अक्षपाद् गौतम
जॉर्जिया मेलोनी को लेकर भारतीय राजनीति और सोशल मीडिया में इन दिनों जिस तरह की बहस दिखाई दे रही है, उसमें एक अजीब-सा विरोधाभास है। एक तरफ उनकी राजनीतिक विचारधारा, उनकी पार्टी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक विचारों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए; दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मित्रतापूर्ण तस्वीरों और सोशल मीडिया की ‘Melodi’ कथा को लेकर व्यक्तिगत और लगभग रोमांटिक व्याख्याओं का बाजार गर्म है। इसी बीच मेलोनी को लेकर की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर राजनीतिक नैतिकता का सवाल भी खड़ा हो गया है।
इस पूरे विवाद को केवल यह पूछकर समाप्त कर देना कि मेलोनी का अपमान हुआ या नहीं, वास्तविक प्रश्नों से बच निकलना होगा। असली सवाल इससे बड़ा है, क्या भारतीय राजनीति ने महिला नेताओं के सम्मान, राजनीतिक आलोचना और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा के लिए अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग कसौटियाँ बना रखी हैं?
यहीं से यह विवाद मेलोनी से आगे बढ़कर भारतीय राजनीतिक संस्कृति का आईना बन जाता है।
जॉर्जिया मेलोनी यूरोप की प्रमुख दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी नेताओं में से एक हैं। मेलोनी की पताका पूरे यूरोप में फहरा रही है। उनकी पार्टी Fratelli d’Italia यानी Brothers of Italy की ऐतिहासिक जड़ें युद्धोत्तर इटली की उस राजनीतिक परंपरा में हैं जिसका संबंध इतालवी फासीवादी विरासत से रहा है। इसलिए उनकी पार्टी की वैचारिक यात्रा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
इस मामले में इतिहास और वर्तमान को एक ही वाक्य में मिला देना भी उचित नहीं होगा। मेलोनी ने सत्ता में आने के बाद स्वयं को यूरोपीय संस्थाओं, NATO और पश्चिमी गठबंधनों के भीतर एक व्यावहारिक नेता के रूप में स्थापित किया है। वह दक्षिणपंथी हैं, राष्ट्रवादी हैं, पारंपरिक परिवार और ईसाई सांस्कृतिक पहचान के प्रश्नों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखती हैं और आव्रजन पर कठोर रुख अपनाती हैं लेकिन उन्हें सीधे-सीधे समकालीन इटली में “मुसोलिनी की पुनरावृत्ति” कह देना एक जटिल राजनीतिक वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
यही फर्क आलोचना और प्रचार के बीच होता है। मेलोनी की राजनीति की आलोचना जितनी कठोर होनी चाहिए, उतनी ही तथ्यपरक भी।
मोदी और मेलोनी की मित्रतापूर्ण तस्वीरों का सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना कोई रहस्य नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि ‘Melodi’ शब्द केवल भारतीय समर्थकों की खोज नहीं था। मेलोनी ने स्वयं मोदी के साथ एक तस्वीर साझा करते हुए #Melodi का इस्तेमाल किया था।
इसके बाद सोशल मीडिया ने अपना काम किया। तस्वीरें आई, मीम बने, वीडियो वायरल हुए, प्रशंसकों ने इसे एक राजनीतिक “केमिस्ट्री” में बदल दिया और दोनों नेताओं ने भी समय-समय पर इस डिजिटल नैरेटिव के साथ खेला।
