गौतम चौधरी
भारत की संसद में प्रस्तुत Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 पर देश के भीतर बहस होना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। सरकार अपने तर्क देगी, विपक्ष अपनी आपत्तियाँ रखेगा, नागरिक समाज अपनी चिंताएँ व्यक्त करेगा और अंततः बहुमत के आधार पर संसद कानून बनाएगी। किंतु जब यही विषय हजारों किलोमीटर दूर संयुक्त राज्य अमेरिका की राजनीतिक बहस का हिस्सा बनने लगे, तब प्रश्न केवल एक विधेयक का नहीं, वह राष्ट्रीय संप्रभुता, विदेश नीति और वैश्विक शक्ति-संतुलन का विषय भी बन जाता है।
हाल के दिनों में अमेरिकी सांसद राइली मूर सहित कुछ अमेरिकी नेताओं ने भारत के प्रस्तावित FCRA संशोधन पर सार्वजनिक टिप्पणी की है। उनका कहना है कि इस विधेयक से विशेष रूप से चर्च और विदेशी सहायता से संचालित संस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर भारत सरकार का स्पष्ट मत है कि यह संशोधन किसी धर्म या समुदाय को लक्ष्य नहीं बनाता, बल्कि विदेशी अंशदान के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास है।
दरअसल, एक संप्रभु राष्ट्र के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए। विदेशी चंदा कोई साधारण आर्थिक लेन-देन नहीं है। अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण का उपयोग अमूमन शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय सहायता जैसे सकारात्मक कार्यों के लिए होता है लेकिन अनेक देशों में इसका उपयोग वैचारिक प्रभाव, राजनीतिक हस्तक्षेप तथा भू-राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए भी हुआ है। इसी कारण विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों ने विदेशी वित्तपोषण पर निगरानी के लिए अलग-अलग प्रकार के कानून बना रखे हैं। अमेरिका स्वयं विदेशी प्रभाव और लॉबिंग को लेकर विस्तृत कानूनी ढाँचा रखता है। इसलिए भारत यदि विदेशी अंशदान को विनियमित करता है, तो इसे सिद्धांततः असामान्य नहीं कहा जा सकता।
भारत में FCRA की आवश्यकता भी इसी पृष्ठभूमि में उत्पन्न हुई थी। 1976 में पहली बार यह कानून उस चिंता के साथ लाया गया कि विदेशी धन का उपयोग भारत की राजनीति, सामाजिक आंदोलनों और राष्ट्रीय निर्णयों को प्रभावित करने के लिए न हो। 2010 में इसे नए रूप में लागू किया गया और बाद के वर्षों में इसमें कई संशोधन किए गए। आज जब भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है और उसकी सामरिक भूमिका लगातार बढ़ रही है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि विदेशी धन किस उद्देश्य से आ रहा है और उसका उपयोग कहाँ हो रहा है।
आलोचकों की चिंता भी पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकती। यदि किसी कानून के कारण वास्तविक सामाजिक सेवा करने वाले अस्पताल, विद्यालय, अनुसंधान संस्थान या जनकल्याणकारी संगठन अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करें, तो यह लोकतांत्रिक समाज के लिए भी चिंता का विषय होगा। कानून का उद्देश्य वैध संस्थाओं को बाधित करना नहीं, बल्कि अपारदर्शी और संदिग्ध गतिविधियों पर अंकुश लगाना होना चाहिए। इसलिए किसी भी कठोर नियामक व्यवस्था के साथ निष्पक्ष प्रक्रिया, न्यायिक समीक्षा और पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है।
इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि भारत के एक प्रस्तावित कानून पर अमेरिकी संसद में चर्चा क्यों हो रही है? क्या यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न है, या इसके पीछे वैश्विक गैर-सरकारी संगठनों, अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण नेटवर्क और अमेरिकी विदेश नीति के व्यापक हित भी जुड़े हैं? लोकतांत्रिक देशों में सांसद स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त करते हैं, इसलिए किसी एक सांसद का बयान अमेरिकी सरकार की आधिकारिक नीति नहीं माना जा सकता। फिर भी, जब किसी दूसरे देश के आंतरिक विधायी विषय पर विदेशी संसद में बहस होने लगे, तो भारत के लिए यह संकेत अवश्य है कि उसके घरेलू कानून अब अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं।
भारत को इस परिस्थिति में दो पूर्वाग्रहों से बचना चाहिए। पहला पूर्वाग्रह-विदेशी वित्तपोषण से जुड़ी हर संस्था को संदेह की दृष्टि से देखा जाए और दूसर-राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी प्रभाव की आशंकाओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। एक परिपक्व लोकतंत्र का मार्ग इन दोनों के बीच से निकलता है-जहाँ पारदर्शिता भी हो, कानून का समान अनुपालन भी हो और राष्ट्र की संप्रभुता भी अक्षुण्ण रहे।
भारत की संप्रभुता का अर्थ केवल उसकी सीमाओं की रक्षा नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि उसके कानून भारत की संसद बनाए, उनका मूल्यांकन भारत की न्यायपालिका करे और उन पर अंतिम राजनीतिक निर्णय भारत की जनता के प्रतिनिधि लें। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपनी राय रख सकता है लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए उसकी विधायी प्रक्रिया अंततः उसकी अपनी संप्रभु जिम्मेदारी होती है।
FCRA पर चल रही बहस इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल विदेशी चंदे की कहानी नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की कहानी है, जहाँ पूँजी, विचार, धर्म, मानवाधिकार, कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा-सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भारत को इस चुनौती का सामना न तो भय से करना चाहिए और न ही आत्मविश्वास के अभाव में। उसे ऐसा कानून बनाना चाहिए जो राष्ट्रहित की रक्षा करे, पारदर्शिता सुनिश्चित करे और यह संदेश भी दे कि एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है।
प्रश्न केवल इतना नहीं है कि FCRA कितना कठोर होना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा करते हुए ऐसी व्यवस्था बना सकता है, जिसमें विदेशी सहायता का उपयोग जनकल्याण के लिए हो लेकिन विदेशी प्रभाव भारत की नीतियों का निर्धारक न बन सके। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
