50वां पुण्य स्मरण/ भारत की आजादी के शुभ मुहूर्त-प्रदाता : पं. सूर्यनारायण व्यास

भारतीय सभ्यता में समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्व उभरे हैं जिनकी प्रतिभा को किसी एक दायरे में बांधना मुश्किल है। पं. सूर्यनारायण व्यास ऐसे ही एक नाम हैं। उज्जैन की धरती से निकले इस ज्योतिषाचार्य, क्रांतिकारी, साहित्यकार, पत्रकार और पुरातत्त्ववेत्ता को भारतीय अस्मिता का एक प्रखर प्रतीक कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। 2 मार्च 1902 को जन्म और 22 जून 1976 को निधनकृबीच के इन वर्षों में उन्होंने जो कुछ रचा, वह भारतीयता की जड़ों को संस्कृत, ज्योतिष, इतिहास, साहित्य और स्वाधीनता संग्राम से जोड़ने वाला एक पूरा सेतु बन गया।

जन्म उज्जैन के सिंहपुरी मोहल्ले के एक विद्वान परिवार में हुआ। पिता पं. नारायणजी व्यास महर्षि सांदीपनी की परंपरा के वाहक थेकृसंस्कृत, ज्योतिष और व्याकरण के गहरे जानकार। कहते हैं कि वे दोनों हाथों से एक साथ लिख सकते थे, और उनकी इस ख्याति के चलते लोकमान्य तिलक और मदनमोहन मालवीय जैसे लोग उनसे मिलने उज्जैन आते थे। ऐसे माहौल में बड़े हुए सूर्यनारायणजी के लिए विद्या और राष्ट्रप्रेम बचपन से ही जीवन का हिस्सा बन गए थे।

संस्कृत, हिंदी, गुजराती, मराठी, बंगला-इतनी भाषाओं पर उनकी पकड़ थी कि 14-15 साल की उम्र में ही उनकी रचनाएं छपने लगी थीं। 1916 में माधव कॉलेज की पत्रिका में मराठी रचना ‘शारदोत्सव’ प्रकाशित हुई। शुरुआती दिनों में उर्दू शायरी भी की, ‘शम्स उज्जयिनी’ के नाम से। उस दौर का उज्जैन क्रांतिकारियों का अड्डा बन चुका था, और सूर्यनारायण उस माहौल से अनछुए नहीं रहे।

1921 से वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। सिद्धनाथ माधव आगरकर के संपर्क में आकर तिलक की जीवनी का अनुवाद किया। सावरकर की ‘अंडमान की गूंज’ ने उन्हें गहरे तक प्रभावित किया था। 1930 के अजमेर सत्याग्रह में उज्जैन के जत्थे की अगुआई की और लॉर्ड मेयो की मूर्ति तोड़ने जैसे जोखिम भरे कामों में भी शामिल रहे। उस मूर्ति का एक टूटा हाथ बरसों उनके श्भारती भवनश् में पड़ा रहा। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया। उनके गुरुकुल में कई क्रांतिकारी वेश बदलकर छिपे रहते थेकृएक तरफ ज्योतिषी, दूसरी तरफ क्रांतिकारी, यह संयोग कम ही देखने को मिलता है। 1930 में ही उन्होंने कह दिया था कि भारत अगस्त 1947 में आजाद होगा।

सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की होती है, वह है भारत की आजादी का मुहूर्त तय करने में उनकी भूमिका। 1946-47 के आखिरी दिनों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने, जिनकी रुचि आध्यात्मिक विषयों में भी थी, गोस्वामी गणेश दत्त महाराज के जरिए उन्हें दिल्ली बुलाया। अंग्रेजों ने 14 और 15 अगस्त की दो तारीखें दी थीं। पंचांग देखकर पं. व्यास ने बताया कि 14 अगस्त का लग्न अस्थिर है, इसलिए 15 अगस्त बेहतर रहेगा। आधी रात को ध्वजारोहण का सुझाव भी उनका ही था, जिसे मान लिया गयाकृऔर इसी वजह से लाल किले पर तिरंगा ठीक मध्यरात्रि में फहराया गया। संसद भवन के शुद्धिकरण की सलाह भी उन्होंने दी थी। पाकिस्तान को मिले 14 अगस्त के मुहूर्त के बारे में उन्होंने पहले ही कह दिया था कि यह अस्थिर साबित होगा, जो आगे की घटनाओं में सही निकला। यह सब केवल ज्योतिषीय कौशल का मामला नहीं था; इसमें भारतीय अस्मिता को वैदिक परंपरा से जोड़ने की एक गहरी कोशिश भी थी।

