‘‘हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से ….’’ : अकबर इलाहाबादी के एक शेर के बहाने इस्लाम और भारतीय दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन

‘‘हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से ….’’ : अकबर इलाहाबादी के एक शेर के बहाने इस्लाम और भारतीय दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन

उर्दू शायरी में ऐसे अनेक शेर मिलते हैं जो केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक विमर्श को जन्म देते हैं। इस्लाम का एक रूप यह भी है, जिसकी आलोचना तो होती है लेकिन दुनिया भर में इस्लाम के विस्तार में इसकी बड़ी भूमिका है। अकबर इलाहाबादी का यह शेर भी उन्हीं में से एक है। पहली पंक्ति इस्लामी अध्यात्म के लिए सहज प्रतीत होती है, जबकि दूसरी पंक्ति पाठक को एक गहरे और जटिल विमर्श के लिए प्रेरित करता है। क्या यह शेर इस्लामी ‘तौहीद’ का विस्तार है, या उसकी सीमाओं का अतिक्रमण? या फिर यह भारतीय अद्वैत और सूफ़ी अनुभव के बीच किसी गहरे संवाद का संकेत है?

पहली पंक्ति-‘हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से’ क़ुरआन की उस विश्वदृष्टि के अत्यंत निकट है जिसमें संपूर्ण सृष्टि को ईश्वर की आयत (निशानी) माना गया है। क़ुरआन बार-बार मनुष्य को आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नक्षत्र, वर्षा और जीव-जगत में ईश्वर की निशानियाँ देखने का आह्वान करता है। इस दृष्टि से प्रत्येक कण ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिंब है। यहाँ तक इस शेर पर किसी इस्लामी धर्मशास्त्री को विशेष आपत्ति नहीं होगी। लेकिन दूसरा मिसरा-‘हर साँस ये कहती है, हम हैं तो ख़ुदा भी है’ एक नया प्रश्न खड़ा करता है।

यदि इसका शाब्दिक अर्थ लिया जाए, तो यह इस्लामी तौहीद के मूल सिद्धांत से मेल नहीं खाता। इस्लाम में अल्लाह का अस्तित्व किसी मनुष्य, किसी पैग़म्बर या किसी सृष्टि पर निर्भर नहीं है। वह अल-अव्वल (सबसे पहले), अल-आख़िर (सबके बाद), अल-क़य्यूम (स्वतः स्थित) और अस-समद (स्वयं-पर्याप्त) है। इसलिए ‘हम हैं, इसलिए ख़ुदा है’ जैसी व्याख्या इस्लामी कलाम की कसौटी पर स्वीकार्य नहीं होगी।

किन्तु यदि इस शेर को धर्मशास्त्र नहीं, बल्कि सूफ़ियाना काव्य के रूप में पढ़ा जाए, तो अर्थ बदल जाता है। यहाँ ‘हम’ मनुष्य का अहंकार नहीं, बल्कि चेतना है। तब यह कथन इस अर्थ में पढ़ा जा सकता है कि हमारी प्रत्येक साँस ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव कराती है। अर्थात् मनुष्य ईश्वर का कारण नहीं, बल्कि उसके अनुभव का माध्यम है।

यहीं से भारतीय दर्शन के साथ संवाद प्रारंभ होता है। उपनिषद कहते हैं-‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। ईशावास्य उपनिषद उद्घोष करता है-‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ जो कुछ भी है, वह ईश्वर से आच्छादित है। अद्वैत वेदांत में ब्रह्म ही अंतिम सत्य है और जगत उसी की अभिव्यक्ति है। इस दृष्टि से पहला मिसरा भारतीय वेदांत से भी सहज सामंजस्य स्थापित करता है।

परंतु दूसरा मिसरा अद्वैत की याद दिलाते हुए भी उससे अलग है। शंकराचार्य का अद्वैत अंततः जीव और ब्रह्म की अभिन्नता की बात करता है, जबकि इस्लाम सृष्टा और सृष्टि के बीच एक स्पष्ट भेद बनाए रखता है। यही कारण है कि सूफ़ी परंपरा में इब्न अरबी की ‘वहदत-उल-वजूद’ की अवधारणा और मुख्यधारा इस्लामी धर्मशास्त्र के बीच लंबे समय तक बहस चलती रही।

यदि भारतीय परंपरा में इस शेर का सबसे निकटतम दार्शनिक समांतर खोजा जाए, तो वह केवल अद्वैत नहीं, बल्कि विशिष्टाद्वैत भी हो सकता है। रामानुजाचार्य के अनुसार जीव और जगत ईश्वर से पूर्णतः अलग भी नहीं हैं और पूर्णतः एक भी नहीं हैं। वे ईश्वर के शरीर की भाँति उससे अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। तब ‘हर ज़र्रा अनवार-ए-इलाही से चमकता है’ का अर्थ अधिक संतुलित रूप में समझा जा सकता है-सृष्टि ईश्वर नहीं है लेकिन ईश्वर से असंबद्ध भी नहीं है।

इसी प्रकार कबीर कहते हैं-‘मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।’ और गुरु नानक देव उद्घोष करते हैं-‘एक ओंकार सतनाम।’ इन परंपराओं में ईश्वर बाहर से अधिक भीतर के अनुभव का विषय बन जाता है। अकबर इलाहाबादी का शेर भी शायद इसी अनुभव की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।

फिर भी सावधानी आवश्यक है। साहित्य और धर्मशास्त्र एक ही भाषा नहीं बोलते। कवि को वह स्वतंत्रता प्राप्त होती है जो धर्मशास्त्री को नहीं। यदि इस शेर को इस्लाम का सिद्धांत मान लिया जाए, तो यह विवाद उत्पन्न करेगा; यदि इसे काव्यात्मक अनुभूति माना जाए, तो यह विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद का सुंदर माध्यम बन सकता है।

यही इस शेर की सबसे बड़ी शक्ति है। यह अंतिम उत्तर नहीं देता; बल्कि प्रश्न खड़े करता है। वह हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि क्या ईश्वर केवल धर्मग्रंथों का विषय है, या प्रत्येक श्वास, प्रत्येक चेतना और प्रत्येक कण में अनुभव की जाने वाली वास्तविकता भी?

शायद अकबर इलाहाबादी का उद्देश्य किसी नए धर्मशास्त्र की रचना करना नहीं था। वे यह संकेत देना चाहते थे कि जब मनुष्य अपने भीतर और बाहर एक ही दिव्य प्रकाश का अनुभव करता है, तब मज़हबों की दीवारें संवाद में बदलने लगती हैं। इस अर्थ में यह शेर न तो इस्लाम का निषेध है और न भारतीय दर्शन की पुनरावृत्ति; बल्कि दोनों के बीच एक ऐसे बौद्धिक सेतु का निमंत्रण है, जिस पर चलने के लिए श्रद्धा जितनी आवश्यक है, उतनी ही बौद्धिक विनम्रता भी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »