गौतम चौधरी
कभी-कभी किसी घटना को लेकर हम खुद के चिंतन के आधार पर अपराधी ढुंढ लेते हैं लेकिन विस्तविक चित्र कुछ और होता है। आज के सोशल मीडिया युग में यह प्रक्रिया इतनी तेज हो गयी है कि कल्पना और परिकल्पना साफ तौर पर दिखने लगता है। ऐसे में तथ्य और सत्य का घालमेल बेहद खतरनाक स्थिति तक पहुंच जाता है। ऐसा ही कुछ हाल के दिनों में कई घटनाओं में देखा गया है। अभी अभी 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 में हुई घटना के बाद कुछ ऐसा ही माहौल बनाया जा रहा है। अस घटना ने विमानन सुरक्षा के साथ-साथ एक गंभीर सामाजिक प्रश्न भी खड़ा कर दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार भारतीय मूल के कप्तान स्मित मच्छार और उनके ओमानी सह-पायलट हमाम अल-हम्मामी के बीच कॉकपिट में गंभीर झड़प हुई। इस दौरान विमान अचानक हजारों फीट नीचे गया। घायल कप्तान ने स्थिति संभालने की कोशिश की और यात्रियों तथा चालक दल की मदद से विमान को सुरक्षित रूप से सऊदी अरब के तबूक में उतारा गया।
घटना की अंतरराष्ट्रीय जांच अभी जारी है। इसलिए इसके अंतिम कारण और उद्देश्य के बारे में निष्कर्ष निकालने में जल्दबाजी उचित नहीं होगी। फिर भी इस घटना से जुड़े कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ’’एक व्यक्ति के कथित अपराध को उसके धर्म से जोड़कर पूरे समुदाय को कठघरे में खड़ा करना क्या उचित है?’’
रिपोर्टों में सामने आया है कि सह-पायलट के बारे में 2024 में सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंता सामने आई थी। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया कि Oman Air में प्रशिक्षण के दौरान उसके पास कथित रूप से चरमपंथी सामग्री मिली थी और उसे कुछ समय के लिए उड़ान से अलग किया गया था। इसके बाद वह अलग-अलग विमानन संस्थाओं से जुड़ा और अंततः फ्लाईदुबई में सह-पायलट के रूप में काम करने लगा।
यदि जांच में यह जानकारी सही साबित होती है तो सबसे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि ’’अंतरराष्ट्रीय विमानन व्यवस्था में सुरक्षा संबंधी ऐसी सूचना आगे कैसे पहुंचती है और उसकी पुष्टि कैसे होती है?’’ यदि किसी पायलट के बारे में पहले गंभीर सुरक्षा चिंता दर्ज हो चुकी हो तो अगली एयरलाइन उसकी पृष्ठभूमि की जांच किस स्तर तक करती है? क्या विभिन्न देशों की विमानन कंपनियों और नियामक संस्थाओं के बीच सुरक्षा संबंधी जानकारी साझा करने की पर्याप्त व्यवस्था है? क्या पायलट की पेशेवर योग्यता की जांच के साथ उसकी सुरक्षा पृष्ठभूमि की भी प्रभावी जांच होती है? ये प्रश्न किसी धर्म से संबंधित नहीं हैं। ये सीधे-सीधे ’’विमानन सुरक्षा और यात्रियों के जीवन’’ से संबंधित हैं।
यदि जांच यह प्रमाणित करती है कि हमला किसी कट्टरपंथी विचारधारा से प्रेरित था तो उस विचारधारा की कठोर आलोचना होनी चाहिए। धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद और हिंसक चरमपंथ के प्रति किसी प्रकार की नरमी लोकतांत्रिक समाज के हित में नहीं है। मगर यहां एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है। ’’किसी चरमपंथी विचारधारा की आलोचना और पूरे धर्म की निंदा एक ही बात नहीं है।’’
एक मुस्लिम व्यक्ति अपराध करता है तो उसका अपराध उसके व्यक्तिगत कृत्य और प्रमाणित विचारधारा के आधार पर तय होना चाहिए। उसी कसौटी पर हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध या किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को भी देखा जाना चाहिए। कानून व्यक्ति के अपराध को देखता है, उसकी पूरी धार्मिक आबादी को नहीं। यही सिद्धांत आतंकवाद से लड़ाई को भी मजबूत करता है। क्योंकि आतंकवाद के वास्तविक स्रोत की पहचान तभी संभव है जब जांच धार्मिक पहचान और आपराधिक व्यवहार के बीच फर्क कर सके।
इस घटना में भारतीय कप्तान स्मित मच्छार की भूमिका निस्संदेह महत्वपूर्ण है। संकट की स्थिति में उन्होंने विमान को संभालने और यात्रियों की जान बचाने का प्रयास किया। ऐसी स्थिति में उनके साहस और पेशेवर जिम्मेदारी की सराहना होनी चाहिए। मगर उनकी वीरता को किसी दूसरे धर्म के विरुद्ध तर्क में बदलना उचित नहीं होगा।
