गौतम चौधरी
इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में यदि दो विषयों को एक साथ रखा जाए तो वे हैं—जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा। दुनिया की बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराना पहले ही कठिन कार्य था, लेकिन अब अनियमित मानसून, बढ़ते तापमान, सूखा, बाढ़ और चरम मौसम की घटनाएँ कृषि उत्पादन को सीधे प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में कृषि केवल किसानों या ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विषय नहीं रह गई है; यह वैश्विक राजनीति, व्यापार और मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें लगातार चेतावनी दे रही हैं कि यदि तापमान वृद्धि की वर्तमान गति जारी रही, तो दुनिया के अनेक कृषि क्षेत्र अपनी उत्पादकता खो सकते हैं। भारत, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश विशेष रूप से प्रभावित होंगे क्योंकि उनकी बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। विडंबना यह है कि यही देश दुनिया की खाद्य सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव कृषि की अनिश्चितता के रूप में सामने आ रहा है। कभी असमय वर्षा फसलें बर्बाद कर देती है, तो कभी लंबे सूखे के कारण बुवाई तक संभव नहीं हो पाती। भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हीटवेव, अनियमित मानसून और अचानक आई बाढ़ ने किसानों की लागत बढ़ाई है और उत्पादन को प्रभावित किया है। यही स्थिति अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के अनेक हिस्सों में दिखाई देती है।
ऐसे समय में BRICS+ देशों के बीच कृषि सहयोग की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। BRICS समूह में शामिल देश दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा इनके पास है। ब्राज़ील सोयाबीन और मांस उत्पादन में अग्रणी है, रूस और भारत खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जबकि चीन कृषि तकनीक और निवेश क्षमता के मामले में प्रमुख शक्ति है।
लेकिन प्रश्न केवल उत्पादन बढ़ाने का नहीं है। असली चुनौती यह है कि जलवायु संकट के बीच कृषि को अधिक टिकाऊ, लचीला और सुरक्षित कैसे बनाया जाए। इसके लिए देशों के बीच केवल व्यापारिक समझौते पर्याप्त नहीं होंगे। जलवायु-प्रतिरोधी बीज, जल संरक्षण तकनीक, मृदा सुधार, कृषि अनुसंधान और किसानों के लिए जोखिम प्रबंधन की साझा रणनीतियाँ विकसित करनी होंगी।
भारत का अनुभव इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। हरित क्रांति से लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली और हाल के वर्षों में मोटे अनाज (मिलेट) को बढ़ावा देने तक भारत ने खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में कई प्रयोग किए हैं। लेकिन भारत भी जलवायु संकट से अछूता नहीं है। भूजल का अत्यधिक दोहन, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता और कृषि भूमि की घटती गुणवत्ता गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
जलवायु परिवर्तन हमें यह भी याद दिलाता है कि खाद्य सुरक्षा केवल उत्पादन का प्रश्न नहीं है। यदि एक देश में सूखा पड़ता है और दूसरे देश में बाढ़ आती है, तो वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि गेहूँ और उर्वरकों की आपूर्ति में व्यवधान का असर दुनिया के दूर-दराज़ देशों तक पहुँच सकता है। इसलिए कृषि को राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक सहयोग के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
हालाँकि BRICS देशों के सामने अपनी सीमाएँ भी हैं। भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, विभिन्न देशों की अलग-अलग कृषि नीतियाँ और व्यापारिक हितों का टकराव सहयोग को कठिन बनाते हैं। फिर भी जलवायु संकट ऐसा मुद्दा है जो राजनीतिक मतभेदों से कहीं बड़ा है। मौसम सीमाएँ नहीं पहचानता और न ही खाद्य संकट किसी एक देश तक सीमित रहता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि कृषि को केवल उत्पादन और निर्यात के नजरिए से न देखा जाए। इसे जलवायु न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और मानव सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में समझा जाए। यदि दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएँ कृषि और जलवायु के प्रश्न पर साझा पहल विकसित कर सकें, तो यह केवल उनके लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए लाभकारी होगा।
कृषि का भविष्य अब केवल खेतों में तय नहीं होगा। वह अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान और जलवायु नीतियों के संगम पर तय होगा। यही इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।
यह लेख BRICS की खबर से प्रेरित है, लेकिन उसका दायरा व्यापक है। यदि चाहें तो इसमें मैं भारतीय कृषि संकट, किसानों की आय, कार्बन बाजार, जैविक खेती और कॉर्पोरेट कृषि के प्रश्नों को जोड़कर इसे और अधिक वैचारिक तथा विश्लेषणात्मक बना सकता हूँ।
