गौतम चौधरी
लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद में नहीं, सड़क पर होती है; अदालतों में नहीं, बल्कि उस क्षण होती है जब राज्य अपने सबसे कमजोर नागरिक के दरवाजे पर खड़ा होता है। किसी भी सभ्य लोकतंत्र की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसके पास कितने कठोर कानून हैं, बल्कि इस बात से होती है कि उन कानूनों का प्रयोग कितनी न्यायपूर्ण, मानवीय और समान रूप से किया जाता है। कानून का उद्देश्य समाज में व्यवस्था स्थापित करना है, नागरिकों को भयभीत करना नहीं। इसलिए जब किसी नागरिक का घर गिराने जैसी कठोर कार्रवाई की जाती है, तो प्रश्न केवल उस निर्माण की वैधता का नहीं रह जाता, बल्कि राज्य के चरित्र, संवैधानिक दायित्व और न्याय की अवधारणा का भी बन जाता है।
भारत का शहरी और ग्रामीण विकास एक जटिल सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया का परिणाम है। दशकों से अनियोजित शहरीकरण, भूमि अभिलेखों की अव्यवस्था, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, लंबी स्वीकृति प्रक्रियाएँ और आम नागरिक की सीमित आर्थिक क्षमता ने ऐसी स्थिति पैदा की है जिसमें अनेक निर्माण किसी न किसी नियम का उल्लंघन करते पाए जा सकते हैं। विभिन्न अध्ययनों और विशेषज्ञों ने समय-समय पर संकेत दिया है कि देश में बड़ी संख्या में भवन किसी न किसी स्तर पर भवन-नियमों, भूमि उपयोग या स्वीकृति संबंधी प्रावधानों से पूरी तरह मेल नहीं खाते। इसलिए यदि कानूनों को बिना विवेक और बिना प्राथमिकता के अक्षरशः लागू किया जाए, तो उसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं।
यहीं से मूल प्रश्न जन्म लेता है-क्या कानून स्वयं में अंतिम लक्ष्य है, या वह जनकल्याण का साधन है? लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का उत्तर स्पष्ट है। कानून जनता की सेवा के लिए बनाए जाते हैं; जनता कानूनों की दासी नहीं होती। संविधान का उद्देश्य भी न्याय, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा करना है। यदि कानून का अनुप्रयोग इन मूल्यों को ही नष्ट करने लगे, तो उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि अवैध निर्माण को वैध घोषित कर दिया जाए या अतिक्रमण को प्रोत्साहित किया जाए। सार्वजनिक भूमि, पर्यावरण, सड़क, नदी, वन और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा राज्य का अनिवार्य दायित्व है। किंतु कार्रवाई का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका उद्देश्य। यदि किसी परिवार का एकमात्र आश्रय उसी घर में है, तो उसे बिना पर्याप्त नोटिस, सुनवाई और वैकल्पिक व्यवस्था के बेघर कर देना मानवीय संवेदना और संवैधानिक मर्यादा-दोनों की कसौटी के विपरीत है।
भारत के न्यायालयों ने बार-बार यह सिद्धांत स्थापित किया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत-यानी नोटिस, सुनवाई और निष्पक्ष प्रक्रिया-लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला हैं। जीवन के अधिकार की व्यापक व्याख्या में सम्मानपूर्वक जीवन, आश्रय और मानवीय गरिमा को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसलिए विध्वंस की कार्रवाई केवल प्रशासनिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं हो सकती; उसे विधिसम्मत, न्यायसंगत और अनुपातिक होना चाहिए।
यहां एक और चिंता, चयनात्मक कार्रवाई की है। यदि हजारों समान प्रकृति के निर्माण मौजूद हों और कार्रवाई केवल कुछ व्यक्तियों या समूहों तक सीमित दिखाई दे, तो कानून के समान उपयोग पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कानून की सबसे बड़ी शक्ति उसकी निष्पक्षता है। यदि नागरिकों को यह विश्वास होने लगे कि कानून का प्रयोग समान रूप से नहीं, बल्कि चुनिंदा ढंग से किया जाता है, तो न्याय व्यवस्था में भरोसा कमजोर पड़ने लगता है।
सरकारों को यह भी स्वीकार करना होगा कि अनधिकृत बस्तियाँ और अवैध निर्माण केवल नागरिकों की गलती का परिणाम नहीं हैं। अनेक मामलों में प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और नियोजन की विफलताएँ भी उतनी ही जिम्मेदार होती हैं। वर्षों तक कर, बिजली, पानी और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के बाद अचानक किसी बस्ती को पूरी तरह अवैध घोषित कर देना शासन की अपनी जवाबदेही से बच निकलना नहीं हो सकता।
लोकतंत्र की मर्यादा बेहद भिन्न होती है। लोकतंत्र में कठोरता और करुणा विरोधी नहीं, बल्कि पूरक मूल्य हैं। जहाँ सार्वजनिक हित में अतिक्रमण हटाना आवश्यक हो, वहाँ भी पुनर्वास, वैकल्पिक आवास, पर्याप्त समय, पारदर्शी प्रक्रिया और मानवीय दृष्टिकोण को नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। विकास तभी न्यायपूर्ण कहलाएगा जब वह नागरिकों की गरिमा की रक्षा करते हुए आगे बढ़े।
ऐसी परिस्थिति में प्रश्न केवल मकानों का नहीं, बल्कि शासन-दर्शन का है। क्या राज्य अपने नागरिकों को समस्या मानकर चलेगा, या उन्हें अपने संरक्षण का विषय समझेगा? कानून की प्रतिष्ठा तभी बनी रहती है जब वह न्याय का माध्यम बने, भय का नहीं। एक लोकतांत्रिक गणराज्य की सफलता इसी संतुलन में निहित है कि वह कानून का शासन भी बनाए रखे और नागरिकों की गरिमा तथा अधिकारों की भी समान रूप से रक्षा करे।
