गौतम चौधरी
झारखंड में खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर केंद्र और राज्य सरकार आमने-सामने हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे राज्यों के अधिकार और वित्तीय स्वायत्तता पर चोट बताया है, जबकि भाजपा इसे खनन क्षेत्र में पारदर्शिता, निवेश और राष्ट्रीय बाजार को एकरूप बनाने वाला सुधार बता रही है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने तो झामुमो-कांग्रेस के विरोध को छात्रों के आंदोलन से जनता का ध्यान भटकाने वाला राजनीतिक नाटक तक करार दिया है।
सियासी अखाड़ा/ खादान पर महासंग्राम/ झारखंड #भाजपा प्रवक्ता #मृत्युंजय_शर्मा से खास बातचीत।
इस विवाद को केवल भाजपा बनाम झामुमो की राजनीतिक लड़ाई मानना वास्तविक प्रश्न को छोटा कर देना होगा। असली सवाल है-’’खनिज-संपन्न राज्य के संसाधनों पर राज्य का कितना अधिकार हो और राष्ट्रीय बाजार के हित में केंद्र की कितनी भूमिका हो?’’
विवाद का संवैधानिक आधार भी गंभीर है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि रॉयल्टी कर नहीं है और राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति प्राप्त है। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि संसद कानून बनाकर इस शक्ति को सीमित कर सकती है। डडक्त् संशोधन इसी संवैधानिक क्षेत्र में नई सीमाएं निर्धारित करता है। इसलिए इसे महज किसी राज्य सरकार की सुविधा या केंद्र सरकार की प्रशासनिक जरूरत का प्रश्न नहीं माना जा सकता।
केंद्र का तर्क भी पूरी तरह निराधार नहीं है। यदि अलग-अलग राज्य खनिजों पर मनमाने या अत्यधिक उपकर लगाते हैं तो उत्पादन लागत बढ़ सकती है, उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है और राष्ट्रीय खनिज बाजार खंडित हो सकता है। बाबूलाल मरांडी ने इसी संदर्भ में लौह अयस्क पर झारखंड के ₹600 प्रति टन उपकर की तुलना छत्तीसगढ़ के ₹22.50 से की है। कोयले पर उपकर बढ़ने का भी उन्होंने उल्लेख किया है। इन दावों की स्वतंत्र और विस्तृत जांच जरूरी है, लेकिन मूल आर्थिक प्रश्न महत्वपूर्ण हैकृ’’क्या खनिज राजस्व बढ़ाने की कोशिश कहीं खनिज आधारित अर्थव्यवस्था को ही महंगा तो नहीं बना रही?’’
दूसरी ओर, राज्य की चिंता को भी खारिज नहीं किया जा सकता। झारखंड की धरती से निकलने वाले कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिज केवल राष्ट्रीय उद्योगों के लिए कच्चा माल नहीं हैं; वे राज्य की अर्थव्यवस्था, स्थानीय रोजगार और विकास के महत्वपूर्ण आधार हैं। यदि नए केंद्रीय प्रावधानों से Mineral Bearing Land Cess जैसी संभावित आय प्रभावित होती है, तो राज्य को उसके वित्तीय परिणामों पर सवाल उठाने का अधिकार है। मुख्यमंत्री की ओर से लगभग ₹7,110 करोड़ सालाना संभावित आय का जो आंकड़ा सामने आया है, उसे अंतिम नुकसान मानने के बजाय मद-दर-मद कानूनी और वित्तीय विश्लेषण की जरूरत है।
यहीं भाजपा का दूसरा तर्क भी जांच के योग्य है। मरांडी का कहना है कि रॉयल्टी,DMF, NMET, नीलामी प्रीमियम और GST में राज्यों की हिस्सेदारी बनी रहेगी तथा खनन क्षेत्र से होने वाले भुगतानों का लगभग 90 प्रतिशत राज्यों को मिलता रहेगा। उन्होंने 2014-15 से 2024-25 के बीच राज्यों के खनिज राजस्व में लगभग 354 प्रतिशत वृद्धि का आंकड़ा भी दिया है। यदि ये आंकड़े सही हैं तो “केंद्र राज्यों का पूरा खनिज राजस्व छीन रहा है” जैसी राजनीतिक भाषा निश्चित रूप से अतिरंजित होगी। लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि प्रस्तावित संशोधन का संघीय प्रभाव नगण्य है।
