागर, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, हिमालय, पश्चिमी विक्षोभ और अनेक क्षेत्रीय कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।

यहीं भारतीय महासागर द्विध्रुव  (IOD) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जब पश्चिमी हिंद महासागर का जल पूर्वी भाग की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है, तो इसे सकारात्मक IOD कहा जाता है। ऐसी स्थिति में अरब सागर और हिंद महासागर से भारत की ओर नमी का प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे मानसून को अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सकारात्मक IOD पर्याप्त मजबूत हो, तो वह एल नीनो से होने वाली वर्षा की कमी की आंशिक भरपाई कर सकता है।

वर्तमान परिदृश्य में यही सबसे बड़ी उम्मीद है। WMO का संकेत है कि एल नीनो और सकारात्मक IOD एक साथ विकसित हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो भारत का मानसून उतना कमजोर नहीं पड़ेगा जितनी आशंका केवल एल नीनो को देखकर व्यक्त की जा रही है। फिर भी यह कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं है, क्योंकि दोनों प्रणालियों की तीव्रता और समय-क्रम अंतिम परिणाम तय करेंगे।

यहीं से एक बड़ा प्रश्न जन्म लेता है। क्या आज भी भारत की मानसून संबंधी बहस केवल एल नीनो के इर्द-गिर्द घूमनी चाहिए? पिछले दो दशकों में जलवायु परिवर्तन ने मौसम के व्यवहार को कहीं अधिक जटिल बना दिया है। वर्षा की कुल मात्रा से अधिक उसकी प्रकृति बदल रही है। कहीं लंबे शुष्क अंतराल के बाद कुछ घंटों में मूसलाधार वर्षा हो रही है, तो कहीं लगातार बादल छाए रहने के बावजूद पर्याप्त वर्षा नहीं हो रही। इस वर्ष भी भारत के अनेक हिस्सों में लोगों ने दिन-प्रतिदिन बादलों से ढका आकाश देखा, जबकि वर्षा का वितरण अत्यंत असमान रहा। इससे स्पष्ट है कि बादलों की उपस्थिति और प्रभावी मानसून हमेशा एक ही बात नहीं होते।

इसी कारण अब केवल ‘सामान्य वर्षा’ का आँकड़ा पर्याप्त नहीं है। किसानों के लिए यह अधिक महत्वपूर्ण है कि वर्षा कब हो, कितनी देर तक हो और किस क्षेत्र में हो। यदि धान की रोपाई के समय वर्षा न मिले और बाद में एक साथ अत्यधिक वर्षा हो जाए, तो कुल वर्षा सामान्य होने पर भी कृषि को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश की बड़ी आबादी आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानसून पर निर्भर है। खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण आय, खाद्य मुद्रास्फीति, जलाशयों का स्तर, बिजली उत्पादन और समग्र आर्थिक वृद्धि-इन सबका संबंध वर्षा से जुड़ा हुआ है। इसलिए WMO की यह रिपोर्ट केवल मौसम का पूर्वानुमान नहीं, बल्कि आर्थिक संकेत भी है।

इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भारत को मानसून के अध्ययन में अधिक आत्मनिर्भर दृष्टिकोण अपनाना होगा। वर्षों तक एल नीनो को लगभग अंतिम निर्णायक मान लिया गया, जबकि अब स्पष्ट होता जा रहा है कि हिंद महासागर स्वयं एक सक्रिय जलवायु नियंत्रक है। भारतीय महासागर की ऊष्मा, अरब सागर का तापमान, बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दाब और हिमालयी प्रभाव-इन सबको समान गंभीरता से समझे बिना भविष्य की सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं होगी।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भारत को केवल मौसम की भविष्यवाणी करने वाला देश नहीं, बल्कि मानसून विज्ञान का वैश्विक नेतृत्व करने वाला देश बनने की आवश्यकता है। इसके लिए समुद्री प्रेक्षण, उपग्रह निगरानी, उच्च-रिज़ॉल्यूशन मॉडल, कृत्रिम मेधा आधारित पूर्वानुमान और कृषि-विशिष्ट मौसम सेवाओं में बड़े निवेश की जरूरत है।

WMO की रिपोर्ट हमें भय और आशा-दोनों का संदेश देती है। एल नीनो का खतरा वास्तविक है, लेकिन भारतीय महासागर भी उतना ही वास्तविक है। शायद भविष्य का भारतीय मानसून अब केवल प्रशांत महासागर की कहानी नहीं रहेगा। उसकी पटकथा हिंद महासागर भी लिखेगा। भारत के लिए यही सबसे बड़ा वैज्ञानिक और रणनीतिक संदेश है।

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