व्यापारियों के भरोसे सरकारी शिक्षा : व्यवस्था की रीढ़ या नीतिगत लाचारी?

व्यापारियों के भरोसे सरकारी शिक्षा : व्यवस्था की रीढ़ या नीतिगत लाचारी?

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बुनियादी और भौतिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए शिक्षा विभाग लंबे समय से दानदाताओं के सहयोग पर निर्भर है। फर्नीचर, कंप्यूटर, क्लासरूम, मुख्य द्वार का निर्माण, रंग-रोगन, बिजली और पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सरकार ने एक विशेष योजना चला रखी है। इस योजना के अनुसार एक वर्ष में एक लाख रुपये या उससे अधिक की राशि दान करने वाले व्यक्ति या संस्था को जिला और राज्य स्तर पर सम्मानित कर ‘भामाशाह’ की उपाधि से नवाजा जाता है।

बड़ा सवाल यह है कि आज शिक्षा विभाग को ‘भामाशाहों’ की इतनी आवश्यकता क्यों है? और क्या केवल दानदाताओं के सहारे ही देश की शिक्षा व्यवस्था को सफल बनाया जा सकता है?

आंकड़ों पर गौर करें तो इस वर्ष राजस्थान में शिक्षा विभाग के कुल बजट का लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा (करीब 318 करोड़ रुपये) भामाशाहों के सहयोग से प्राप्त हुआ है। शिक्षा विभाग द्वारा आवंटित बजट का विश्लेषण करने पर यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि स्कूलों के बुनियादी ढांचे और रखरखाव के लिए प्रति स्कूल औसतन केवल 25,000 रुपये वार्षिक दिए जाते हैं। ज़रा कल्पना कीजिए, जर्जर भवनों की मरम्मत, रंग-रोगन, बिजली-पानी के बिल, साफ-सफाई और इंटरनेट जैसे खर्चों के लिए यह राशि कितनी नाकाफी है! यदि इस बजट की गणना प्रति छात्र के आधार पर की जाए, तो यह राशि बिल्कुल नगण्य बैठती है।

स्कूलों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पिछले लगभग 30 वर्षों से विद्यालय विकास के नाम पर ‘शाला विकास समिति’ के खातों में बच्चों के प्रवेश या टीसी (स्थानांतरण प्रमाण पत्र) के समय अभिभावकों से रसीद के माध्यम से चंदा लेने की परंपरा चल रही है। ध्यान से देखें तो सार्वजनिक क्षेत्र से सरकार के पीछे हटने की यह प्रवृत्ति वर्ष 1990 के आर्थिक उदारीकरण के बाद से अधिक तेजी से बढ़ी है।

यह सच है कि राजस्थान में सामंत काल से ही कुछ क्षेत्रों में शिक्षा के महत्व को गहराई से समझा गया था। विशेषकर शेखावाटी और मारवाड़ अंचल के दूरदर्शी व्यापारी वर्ग ने बड़े-बड़े सरकारी और गैर-सरकारी शिक्षण संस्थानों का निर्माण करवाकर समाज को शिक्षित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उस समय के उद्योगों और अर्थव्यवस्था के विकास के लिए कुशल व शिक्षित मानव संसाधन तैयार करना एक बड़ी जरूरत थी, जिसे इस वर्ग ने पूरा किया।

परंतु, 1990 के दशक के बाद सरकारों ने सार्वजनिक कल्याण के क्षेत्रों (विशेषकर शिक्षा और चिकित्सा) से अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए। परिणामस्वरूप, इन क्षेत्रों का तेजी से निजीकरण हुआ और शिक्षा एक बड़े व्यावसायिक केंद्र के रूप में तब्दील हो गई। आज निजी स्कूल, अस्पताल और विश्वविद्यालय एक बड़े कॉर्पाेरेट हब के रूप में मजबूती से पैर पसार चुके हैं।

