गौतम चौधरी
वक़्फ़ इस्लाम की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थाओं में से एक है। सदियों से मस्जिदें, कब्रिस्तान, मदरसे, अनाथालय, दरगाहें और अनेक धर्मार्थ संस्थान उन संपत्तियों पर संचालित होते रहे हैं जिन्हें आम मुसलमानों ने अल्लाह के नाम पर समाज की भलाई के लिए समर्पित किया है। इन संपत्तियों का उद्देश्य किसी व्यक्ति, परिवार या संगठन का हित नहीं, बल्कि समुदाय और मानवता की सेवा है।
फिर भी एक गंभीर प्रश्न लगातार उठता है। यदि वक़्फ़ के पास देशभर में विशाल संपत्ति है, तो उसका लाभ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक कल्याण के रूप में अपेक्षित स्तर पर क्यों दिखाई नहीं देता? यह प्रश्न किसी संस्था को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य को पुनः स्थापित करने के लिए पूछा जाना चाहिए। यही प्रश्न जब मुफ्ती अब्दुल्ला अजहर कासमी साहब से पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘‘निःसंदेह वक्फ की संपत्ति पर आज चंद परिवार और समुदायों का कब्जा है। यही कारण है कि उससे आम मुस्लिम समाज लाभान्वित नहीं हो पा रहे हैं। यदि उस संपत्ति को आम के काम में लगाया जाए तो मुस्लिम-ए-हिंद का कायाकल्प हो सकता है।’’
जब भी वक़्फ़ प्रशासन में सुधार या पारदर्शिता की बात होती है, तो अक्सर इसे सरकारी हस्तक्षेप या धार्मिक स्वायत्तता पर हमले के रूप में देखा जाता है। वक़्फ़ की स्वायत्तता निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन स्वायत्तता का अर्थ जवाबदेही से मुक्त होना नहीं हो सकता। किसी भी सार्वजनिक या धर्मार्थ संस्था की विश्वसनीयता उसके पारदर्शी संचालन से ही बनती है। इस मामले में भी कासमी साहब का अपना रुख है, वे कहते हैं, ‘‘हम हिंदुस्तान के मुसलमान सरकार के साथ हैं लेकिन वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिमों को सदस्य बनाना हमारे साथ अन्याय है।’’ मुफ्ती साहब आगे कहते हैं, ‘‘मैं मानता हूं कि इसमें सरकार की मंशा ठीक ही होगी लेकिन क्या किसी हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड में मुसलमान सदस्य हो सकता है? हम वक्फ के ऑडिट आदि नियमों के लिए सरकार का समर्थन करते हैं लेकिन गैर मुस्लिम का हस्तक्षेप हम बरदास्त नहीं कर सकते।’’
इधर वक्फ को लेकर और कई चौकाने वाले मामले सामने आए हैं। हाल में जयपुर के जामियातुल हिदाया ट्रस्ट से जुड़े भूमि लेनदेन को लेकर विवाद सामने आया है। इस मामले में कुछ प्रमुख व्यक्तियों के विरुद्ध शिकायतें और एफआईआर दर्ज हुई हैं। संबंधित पक्षों ने सभी आरोपों से इनकार किया है और अपने लेनदेन को वैध बताया है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया पर ही छोड़ना चाहिए। किसी पर आरोप लगना और दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं लेकिन मामला तो है। यह मामला गंभीर भी है। इसको लेकर विवाद पैदा हो रहा है। ऐसे विवाद एक व्यापक प्रश्न खड़ा करता है। यदि वक़्फ़ जैसी सामुदायिक संस्था से जुड़े मामलों पर प्रश्न उठते हैं, तो क्या समुदाय को पारदर्शिता की मांग नहीं करनी चाहिए? क्या जवाबदेही को धर्म या समुदाय पर हमला मान लेना उचित है? प्रश्न बेहद गंभीर है।
इस गंभीर प्रश्न पर मुफ्ती साहब का कहाना है, ‘‘इस्लामी परंपरा स्वयं अमानत, ईमानदारी और न्याय पर आधारित है। क़ुरान और पैग़म्बर मुहम्मद सल्लाहो वसल्लम की शिक्षाएँ सार्वजनिक संपत्ति और विश्वास की रक्षा पर विशेष बल देती हैं। इसलिए वक़्फ़ संपत्तियों के पारदर्शी प्रबंधन की मांग इस्लाम-विरोधी नहीं, बल्कि इस्लामी मूल्यों के अनुरूप है।’’
वास्तविक चिंता यह है कि यदि वक़्फ़ संपत्तियों का प्रभावी प्रबंधन नहीं होता, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आम मुसलमानों को उठाना पड़ता है। जिन संसाधनों से विद्यालय, छात्रवृत्तियाँ, अस्पताल, कौशल विकास केंद्र और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम संचालित हो सकते थे, वे अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच पाते। यदि वक़्फ़ संपत्तियों का वैज्ञानिक, पारदर्शी और पेशेवर ढंग से प्रबंधन किया जाए, तो वे मुस्लिम समाज के सामाजिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
समय आ गया है कि वक़्फ़ प्रशासन में कुछ बुनियादी सुधारों पर गंभीरता से विचार किया जाए। सभी वक़्फ़ संपत्तियों का डिजिटल अभिलेखीकरण और मानचित्रण हो, नियमित ऑडिट सार्वजनिक किए जाएँ, आय-व्यय का विवरण उपलब्ध कराया जाए, पट्टा और विकास संबंधी समझौतों में पारदर्शिता लाई जाए तथा स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था को प्रोत्साहित किया जाए। धार्मिक प्रतिष्ठा या सामाजिक प्रभाव किसी भी संस्था या व्यक्ति को सार्वजनिक जवाबदेही से ऊपर नहीं रख सकता।
वक़्फ़ की प्रतिष्ठा केवल बाहरी आलोचनाओं का विरोध करने से नहीं बचेगी, बल्कि अपने भीतर सर्वाेच्च स्तर की ईमानदारी और पारदर्शिता स्थापित करने से मजबूत होगी। जयपुर विवाद का अंतिम कानूनी परिणाम चाहे जो हो, उसने एक महत्वपूर्ण संदेश अवश्य दिया है-‘‘पारदर्शिता वक़्फ़ के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।’’ मुफ्ती साहब कहते हैं, ‘‘वक़्फ़ समुदाय की धरोहर है। उसकी रक्षा का सर्वोत्तम मार्ग यह सुनिश्चित करना है कि उसका प्रत्येक संसाधन उसी उद्देश्य की पूर्ति करे, जिसके लिए उसे समर्पित किया गया है-समाज की सेवा, न्याय और जनकल्याण।’’