यहाँ तक तो इसे आधुनिक राजनीतिक संचार कहा जा सकता है। आज की कूटनीति में कैमरा, सोशल मीडिया, व्यक्तिगत संबंध और सार्वजनिक हास्य भी उपकरण हैं। राष्ट्राध्यक्षों की अनौपचारिक तस्वीरें नई बात नहीं हैं। मोदी और मेलोनी के बीच व्यक्तिगत सौहार्द भारत-इटली संबंधों के लिए सकारात्मक वातावरण भी बना सकता है।
सवाल तब पैदा होता है जब कूटनीतिक मित्रता को लगातार सेलिब्रिटी-कपल की भाषा में पेश किया जाने लगे। जब कोई राष्ट्राध्यक्ष स्वयं मजाक में कहता है कि हम “इंटरनेट के सबसे चर्चित कपल” हैं, तो वह केवल दो नेताओं की दोस्ती नहीं रह जाती, वह राजनीतिक संचार का हिस्सा बन जाती है।
इस पर सवाल उठाना किसी की अवमानना नहीं है। क्या Melodi को रोमांस बनाना स्त्री-विरोधी भी हो सकता है? यहाँ एक महत्वपूर्ण उलटा प्रश्न भी पूछा जाना चाहिए।
किसी महिला नेता के अपने “feminine charm” से किसी पुरुष नेता को प्रभावित करने की कहानी गढ़ना सुनने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन यह तर्क स्वयं महिला की राजनीतिक Agency को कम कर देता है। मेलोनी कोई सामान्य सार्वजनिक हस्ती नहीं, इटली की निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं। उन्हें उनके विचारों, नीतियों और राजनीतिक निर्णयों से परखा जाना चाहिए, न कि इस आधार पर कि उन्होंने किसी पुरुष नेता को अपने आकर्षण से “फिसला” दिया।
इसी तरह मोदी को भी किसी विदेशी महिला को “जीत लेने वाले” पुरुष के रूप में प्रस्तुत करना उनके राजनीतिक पद और भारत की विदेश नीति को एक हास्यास्पद व्यक्तिगत आख्यान में बदल देता है।
दोनों ही दृष्टियाँ राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। एक महिला नेता की मित्रता को उसकी देह या आकर्षण से समझना और एक पुरुष नेता की सफलता को किसी विदेशी महिला को जीत लेने की उपलब्धि बताना, दोनों एक ही पितृसत्तात्मक मानसिकता के दो रूप हैं।
भारतीय परंपरा में स्त्री के प्रति सम्मान, संयम, मातृभाव और चरित्र की अवधारणाएँ गहरी रही हैं। सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत मर्यादा को भी लंबे समय से राजनीतिक गुण के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है लेकिन फिर एक विचित्र विरोधाभास सामने आता है।
जब यही राजनीतिक संस्कृति अपने विरोधी नेताओं के निजी जीवन पर चर्चा करती है तो संकेत, कटाक्ष, अफवाह और चरित्र-हनन तक पहुँच जाती है। नेहरू और एडविना के संबंधों को लेकर दशकों तक राजनीति की गई। सोनिया गांधी के लिए “बार-बाला” जैसे अपमानजनक शब्द इस्तेमाल किए गए और राहुल गांधी की मातृवंशीय पृष्ठभूमि पर भी बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं।
वही राजनीतिक-सामाजिक वातावरण जब मोदी और मेलोनी की तस्वीरों को “Melodi“, “केमिस्ट्री” और “कपल” की भाषा में प्रस्तुत करता है, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि नैतिकता का पैमाना आखिर तय कौन करता है?
