कुमार कृष्णन
21 जून को नीट-यूजी की पुनर्परीक्षा आयोजित हुई। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) यह दावा कर सकती है कि इस बार प्रश्नपत्र लीक नहीं हुआ, लेकिन परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े नए विवादों ने पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुनर्परीक्षा से एक दिन पहले ओडिशा की एक अभ्यर्थी को उसके गृह राज्य के बजाय 1500 किलोमीटर दूर देहरादून में परीक्षा केंद्र आवंटित कर दिया गया, जिसे बाद में सुधारा गया। यह घटना एनटीए की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 17 जून को कोटा से ष्छात्रों की गूंजष् अभियान शुरू कर परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव के मुद्दे उठाए हैं। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने पुनर्परीक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसा मामला बनाते हुए वायुसेना की मदद से प्रश्नपत्रों की ढुलाई कराई। यह प्रशासनिक सख्ती का संकेत हो सकता है, लेकिन यह भी दर्शाता है कि पेपर लीक माफिया कितना संगठित और प्रभावशाली हो चुका है।
सबसे गंभीर मामला बिहार के लखीसराय में सामने आया, जहां पुनर्परीक्षा के दौरान कथित धांधली के आरोप में 30 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें बायोमेट्रिक सत्यापन से जुड़े कर्मचारी, डमी परीक्षार्थी और मेडिकल छात्र शामिल हैं। जांच में पता चला कि मेडिकल कॉलेजों के छात्रों को सॉल्वर बनाकर वास्तविक अभ्यर्थियों की जगह परीक्षा दिलाने की कोशिश की जा रही थी। पुलिस के अनुसार प्रति अभ्यर्थी 10 से 12 लाख रुपये तक की डील होती थी और गिरोह के तार कई राज्यों तक फैले हैं।
लखीसराय प्रकरण ने यह उजागर किया है कि परीक्षा माफिया केवल बाहरी तत्वों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मेडिकल छात्र और तकनीकी कर्मचारी भी शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल प्रश्नपत्र लीक की नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार और कमजोर निगरानी की है।
लगातार विवादों, पुनर्परीक्षाओं और धांधली की घटनाओं ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों का भरोसा कमजोर किया है। बार-बार परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने, अतिरिक्त तैयारी और आर्थिक बोझ ने मध्यमवर्गीय परिवारों की परेशानियां भी बढ़ाई हैं। सवाल केवल एक परीक्षा का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिस पर देश के लाखों युवाओं का भविष्य टिका हुआ है।
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