पंकज जायसवाल
कर्ज लेना आज जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुका है। घर खरीदना हो, कारोबार शुरू करना हो, पढ़ाई करनी हो या फिर कभी-कभी अपनी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करना हो बैंक और वित्तीय संस्थाएं लोगों को क्रेडिट उपलब्ध कराती हैं लेकिन जब कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाता है, तब एक शब्द राहत की तरह सुनाई देता है वह है ओटीएस यानी एकमुश्त समाधान योजना।
अभी कुछ दिन पहले मैं एक जगह गया था, पुराने दोस्तों के बीच बैठा था, उसी में लोन की चर्चा चल पड़ी. एक दोस्त ने बताया कि यार एक लोन ले लिया है। किश्त से परेशान था तो कहीं से इकठ्ठा कर पूरा लौटा दिया। ऐसे में दूसरा दोस्त बोला कि यार काहे पूरा लौटा दिए, मैं तो 5 लाख लिया था और 2 लाख में सेटल करा लिया. मेरा तो तीन लाख माफ़ कर दिया। उसकी बातों से ऐसा लग रहा था कि वह उस दोस्त को बता रहा था कि उसने जल्दबाजी कर दी और अगर उसने उससे राय ली होती तो उसका वह कई लाखों का फायदा करा देता। यह सुन मैंने अपना माथा पकड़ लिया और ओटीएस के बारे में उनको समझाया। फिर मुझे समझ में आया कि भारत की एक बहुत बड़ी आबादी है जिसे ओटीएस का वास्तविक जोखिम नहीं पता या इसका कब इस्तेमाल करना चाहिए नहीं पता. यह वैसा अंतिम अस्त्र है जो हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए, उसके बाद मैंने सोचा कि इस पर जागरूकता के लिए एक लेख लिखना चाहिए तो आज मैं लेख ऐसे लोगों के लिए लिख रहा हूँ जो ओटीएस को एक खेल की तरह लेते हैं.
दरअसल, ओटीएस सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन इसे लेकर एक बड़ी गलतफहमी है। बहुत से लोग इसे “कर्ज माफी” समझ लेते हैं। कुछ लोग इसे बैंक से कम पैसे में अपना कर्ज खत्म करने का शानदार अवसर मानते हैं लेकिन सवाल यह है कि जो रकम आज बच रही है, क्या वह वास्तव में बचत है? सबसे बड़ा भ्रम लोगों के बीच यह है कि “बैंक ने आधा कर्ज माफ कर दिया!” मान लीजिए किसी व्यक्ति पर बैंक का ₹10 लाख बकाया है और बैंक ₹6 लाख लेकर सेटल करने को तैयार हो जाती है तो सामान्य व्यक्ति इसे ₹4 लाख की बचत मानेगा लेकिन तस्वीर इतनी सरल नहीं है। यदि पूरा कर्ज चुकाते तो इसे बैंक सामान्यतः क्लोज्ड दिखाता है लेकिन यदि बैंक ने सेटल किया है तो क्रेडिट रिपोर्ट में अकाउंट सेटल्ड दिखेगा और यही शब्द सेटल्ड यही शब्द भविष्य में पहाड़ बन जाता है।
यानी आज ₹4 लाख की राहत, कल बड़े लोन की मुश्किल बन सकती है। इसे खासकर युवाओं को समझना होगा कि ओटीएस स्मार्ट फाइनेंसिंग नहीं है. आज की युवा पीढ़ी के सामने क्रेडिट लोन की उपलब्धता पहले से कहीं अधिक है। एक क्लिक में लोन और क्रेडिट कार्ड मिल जाते हैं। महंगा मोबाइल चाहिए, ईएमआई पर आदि आदि। समस्या तब शुरू होती है जब जरूरत और इच्छा के बीच की सीमा समाप्त हो जाती है। युवा सोचता है अभी खर्च कर लेते हैं, बाद में चुका देंगे। फिर किश्त का दबाव बढ़ता है। एक क्रेडिट कार्ड का पेमेंट दूसरे कार्ड से होने लगता है। फिर पर्सनल लोन लेना पड़ सकता है। और आखिर में जब भुगतान नहीं हो पाटा तो ओटीएस को राहत का रास्ता मान लिया जाता है। यहीं सबसे बड़ी वित्तीय भूल हो जाती है। किसी युवा के लिए ओटीएस केवल आज के कर्ज से छुटकारा नहीं है; यह उसके भविष्य की लोन लेने की क्षमता को प्रभावित कर देती है।