किसी व्यक्ति की वीरता का मूल्य उसके धर्म से नहीं, उसके कर्म से तय होता है। यदि एक व्यक्ति संकट में सैकड़ों लोगों की जान बचाता है तो वह अपने कर्म के कारण सम्मान का अधिकारी है। उसी तरह यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसे अपने अपराध के लिए कानून के सामने जवाब देना होगा। ’’वीरता को धर्म की राजनीति से मुक्त रखना ही उस वीरता का सम्मान है।’’
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर जिस प्रकार धार्मिक पहचान को केंद्र में रखकर प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उससे एक और खतरा दिखाई देता है। किसी अंतरराष्ट्रीय घटना को कुछ ही घंटों में भारत के हिंदू-मुस्लिम विवाद में बदल देना न तो न्याय है और न पत्रकारिता की नैतिकता। सोशल मीडिया पर भावनाएं तेजी से फैलती हैं, जबकि जांच समय लेती है।
किसी व्यक्ति के बारे में यह कहना कि वह कट्टरपंथी था, आतंकवादी था या उसने किसी विशेष विचारधारा के कारण हमला किया, इन सबके लिए प्रमाण आवश्यक हैं। जांच पूरी होने से पहले अनुमान को निष्कर्ष बना देना समाज में अविश्वास पैदा कर सकता है। इसलिए मीडिया और सोशल मीडिया दोनों के लिए एक सामान्य नियम होना चाहिए – ’’पहले तथ्य, फिर विश्लेषण और अंत में निष्कर्ष।’’
इस घटना को केवल धार्मिक बहस में समाप्त कर देने के बजाय इससे कुछ ठोस सुरक्षा सुधारों पर चर्चा होनी चाहिए। ’’पहला’’, अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों के बीच पायलटों की सुरक्षा संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने की व्यवस्था अधिक प्रभावी होनी चाहिए। ’’दूसरा’’, किसी पायलट के पिछले रोजगार और लाइसेंस इतिहास के साथ सुरक्षा संबंधी गंभीर रिकॉर्ड की भी उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच होनी चाहिए। ’’तीसरा’’, मानसिक स्वास्थ्य, हिंसक चरमपंथ और सुरक्षा जोखिम जैसे संवेदनशील विषयों की जांच वैज्ञानिक तथा कानूनी मानकों के आधार पर होनी चाहिए। केवल किसी धार्मिक या राजनीतिक पहचान को सुरक्षा जोखिम मान लेना न तो न्यायसंगत है और न व्यावहारिक। ’’चौथा’’, विमान के कॉकपिट की सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन प्रोटोकॉल और चालक दल के बीच ऐसी स्थिति से निपटने की क्षमता की समीक्षा होनी चाहिए। ’’पांचवां’’, यदि किसी पायलट के बारे में पहले गंभीर सुरक्षा चेतावनी मौजूद थी तो यह पता लगाया जाना चाहिए कि सूचना प्रणाली में वह चेतावनी कहां कमजोर पड़ी।
यही जांच भविष्य में किसी बड़ी विमान दुर्घटना या आतंकवादी घटना को रोकने में वास्तविक योगदान दे सकती है।
पूरे मामले का संतुलित निष्कर्ष यही होना चाहिए कि यदि सह-पायलट ने अपराध किया है तो उसे कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए। यदि उसके पीछे हिंसक चरमपंथी विचारधारा प्रमाणित होती है तो उस विचारधारा की भी स्पष्ट आलोचना होनी चाहिए। मगर एक अपराधी के कारण किसी पूरे धर्म के करोड़ों अनुयायियों को संदेह की दृष्टि से देखना न्याय का विस्तार नहीं, ’’सामूहिक दोषारोपण’’ है।
भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में इसकी कीमत बहुत बड़ी हो सकती है। इससे निर्दाेष लोगों के प्रति अविश्वास बढ़ता है, सामाजिक तनाव पैदा होता है और वास्तविक सुरक्षा प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। आतंकवाद और धार्मिक चरमपंथ का मुकाबला मजबूत कानून, सक्षम सुरक्षा व्यवस्था, बेहतर सूचना-साझाकरण और सामाजिक विवेक से किया जा सकता है। किसी पूरे धर्म को अपराधी बनाकर नहीं।
स्मित मच्छार की वीरता को सलाम कीजिए। हमाम अल-हम्मामी के कथित अपराध की निष्पक्ष जांच कीजिए। यदि किसी हिंसक चरमपंथी विचारधारा की भूमिका प्रमाणित होती है तो उसका दृढ़ता से विरोध कीजिए। मगर इस पूरे मामले में एक सीमा भी स्पष्ट रखिए – ’’आरोपी के अपराध की जांच कीजिए, उसकी प्रमाणित विचारधारा की जांच कीजिए, सुरक्षा व्यवस्था की विफलता की जांच कीजिए। उसके धर्म को कटघरे में मत खड़ा कीजिए।’’
यही न्याय का रास्ता है और यही भारत जैसे बहुलतावादी समाज की सामाजिक सुरक्षा भी।