यदि निजी समीपता गलत है तो सबके लिए गलत होनी चाहिए। यदि राजनीतिक मित्रता सामान्य कूटनीतिक व्यवहार है तो सबके लिए सामान्य होनी चाहिए। लोकतंत्र में नैतिकता की सबसे पहली कसौटी यही है कि जिस सिद्धांत को हम अपने विरोधी पर लागू करते हैं, उसे अपने पक्ष पर भी लागू करने का साहस रखें।
स्त्री का सम्मान दल देखकर क्यों बदल जाता है? यह विवाद शायद इसी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाता है। राजनीतिक दल और उनके समर्थक अक्सर महिलाओं के प्रति अपनी भाषा का चुनाव उनके राजनीतिक पक्ष के आधार पर करते हैं। अपने पक्ष की महिला “शक्ति”, “नारी नेतृत्व” और “मातृशक्ति” बन जाती है, जबकि विरोधी पक्ष की महिला के लिए व्यक्तिगत जीवन, पहनावे, संबंधों और चरित्र को राजनीतिक हथियार बना दिया जाता है।
यह केवल भाजपा या कांग्रेस की समस्या नहीं है। यह भारतीय राजनीतिक संस्कृति की व्यापक समस्या है। इसलिए मेलोनी के संदर्भ में भी सही कसौटी यही होनी चाहिए। उनकी दक्षिणपंथी राजनीति की आलोचना कीजिए। उनके उनके Immigration policy पर प्रश्न उठाइए। LGBTQ अधिकारों, Abortion और “Gender Ideology” पर उनके विचारों से असहमति जताइए। उनकी पार्टी की ऐतिहासिक जड़ों की पड़ताल कीजिए।
उनके स्त्री होने को राजनीतिक आलोचना का हथियार मत बनाइए। ठीक इसी तरह मोदीदृमेलोनी की डिजिटल “केमिस्ट्री” पर सवाल उठाइए, लेकिन उसे किसी काल्पनिक प्रेम-संबंध में बदलकर किसी की निजी गरिमा पर हमला मत कीजिए।
यदि मेलोनी को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी संदीप दीक्षित की थी, तो उसे राहुल गांधी के खाते में डालना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। व्यक्ति विशेष की जिम्मेदारी व्यक्ति विशेष की ही होनी चाहिए। इस मामले में यह भी उतना ही सच है कि असावधान क्षण में कही गई बात भी सार्वजनिक जीवन में अपना प्रभाव छोड़ती है।
किसी महिला विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के बारे में ऐसी टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए थी और यहाँ कांग्रेस से अपेक्षा अधिक होनी चाहिए, कम नहीं। कांग्रेस यदि स्वयं को लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और उदार राजनीतिक परंपरा का प्रतिनिधि मानती है तो उसे अपने विरोधियों की असंसदीय भाषा का प्रतिरूप नहीं बनना चाहिए।
किसी दूसरे की राजनीतिक गिरावट हमारी नैतिक ऊँचाई का लाइसेंस नहीं बन सकती। यही राजनीतिक मर्यादा का न्यूनतम सिद्धांत है।
यह सिद्धांत कांग्रेस तक सीमित नहीं रह सकता। यदि कांग्रेस नेताओं की किसी महिला विदेशी राष्ट्राध्यक्ष पर टिप्पणी को लेकर भाजपा सही रूप से आपत्ति करती है, तो उसे अपने समर्थक समूहों द्वारा विपक्ष की महिला नेताओं के विरुद्ध की जाने वाली आपत्तिजनक टिप्पणियों पर भी उसी कठोरता से प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
सोनिया गांधी हों, प्रियंका गांधी हों, ममता बनर्जी हों, स्मृति ईरानी हों या कोई विदेशी महिला नेता-राजनीतिक असहमति स्त्री के चरित्र पर हमला करने का लाइसेंस नहीं है। जिस दिन राजनीतिक दल अपने समर्थकों के लिए भी वही मर्यादा लागू करने लगेंगे जो वे विरोधियों के लिए मांगते हैं, उस दिन भारतीय राजनीति में वास्तविक परिवर्तन शुरू होगा।
इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि दो राष्ट्राध्यक्षों की बैठक का वास्तविक एजेंडा व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, प्रवासन या रणनीतिक सहयोग है, लेकिन मीडिया का बड़ा हिस्सा केवल उनकी तस्वीरों, हँसी-मजाक और कथित “केमिस्ट्री” पर केंद्रित हो जाए, तो वह कूटनीति को मनोरंजन में बदल देता है।
यह केवल सत्ता समर्थक मीडिया की समस्या नहीं है। सत्ता विरोधी मीडिया भी कभी-कभी उसी सनसनीखेज मॉडल का इस्तेमाल करता है, बस उसका निष्कर्ष अलग होता है। राजनीतिक पत्रकारिता का काम नेताओं की प्रेम-कहानियाँ गढ़ना नहीं, सत्ता के निर्णयों की पड़ताल करना है।
मोदी और मेलोनी वास्तव में क्या बातचीत करते हैं? भारत-इटली व्यापार कितना बढ़ा? रक्षा सहयोग क्या है? यूरोप में भारत की भूमिका क्या है? Mediterranean और Indo-Pacific रणनीतियों में दोनों देशों की संभावित साझेदारी क्या है?