आज मोबाइल खरीदने के लिए लिया गया ₹1 लाख का कर्ज यदि भविष्य में सेटल्ड स्टेटस तक पहुंच गया, तो कुछ वर्षों बाद जब वही युवा घर खरीदने के लिए ₹50 लाख या ₹1 करोड़ का होम लोन मांगेगा तो बैंक सेटल्ड का रिमार्क देख उसका लोन रिजेक्ट कर दे, इसकी संभावना ज्यादा है। वो सोचते हैं कि जब छोटी देनदारी थी, तब आपने पूरी रकम क्यों नहीं चुकाई? और यही सवाल भविष्य के बड़े लोन की नियति तय कर सकता है।
हालाँकि उपरोक्त का अर्थ यह नहीं कि ओटीएस हमेशा खराब है। किसी वास्तविक कारोबारी संकट, बीमारी, दुर्घटना, अचानक आय बंद होने या अन्य वास्तविक वित्तीय तनाव की स्थिति में ओटीएस महत्वपूर्ण राहत दे सकता है। आपके सामने तनाव से अपने जीवन और परिवार को बचाना क्रेडिट हिस्ट्री से ज्यादा मायने बन गई हो, मतलब जान है तो जहान है जैसा संकट हो लेकिन इसका इस्तेमाल तभी करना चाहिए जब आपके पास कोई विकल्प ना बचा हो और आगे आपको लोन लेने की सम्भावना निकट भविष्य में कम है या काफी समय के बाद इसकी जरुरत पड़ने वाली है या लेंडर को जबाब देने के लिए आपके पास वाजिब कारण और जवाब हो. वाजिब कारण और वाजिब जबाब होने पर बैंकर को समझाने में थोड़ा मेहनत तो लगता है लेकिन कई बार बैंकर समझ जाते हैं यदि आपने यह डिफ़ॉल्ट जानबूझकर नहीं किया है .
इसलिए हर संकट का समाधान ओटीएस नहीं है, ऐसा समझना चाहिए और बिना दस्तावेज पढ़े केवल रिकवरी एजेंट की मौखिक बात पर ओटीएस करना बड़ी गलती हो सकती है। यहाँ युवाओं के लिए सबसे बड़ा वित्तीय मंत्र है. आज की युवा पीढ़ी को ओटीएस से पहले एक और बात समझनी चाहिए, क्रेडिट कार्ड आपकी आय नहीं है। लोन आपकी संपत्ति नहीं है। किश्त आपकी भविष्य की आय पर आज का दावा है। ₹1 लाख का मोबाइल यदि आपकी बचत से खरीदा गया है तो वह आपकी खरीद है लेकिन वही मोबाइल ₹1 लाख के कर्ज से खरीदा गया है तो वह केवल मोबाइल नहीं है. उसके साथ भविष्य की आय का एक हिस्सा भी खर्च हो रहा है और यदि वही लोन डिफ़ॉल्ट होकर सेटलमेंट तक पहुंच गया तो उसका प्रभाव केवल आज की परेशानी तक सीमित नहीं रह सकता। इसलिए “मैं ओटीएस करा लूंगा” को अपनी फाइनेंसियल प्लानिंग मत बनाइए। इसे मैंने कोई बड़ा तीर मार लिया या मैंने ज्यादा सेटलमेंट करा लिया तो मैं बड़ा सिकंदर, जैसे भाव मत रखिये। दोस्तों के बीच सेटलमेंट का कम्पटीशन भी मत खेलिए. इसकी कीमत बहुत बड़ी है. इसलिए अगली बार जब कोई कहे “कर्ज ले लो, नहीं चुका पाए तो ओटीएस करा लेना तो सावधान हो जाइए, इससे बचिए और इसे अंतिम विकल्प के रूप में ही चुनिए।
(युवराज फीचर्स)
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
