मानसून की वापसी पर मौसम विज्ञान विभाग का दृष्टिकोण ही बेहतर पूर्वानुमान

मानसून की वापसी पर मौसम विज्ञान विभाग का दृष्टिकोण ही बेहतर पूर्वानुमान

वर्तमान समय में मानसून को लेकर मौसम संबंधी खबरें केवल मौसम का हाल नहीं बतातीं, बल्कि खेती, जलस्रोत, बिजली उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, यहां तक की स्वास्थ्य पर भी सीधा असर डालती हैं। इसलिए ऐसी खबरों में ’’पूर्वानुमान, मॉडल के संकेत और आधिकारिक मौसम विभाग की घोषणा’’ के बीच अंतर स्पष्ट होना बेहद जरूरी है।

21 अगस्त को प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून इस बार जल्द कमजोर पड़ सकता है। विस्तारित अवधि के मौसम मॉडलों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि ’’5 से 10 सितंबर के बाद देश के बड़े हिस्से में बारिश में उल्लेखनीय कमी आ सकती है’’ और सितंबर के दूसरे सप्ताह से उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून की वापसी की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि सितंबर के दूसरे हिस्से में देश के बड़े भाग में मौसम अपेक्षाकृत शुष्क हो सकता है।

पहली नजर में यह खबर गंभीर दिखाई देती है लेकिन सवाल यह है कि ’’क्या यह भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का आधिकारिक पूर्वानुमान है?’’ इस सवाल का जवाब फिलहाल ’’नहीं’’ है।

उन्होंने यह जरूर माना कि ’’सितंबर में बारिश की संभावना कुछ कम रह सकती है’’ लेकिन फिलहाल मीडिया में जिस तरह पूरे देश में मानसून की जल्द विदाई अथवा किसी बड़े वर्षा-संकट की तस्वीर पेश की जा रही है, वैसी स्थिति दिखाई नहीं दे रही है। यह स्पष्टीकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आम पाठक के लिए मौसम मॉडल और मौसम विभाग का पूर्वानुमान एक ही बात लग सकता है, जबकि दोनों में पर्याप्त अंतर है।

मीडिया रिपोर्ट में सितंबर के दूसरे सप्ताह में मानसून की वापसी की संभावना का उल्लेख किया गया है लेकिन यहां भी एक जरूरी तथ्य है। अभिषेक आनंद के अनुसार ’’सितंबर के दूसरे सप्ताह के आसपास राजस्थान और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों से मानसून की वापसी शुरू होना सामान्य मौसमी प्रक्रिया है।’’ इसका अर्थ यह नहीं है कि उसी समय पूरे भारत से मानसून विदा हो जाता है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून का देश से पीछे हटना चरणबद्ध प्रक्रिया है। उत्तर-पश्चिम भारत में इसकी शुरुआत पहले हो सकती है, जबकि मध्य, पूर्वी, दक्षिणी और पूर्वाेत्तर भारत में मानसूनी गतिविधियां बाद तक बनी रह सकती हैं। इसलिए राजस्थान से मानसून की वापसी और ’’“भारत से मानसून की वापसी”’’ को एक ही अर्थ में प्रस्तुत करना भ्रामक हो सकता है।

यहां मूल बात को समझना जरूरी है। संबंधित रिपोर्ट ने मुख्यतः extended-range weather models, यानी विस्तारित अवधि के मौसम मॉडलों, के संकेतों को आधार बनाया है। मौसम मॉडल भविष्य की संभावित परिस्थितियों का अनुमान लगाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपकरण हैं। लेकिन लंबी अवधि का मॉडल आउटपुट कोई अंतिम सरकारी घोषणा नहीं होता। नए निम्न दबाव क्षेत्र, समुद्री परिस्थितियों, वायुमंडलीय परिसंचरण और अन्य मौसम प्रणालियों में बदलाव के कारण कई दिन या सप्ताह आगे का अनुमान बदल सकता है।

खुद रिपोर्ट में भी यह स्वीकार किया गया है कि मौसम मॉडल लगातार विकसित होने वाले पूर्वानुमान हैं और कोई नया निम्न दबाव क्षेत्र अथवा बड़े वायुमंडलीय पैटर्न में बदलाव बारिश के अनुमान को बदल सकता है। इसलिए वैज्ञानिक मॉडल का संकेत प्रकाशित करना गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब ’’मॉडल के संकेत को आधिकारिक मौसम विभाग की भविष्यवाणी के रूप में समझ लिया जाए।’’

फिर भी इस खबर को पूरी तरह खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा। सितंबर भारतीय मानसून का महत्वपूर्ण महीना है। देश के कई वर्षा-निर्भर क्षेत्रों में सितंबर की बारिश खरीफ फसलों के लिए निर्णायक होती है। जहां जून, जुलाई और अगस्त में बारिश अपेक्षाकृत कम हुई हो, वहां सितंबर की बारिश उस कमी की भरपाई कर सकती है।

इसलिए यदि वास्तव में सितंबर के पहले सप्ताह के बाद देश के बड़े हिस्से में बारिश लंबे समय तक कमजोर होती है, तो उसका असर कृषि, जलाशयों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है लेकिन ’’संभावित खतरे और घोषित खतरे में फर्क है।’’ अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे संभावित मौसम परिदृश्य के रूप में देखना चाहिए, न कि निश्चित संकट के रूप में।

आज मौसम की खबरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैलती हैं। “मानसून खत्म होने वाला है”, “सितंबर में सूखा”, “देश में बारिश का संकट” जैसे शीर्षक स्वाभाविक रूप से अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं। लेकिन मौसम विज्ञान में कुछ सप्ताह आगे की संभावना को निश्चित भविष्यवाणी की तरह प्रस्तुत करना जोखिमपूर्ण है।

विशेषकर तब, जब संबंधित क्षेत्र का मौसम विभाग स्वयं कह रहा हो कि ’’सितंबर का आधिकारिक पूर्वानुमान अभी जारी नहीं हुआ है।’’ इसलिए फिलहाल सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि ’’कुछ विस्तारित अवधि के मौसम मॉडल सितंबर के शुरुआती दिनों के बाद देश के कई हिस्सों में मानसूनी गतिविधि कमजोर पड़ने के संकेत दे रहे हैं। लेकिन प्डक् ने अभी पूरे देश में मानसून की जल्द विदाई अथवा बड़े वर्षा-संकट की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है।’’

अगस्त के अंतिम दिनों में जारी होने वाला IMD का सितंबर पूर्वानुमान इस बहस को ज्यादा स्पष्ट करेगा। तब तक मॉडल के संकेतों को संकेत ही रहने देना चाहिए-’’उन्हें मौसम विभाग की आधिकारिक चेतावनी में बदल देना वैज्ञानिक तथ्यों के साथ-साथ पत्रकारिता की विश्वसनीयता के साथ भी न्याय नहीं होगा।’’

मानसून की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। ’’पूर्वानुमान को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसके बदलते संकेतों पर नजर रखना ही इस समय सबसे वैज्ञानिक और जिम्मेदार दृष्टिकोण है।’’

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