अफगान महिलाओं की कैद होती आजादी, चिंता से आगे बढ़कर कार्रवाई की जरूरत

अफगान महिलाओं की कैद होती आजादी, चिंता से आगे बढ़कर कार्रवाई की जरूरत

गौतम चौधरी

अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता एक बार फिर गहरा गई है। पश्चिमी अफगानिस्तान के हेरात शहर में तालिबान अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर ’’हिजाब संबंधी नियमों के उल्लंघन के आरोप में कम से कम 30 महिलाओं को हिरासत में लिए जाने’’ की खबर ने इस बहस को फिर-से तेज कर दिया है कि अफगान महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय आखिर कितना प्रभावी हस्तक्षेप कर पा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) की रिपोर्ट में सामने आई इस घटना के अनुसार, हेरात के इंजिल जिले में तालिबान अधिकारियों ने महिलाओं के पहनावे से जुड़े नियमों को लागू करने के लिए सुरक्षा अभियान चलाया। इसी दौरान कई महिलाओं को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई। हालांकि स्थानीय तालिबान अधिकारियों ने इन गिरफ्तारियों की खबरों से इनकार किया है। इसलिए इन आरोपों को फिलहाल ’’रिपोर्टों में सामने आए दावे’’ के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

इस घटना के बाद हुए कथित विरोध-प्रदर्शन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। रिपोर्टों के मुताबिक प्रदर्शन में महिलाएं, पुरुष और बच्चे शामिल हुए। तालिबान सुरक्षा बलों द्वारा गोली चलाने और लाठीचार्ज किए जाने के आरोप भी लगे हैं। इन घटनाओं में कम से कम दो लोगों के मारे जाने और 20 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर है। यदि ये आरोप स्वतंत्र जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह केवल महिलाओं के पहनावे पर नियंत्रण का मामला नहीं, बल्कि ’’शांतिपूर्ण विरोध और नागरिक अधिकारों के दमन’’ का भी गंभीर प्रश्न होगा।

यहां एक मूलभूत प्रश्न उठता है-किसी महिला का पहनावा उसकी व्यक्तिगत आस्था और पसंद का विषय होना चाहिए या राज्य की ओर से दंडनीय नियम के रूप में थोपा जा सकता है?

हिजाब पहनना किसी महिला की धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत पसंद हो सकता है लेकिन उसी तरह किसी महिला को किसी विशेष तरीके से कपड़े पहनने के लिए बाध्य करना भी उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है। इसलिए महिला अधिकारों की बहस का मूल प्रश्न ’’हिजाब के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं’’, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि महिला को अपने शरीर और पहनावे के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले।

यही सिद्धांत लोकतांत्रिक और मानवाधिकार आधारित व्यवस्था का आधार है-’’न तो हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया जाए और न हिजाब उतारने के लिए।’’ अफगानिस्तान में समस्या इससे कहीं व्यापक है।

2021 में सत्ता में लौटने के बाद तालिबान ने महिलाओं और लड़कियों के सार्वजनिक जीवन पर लगातार कठोर प्रतिबंध लगाए हैं। शिक्षा, रोजगार, खेल, सार्वजनिक गतिविधियों और आवाजाही से जुड़े अनेक प्रतिबंधों ने महिलाओं के जीवन के दायरे को बेहद सीमित कर दिया है।

लड़कियों की शिक्षा पर लगाए गए प्रतिबंधों ने एक पूरी पीढ़ी के भविष्य को प्रभावित किया है। महिलाओं की रोजगार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी सीमित होने से परिवारों की आय, देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास पर भी असर पड़ा है।

यह समझना जरूरी है कि ’’महिलाओं की शिक्षा केवल महिला अधिकार का प्रश्न नहीं है।’’ यह किसी भी समाज के आर्थिक और सामाजिक भविष्य का भी प्रश्न है। जिस देश की आधी आबादी को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक निर्णय-प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए, वहां विकास की संभावनाएं स्वाभाविक रूप से कमजोर होंगी।

अफगानिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की शिकायत में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय लंबे समय से चिंता व्यक्त कर रहा है लेकिन जमीन पर बदलाव नहीं के बराबर है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न देशों की सरकारें तालिबान की नीतियों पर लगातार आपत्ति जताती रही हैं लेकिन दबाव बनाने में कामयाब नहीं रही है।

अगर किसी सरकार द्वारा महिलाओं को शिक्षा से वंचित किया जाता है, रोजगार के अवसर सीमित किए जाते हैं, सार्वजनिक जीवन से बाहर किया जाता है और उनके पहनावे तक को दंडनीय बनाया जाता है, तो केवल बयान जारी कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मानवीय सहायता और राजनीतिक दबाव के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसे रास्ते तलाशने होंगे, जिनसे आम अफगान नागरिकों को नुकसान पहुंचाए बिना महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी दबाव बनाया जा सके।

अफगानिस्तान की स्थिति एक और महत्वपूर्ण बहस को जन्म देती है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में महिलाओं के पहनावे को लेकर दो बिल्कुल विपरीत प्रकार के प्रतिबंध देखने को मिलते हैं। कहीं महिलाओं पर हिजाब या अन्य धार्मिक परिधान पहनने को लेकर प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो कहीं महिलाओं को धार्मिक या राजनीतिक सत्ता के आदेश पर विशेष पोशाक पहनने के लिए बाध्य किया जाता है। दोनों परिस्थितियों में मूल प्रश्न एक ही है-’’महिला की पसंद का अधिकार।’’

यदि कोई महिला अपनी इच्छा से हिजाब पहनती है तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि कोई महिला हिजाब नहीं पहनना चाहती तो उसे भी इसके लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। इसी प्रकार किसी भी राज्य को महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा पर मनमाना नियंत्रण स्थापित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

इसलिए महिला अधिकारों की लड़ाई को किसी धर्म, संस्कृति या राजनीतिक विचारधारा के समर्थन या विरोध तक सीमित करना उचित नहीं होगा। इसका सार्वभौमिक आधार होना चाहिए-’’महिला स्वयं अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने में सक्षम है।’’

अफगान महिलाओं की समस्या को अक्सर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि वे किसी भू-राजनीतिक बहस की वस्तु नहीं हैं। वे नागरिक हैं, जिनके पास शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, सम्मान और अपनी जिंदगी के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका केवल तालिबान की आलोचना करने तक सीमित नहीं रह सकती। उसे मानवीय सहायता जारी रखने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बचाने, महिला संगठनों और नागरिक समाज को समर्थन देने तथा मानवाधिकार उल्लंघनों की स्वतंत्र निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करने की जरूरत है।

साथ ही, तालिबान के साथ बातचीत करने वाले देशों को भी यह स्पष्ट करना चाहिए कि महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों की कीमत पर सामान्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बहाली स्वीकार्य नहीं हो सकती।

हेरात की कथित घटना की स्वतंत्र पुष्टि और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। तालिबान के इनकार को भी दर्ज किया जाना चाहिए और आरोपों की सत्यता का निर्धारण विश्वसनीय स्रोतों से होना चाहिए लेकिन व्यापक तस्वीर पर संदेह की गुंजाइश कम है, अफगान महिलाओं के अधिकार पिछले वर्षों में गंभीर रूप से सीमित हुए हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ’’चिंता व्यक्त करने की राजनीति से आगे बढ़ना होगा।’’

महिलाओं के अधिकार किसी सरकार की कृपा नहीं हैं। शिक्षा, सम्मान, रोजगार, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और अपनी व्यक्तिगत पसंद के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता ’’मानवीय गरिमा के मूल अधिकार’’ हैं।

अफगान महिलाओं को केवल सहानुभूति नहीं चाहिए। उन्हें ऐसा अंतरराष्ट्रीय समर्थन चाहिए जो उनकी आवाज को मजबूत करे, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे और उन्हें अपने भविष्य का फैसला खुद करने का अवसर दे। क्योंकि महिला की आजादी का अर्थ यह नहीं कि उसे किसी एक विचारधारा के अनुसार जीने की छूट मिले, ’’आजादी का वास्तविक अर्थ है-वह अपने जीवन का रास्ता स्वयं चुन सके।’’

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