राजेश श्रीवास्तव
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर विवाद और दो चुनाव आयुक्तों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यशैली पर आपत्ति जताए जाने की खबरों के बाद देशभर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। विपक्षी दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता, संस्थागत जवाबदेही और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के सवालों को लेकर विरोध तेज करने के संकेत दिए हैं।
इस पूरे विवाद के बीच एक सवाल खास तौर पर महत्वपूर्ण है—जब विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाता है तो भाजपा उनके बचाव में क्यों उतर आती है? भाजपा को भी यह कहना चाहिए कि चुनाव आयोग निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से काम करे। आखिर मतदाता सूची से जिन करोड़ों नामों के हटने की बात सामने आ रही है, उनमें भाजपा समर्थक या उसके मतदाता भी हो सकते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग के साथ भाजपा का खड़ा दिखाई देना विपक्ष को उस पर सवाल उठाने का अवसर देता है।
भाजपा का तर्क है कि एसआईआर कोई नई प्रक्रिया नहीं है और कांग्रेस के शासनकाल में भी ऐसा पुनरीक्षण होता रहा है। यह बात सही हो सकती है, लेकिन इससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि 2003 और 2025 की प्रक्रियाएं क्या वास्तव में एक जैसी हैं?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), जो बिहार में एसआईआर को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में शामिल है, ने सुप्रीम कोर्ट में 2003 और 2025 की प्रक्रियाओं के बीच अंतर का मुद्दा उठाया है। एडीआर के मुताबिक, निर्वाचन आयोग 2025 के एसआईआर को 2003 के पुनरीक्षण पर आधारित बता रहा है, लेकिन दोनों के दिशा-निर्देशों और कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
सबसे पहला अंतर समय-सीमा का है। एडीआर के अनुसार 2003 की प्रक्रिया छह महीने से अधिक चली थी। घर-घर सत्यापन, प्रारूप मतदाता सूची तैयार करने और आपत्तियों के निपटारे के लिए पर्याप्त समय दिया गया था। अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की पुष्टि 6 जनवरी 2003 को हुई।
इसके विपरीत 2025 का एसआईआर करीब तीन महीने में पूरा किया गया। 24 जून को घोषणा के बाद 25 जून से 26 जुलाई तक एन्यूमरेशन फॉर्म जमा किए गए। 1 अगस्त को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित हुई, 1 सितंबर तक आपत्तियां ली गईं और 30 सितंबर को अंतिम सूची प्रकाशित कर दी गई। इसके कुछ ही सप्ताह बाद बिहार विधानसभा चुनाव होने थे।
अंतर केवल समय का नहीं है। 2003 में मतदाता सूची को अपडेट करने की मुख्य जिम्मेदारी एन्यूमरेटर की थी। वह घर-घर जाकर पुरानी सूची के आधार पर आंकड़े जुटाता और आवश्यक संशोधन करता था। सामान्य मतदाता से एन्यूमरेशन फॉर्म भरवाने की व्यवस्था नहीं थी और फॉर्म जमा नहीं करने पर नाम स्वतः हटने जैसी स्थिति भी नहीं थी।
2003 में एन्यूमरेटर को घरों की सूची, संबंधित क्षेत्र का नक्शा और प्राथमिक मतदाता सूची उपलब्ध कराई जाती थी। उसके काम की निगरानी के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त थे और कम से कम 25 प्रतिशत काम की रैंडम जांच का प्रावधान था।
नागरिकता के सवाल पर भी पुरानी प्रक्रिया अलग थी। एडीआर के अनुसार एन्यूमरेटर का सामान्य काम नागरिकता की जांच करना नहीं था। नागरिकता का प्रमाण केवल विशेष परिस्थितियों में मांगा जा सकता था—जैसे किसी क्षेत्र को ‘विदेशी बाहुल्य क्षेत्र’ घोषित किया गया हो या किसी व्यक्ति के खिलाफ लिखित शिकायत की गई हो कि वह भारतीय नागरिक नहीं है। सामान्य मतदाता के लिए नागरिकता की व्यापक जांच प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थी।
2025 की प्रक्रिया में मतदाता की भूमिका अधिक प्रत्यक्ष हो गई है। एन्यूमरेशन फॉर्म भरकर जमा करना जरूरी बनाया गया और पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेजों का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया। वोट फॉर डेमोक्रेसी और सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस के मुताबिक, निर्वाचन आयोग ने वोटर आईडी कार्ड को उन 11 दस्तावेजों की सूची में शामिल नहीं किया, जिनके जरिए मतदाता अपनी पात्रता साबित कर सकते थे।
यही वह अंतर है, जिसे केवल यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि एसआईआर पहले भी होता रहा है। सवाल यह नहीं है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया पुरानी है या नई। सवाल यह है कि वर्तमान प्रक्रिया में क्या बदला है और उसका असर पात्र मतदाताओं के अधिकार पर क्या पड़ सकता है।
मतदाता सूची का शुद्ध और अद्यतन होना लोकतंत्र के लिए जरूरी है। गलत नाम हटाना और नए पात्र मतदाताओं को जोड़ना चुनाव प्रक्रिया की स्वाभाविक जरूरत है। लेकिन उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि प्रक्रिया की जटिलता, समय की कमी या दस्तावेजों की शर्त के कारण किसी वास्तविक मतदाता का नाम न छूटे।
भाजपा यदि एसआईआर के समर्थन में 2003 का उदाहरण देती है तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि 2025 की प्रक्रिया में जो बदलाव हुए हैं, उनका औचित्य क्या है और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी भी केवल राजनीतिक आरोप लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करने की जरूरत के खिलाफ नहीं है, बल्कि प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठा रहा है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सही हैं या गलत, इसका फैसला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बल्कि तथ्यों, नियमों और न्यायिक समीक्षा से होना चाहिए। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी दल के समर्थन से नहीं, उसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता से तय होगी।
भाजपा के लिए भी बेहतर यही होगा कि वह चुनाव आयोग का राजनीतिक बचाव करने के बजाय उससे जवाबदेही और पारदर्शिता की अपेक्षा करे। आखिर चुनाव आयोग किसी एक दल का नहीं, लोकतंत्र का संवैधानिक प्रहरी है। उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे तो उसका असर पूरी चुनावी व्यवस्था पर पड़ेगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