‘विक्रम’ मासिक पत्र के संपादक के तौर पर उन्होंने 2500 से ज्यादा संपादकीय लिखे-‘व्यास उवाच’ और ‘बिन्दु-बिन्दु’ के शीर्षक से। 1937 में यूरोप गए, और वहां से लौटकर ‘सागर प्रवास’ जैसी क्लासिक यात्रा-वृत्तांत लिखी। व्यंग्य लेखन में भी उनका नाम ऊंचा रहा-1935 में आया पहला संग्रह ‘तू-तूरू मैं-मैं’ इसका उदाहरण है। उनके व्यंग्य में फूहड़पन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समझ की झलक मिलती थी। हिंदी व्यंग्य की शुरुआती और प्रभावशाली परंपरा में उनका नाम गिना जाता है।

कविता, निबंध, संस्मरण, इतिहास, पुरातत्त्व-लगभग हर विधा में उनकी कलम चली। ‘यादें’ नाम से उनके संस्मरण संग्रहित हैं, जिनमें देश की कई बड़ी शख्सियतों से उनकी मुलाकातों का जिक्र मिलता है। उज्जैन के पुराने गौरव-कालिदास, विक्रमादित्य, महाकाल को फिर से जीवित करने में उनका योगदान बड़ा रहा।

उज्जैन की कालिदास समारोह परंपरा उनके ही प्रयासों की देन है। 1928 से महाकाल मंदिर और भारती भवन में कालिदास जयंती मनाई जानी शुरू हुई, जो बाद में अखिल भारतीय कालिदास समारोह बन गई। विक्रम विश्वविद्यालय, विक्रम कीर्ति मंदिर, सिंधिया शोध प्रतिष्ठान, कालिदास परिषद-इनकी स्थापना के पीछे भी उनकी ही प्रेरणा थी। उनका गुरुकुल हजारों छात्रों का घर था; देश-विदेश से लोग आते और मुफ्त में शिक्षा, खाना, रहना सब मिलता। ज्योतिष और खगोल विद्या में उनके शिष्यों की संख्या सात हजार से ज्यादा बताई जाती है।

1958 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मभूषण मिला। लेकिन 1967 में जब अंग्रेजी को हमेशा के लिए बनाए रखने वाला विधेयक आया, तो विरोध में उन्होंने यह सम्मान वापस लौटा दिया। सत्ता या पुरस्कार के आगे झुकना उन्हें कभी मंजूर नहीं रहा। 2002 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।

उनकी विरासत को बेटे राजशेखर व्यास-दूरदर्शन के पूर्व अधिकारी और लेखक ने आगे बढ़ाया। उज्जैन में आज भी कालिदास अकादमी, सूर्यनारायण व्यास संकुल जैसी संस्थाएं उनकी याद को बनाए हुए हैं। जिस दौर में भारतीय अस्मिता पर नए सिरे से बात हो रही है, पं. व्यास का जीवन एक मिसाल की तरह सामने आता है-प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संघर्ष को साथ लेकर चलने की मिसाल। उनकी दूरदृष्टि, आजादी की भविष्यवाणी और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का काम आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है, जब देश आत्मनिर्भरता और अपनी जड़ों की तरफ लौटने की बात कर रहा है।

पं. सूर्यनारायण व्यास की यादें उनकी रचनाओं में, उज्जैन की परंपराओं में, और उन सबके मन में जिंदा हैं जो अपनी जड़ों पर गर्व करते हैं। 50वें पुण्य स्मरण दिवस पर पंडित व्यास जी को सादर नमन।
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लेखिका स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार इनके निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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