इसके विपरीत, आज किसी भी सरकारी स्कूल या अस्पताल की स्थिति देखें, तो वहां पर्याप्त बजट का भारी अभाव है। छोटी से छोटी जरूरत के लिए आम जनता या दानदाताओं के सहयोग की राह देखनी पड़ती है। स्कूलों में तैनात शिक्षक और कार्मिक हर वक्त किसी श्भामाशाहश् के इंतजार में बैठे रहते हैं; यहाँ तक कि कई दैनिक जरूरतें वे अपनी निजी आय से पूरी करते हैं। यदि विद्यालयों में खेलकूद प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक उत्सव या अन्य सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करने हों, तो उनका पूरा दारोमदार केवल और केवल भामाशाहों पर ही निर्भर करता है।

जो संवेदनशील और मानवतावादी नागरिक अपनी गाढ़ी कमाई से इन सार्वजनिक सेवाओं में सहयोग करते हैं, वे निसंदेह साधुवाद के पात्र हैं। समाज के प्रति उनकी इस सेवा भावना का सर्वाेच्च सम्मान होना चाहिए लेकिन नीतिगत प्रश्न यह है कि भामाशाहों का सहयोग किसी आपातकाल या अल्पकालिक संकट के लिए तो ठीक हो सकता है, परंतु यदि हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए व्यवस्था को पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर कर दिया जाए, तो सार्वजनिक क्षेत्र का यह ढांचा अधिक दिनों तक टिक नहीं पाएगा।

सरकारी बजट में लगातार होने वाली यह कटौती अंततः सरकारी स्कूलों को निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा में पछाड़ देगी और यह पूरा तंत्र दम तोड़ देगा। यह स्थिति सरकारी कर्मचारियों और इन सेवाओं पर निर्भर गरीब व मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगी। आखिर सरकारी जिम्मेदारी से मुंह मोड़कर भामाशाहों के भरोसे कब तक व्यवस्था चलाई जा सकती है?

इन भामाशाहों की तरफ कभी ध्यान ही नहीं जो बीएड और बीएसटीसी करने वाले विद्यार्थी टीचिंग प्रेक्टिस के नाम पर विद्यालयों में बिना वेतन लिए बेगार के रूप हर साल लाखों विद्यार्थी अपनी सेवाएं देते हैं जबकि कई विभागों में सटाईपैंड (मासिक भत्ते) का प्रावधान है। इसके अलावा न्यूनतम से कम वेतन पर काम करने वाले विद्यार्थी मित्र, विद्यालय सहायक, पैरा टीचर, प्रबोधक आदि न जाने किन-किन नामों पर स्थाई और नियमित वेतन की आशा तथा समाज में फैली बेरोजगारी के डर से बरसों से काम कर रहे हैं। इसके अलावा नियमित भर्ती में 2 साल तक ष्फिक्स पेष् पर काम करने वाले लाखों कार्मिक भी भामाशाहों से कम नहीं हैं। निजी स्कूलों में काम करने की शर्तें तो किसी से छिपी हुई नहीं हैं। सरकारी स्कूलों की तुलना में ज्यादा नामांकन निजी स्कूलों में हो चुका है और वहां सारे के सारे कार्मिक नियमित से कम वेतन पर बिना पेंशन, सेवा सुरक्षा के काम कर रहे हैं वे भी बहुत बड़े भामाशाह हैं जो अपना सारा जीवन बालकों को शिक्षा देने में अर्पित कर देते हैं।

केवल भामाशाहों के चंदे से सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सभी आवश्यकताओं को पूरा करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। यह एक गंभीर नीतिगत मामला है। सार्वजनिक शिक्षा तंत्र को सुदृढ़ और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार को नियमित बजट में पर्याप्त बढ़ोतरी करनी होगी। इसके साथ ही, स्कूलों में कार्मिकों की स्थायी भर्ती और सभी आधारभूत संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना पूरी तरह से सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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