सबसे असुविधाजनक सवाल झारखंड सरकार से पूछा जाना चाहिए। यदि राज्य के पास विशाल खनिज भंडार है तो उसका आर्थिक उपयोग कितना प्रभावी है? मरांडी के अनुसार पिछले छह वर्षों में झारखंड ने केवल चार खदानों की नीलामी की और इनमें से एक भी संचालन में नहीं आ सकी, जबकि ओडिशा ने 35 खदानें चालू कर लगभग ₹87,000 करोड़ का नीलामी प्रीमियम अर्जित किया। इसी तरह उनके अनुसार 2018-19 से 2024-25 के बीच ओडिशा का लौह अयस्क उत्पादन लगभग 120 से बढ़कर 180 मिलियन टन हुआ, जबकि झारखंड लगभग 23 मिलियन टन पर ठहरा रहा।
इन आंकड़ों की भी स्वतंत्र पुष्टि और संदर्भ आवश्यक है, लेकिन यदि तस्वीर मोटे तौर पर ऐसी ही है तो झारखंड सरकार केवल केंद्र पर दोष डालकर बच नहीं सकती। ’’खनिज-संपदा से अधिक राजस्व मांगना उचित है, लेकिन पहले यह बताना होगा कि उपलब्ध खनिज संसाधनों का अधिकतम और टिकाऊ उपयोग क्यों नहीं हो रहा।’’
DMF भी इसी सवाल को सामने लाता है। झारखंड में लगभग ₹19,000 करोड़ क्डथ् राशि जमा होने और पश्चिमी सिंहभूम में लगभग ₹3,700 करोड़ होने का दावा किया गया है। यदि इतनी बड़ी राशि उपलब्ध है तो खनन प्रभावित गांवों में उसका वास्तविक असर कितना दिखाई देता है? यह प्रश्न केंद्र और राज्य दोनों से पूछा जाना चाहिए, क्योंकि खनिज नीति की सफलता केवल राजस्व संग्रह से नहीं, बल्कि प्रभावित समुदायों के जीवन में सुधार से भी मापी जानी चाहिए।
यहीं इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा खतरा है-राजनीति। छात्रों के आंदोलन, भर्ती परीक्षाओं और अन्य राज्य सरकार-विरोधी मुद्दों के बीच MMDR को जोड़कर देखना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकता है लेकिन इससे खनिज नीति का वास्तविक प्रश्न धुंधला पड़ता है। इसी तरह संसद में चर्चा के दौरान झामुमो-कांग्रेस सांसदों की कथित अनुपस्थिति को आधार बनाकर पूरे विरोध को खारिज कर देना भी पर्याप्त तर्क नहीं है।
झारखंड को यह बताना होगा कि उसकी लेवी से खनिज की कीमत कितनी बढ़ी, उद्योगों पर उसका क्या असर पड़ा, नई खदानों की नीलामी और संचालन में देरी क्यों हुई और DMF की राशि का उपयोग कितना प्रभावी रहा। केंद्र को भी स्पष्ट करना होगा कि राज्यों की कराधान शक्ति पर नई सीमाएं क्यों आवश्यक हैं, उनका संवैधानिक आधार क्या है और संभावित राजस्व प्रभाव की भरपाई या वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी।
आखिरकार सवाल यह नहीं कि ’’खनिज पर अधिकार रांची का है या दिल्ली का।’’ सवाल यह है कि झारखंड की धरती से निकलने वाली सीमित संपदा का लाभ झारखंड के लोगों, राज्य के उद्योगों और पूरे देश के बीच किस न्यायपूर्ण, पारदर्शी और टिकाऊ तरीके से बांटा जाए।
केंद्र को राष्ट्रीय बाजार के नाम पर राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता कमजोर नहीं करनी चाहिए। झारखंड सरकार को भी राज्याधिकार के नाम पर ऐसी खनिज नीति का बचाव नहीं करना चाहिए जो उत्पादन, निवेश और स्थानीय रोजगार को नुकसान पहुंचाए।
’’खनिज-संपदा पर राजनीति आसान है, उसे न्यायपूर्ण और कुशल ढंग से संचालित करना कठिन। MMDR विवाद की असली परीक्षा इसी कठिन सवाल पर होगी।’’
