गौतम चौधरी
झारखंड लॉ ऑफिसर्स (Engagement) Rules, 2026 को लेकर उठे सवाल महज सरकारी वकीलों की नियुक्ति की प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। इनके केंद्र में एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न है—क्या राज्य सरकार विधि पदाधिकारियों की नियुक्ति के लिए ऐसी व्यवस्था बना सकती है, जिसमें “engagement” और “government service” की सीमाएं धुंधली हो जाएं, जबकि उसी व्यवस्था में अधिवक्ताओं की पेशेवर स्वतंत्रता, समान अवसर और संवैधानिक अधिकार प्रभावित हों?
सरकार की इस नियमावली को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने माननीय न्यायालय का दरबाजा खटखटाया है। इस मामले में झारखंड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बिनोद सिंह ने एक जनहित याचिका दाखिल की है। इस विषय पर बीते 18 अगस्त 2026 को माननीय झारखंड उच्च न्यायालय में गर्मागर्म बहस हुई। बहस में कई तथ्यों पर चर्चा हुई।
वरिष्ठ अधिवक्ता बिनोद सिंह द्वारा इस नियमावली के विरुद्ध जनहित याचिका दायर किए जाने की पृष्ठभूमि में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो गया है। अभी अदालत को इन प्रावधानों की संवैधानिकता पर अंतिम निर्णय देना है, इसलिए किसी प्रावधान को पहले से असंवैधानिक घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन नियमों को लेकर उठ रही आपत्तियां इतनी गंभीर हैं कि सरकार को भी उनका ठोस संवैधानिक और वैधानिक आधार स्पष्ट करना चाहिए।
सबसे बुनियादी सवाल नियमावली की प्रकृति को लेकर है। यदि Law Officers को वास्तव में राज्य सरकार के अधीन पद पर नियुक्त किया जा रहा है और उन्हें सरकारी पदाधिकारी अथवा कर्मचारी जैसी स्थिति दी जा रही है, तो फिर Article 309 का प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
संविधान का अनुच्छेद 309 राज्य की सेवाओं और पदों से संबंधित भर्ती तथा सेवा-शर्तों के नियमन की व्यवस्था करता है। ऐसे में यह पूछा जाना असंगत नहीं है कि इन पदों का कैडर क्या है, स्वीकृत पदों की संरचना क्या है, भर्ती की स्पष्ट प्रक्रिया क्या है, वरिष्ठता कैसे निर्धारित होगी, सेवा-शर्तें क्या होंगी और आरक्षण नीति किस प्रकार लागू होगी?
सरकार यदि इन्हें नियमित सरकारी सेवा से अलग बताती है तो फिर दूसरा प्रश्न पैदा होता है—जब ये सरकारी सेवा के पद नहीं हैं तो इन्हें सरकारी कर्मचारी जैसी प्रकृति क्यों दी जा रही है? कानूनी शब्दावली में “engagement” लिख देना पर्याप्त नहीं है; अदालत वास्तविक प्रकृति और प्रभाव को देखेगी। किसी व्यवस्था का नामकरण उसके वास्तविक संवैधानिक चरित्र को निर्धारित नहीं करता।
यह प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यदि राज्य के लिए इतने बड़े पैमाने पर Law Officers नियुक्त किए जा रहे हैं तो उनकी कैडर संरचना क्या होगी। Senior Additional Advocate General, Additional Advocate General, Government Advocate, Government Pleader, Standing Counsel और अन्य विधि पदों के बीच संबंध क्या है? क्या ये अलग-अलग contractual engagements हैं या एक संगठित सरकारी विधि-सेवा की सीढ़ियां?
यदि यह सरकारी सेवा है तो कैडर, भर्ती, पदोन्नति, वरिष्ठता और सेवा-शर्तों की स्पष्टता आवश्यक होगी। और यदि यह सरकारी सेवा नहीं है तो फिर नियुक्ति की पूरी संरचना को “service” के रूप में प्रस्तुत करने का औचित्य स्पष्ट करना होगा।
नियमावली में कुछ महत्वपूर्ण विधि पदों के लिए अनुभव की जो ऊंची सीमा रखी गई है, वह भी बहस का विषय है। यहां तुलना संवैधानिक पदों से की जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत High Court के न्यायाधीश के लिए निर्धारित एक प्रमुख योग्यता कम-से-कम दस वर्ष तक High Court का Advocate रहने की है। Advocate General के लिए भी संविधान व्यक्ति को High Court Judge बनने की योग्यता रखने वाला होना अपेक्षित करता है।
ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है—जब संविधान किसी व्यक्ति को दस वर्ष के अनुभव के आधार पर न्यायिक पद के लिए योग्य मान सकता है, तो राज्य के कुछ विधि पदों के लिए उससे 15 या 20 वर्ष का अनुभव क्यों अपेक्षित है? अधिक अनुभव की शर्त अपने-आप में असंवैधानिक नहीं है। किसी पद की विशेष प्रकृति को देखते हुए सरकार अतिरिक्त योग्यता निर्धारित कर सकती है। लेकिन तब उसे यह दिखाना होगा कि ऐसी अतिरिक्त शर्त का पद के दायित्व से तार्किक संबंध क्या है। यदि 20 वर्ष की शर्त केवल कुछ पदों को सीमित करने अथवा नियुक्ति के दायरे को संकुचित करने का साधन बनती है, तो Article 14 के तहत मनमाने वर्गीकरण और समान अवसर का प्रश्न उठ सकता है।
नियमावली का एक और महत्वपूर्ण पहलू Law Research Officer का पद है। Advocates Act, 1961 की धारा 30 enrolled advocate को भारत में न्यायालयों और कानून द्वारा अधिकृत forums के सामने practice करने का वैधानिक अधिकार देती है। बेशक यह अधिकार न्यायालयों के नियमों, अन्य कानूनों और पेशेवर आचरण संबंधी प्रतिबंधों के अधीन है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति पहले से विधिवत enrolled advocate है और राज्य सरकार उसे Law Research Officer के रूप में नियुक्त करने के बाद अदालत में पेश होने अथवा बहस करने से पूर्णतः रोकती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस प्रतिबंध का वैधानिक आधार क्या है।
सरकार यह तर्क दे सकती है कि full-time सरकारी engagement और स्वतंत्र legal practice दोनों साथ नहीं चल सकते। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है। सरकारी सेवा और स्वतंत्र वकालत के बीच conflict of interest का प्रश्न वास्तविक है लेकिन फिर भी प्रतिबंध को केवल प्रशासनिक आदेश से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह देखना होगा कि वह Advocates Act की धारा 30, Bar Council के नियमों और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के साथ किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करता है। किसी enrolled advocate के पेशेवर अधिकार को सीमित किया जा रहा है तो प्रतिबंध का उद्देश्य, आवश्यकता और अनुपातिकता स्पष्ट होनी चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि दो विरोधी व्यवस्थाएं एक साथ चल रही हैं? पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यही है।
एक तरफ सरकार Law Officers के लिए एक ऐसी संरचना तैयार करती दिखाई देती है, जो उन्हें राज्य की विधिक मशीनरी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। दूसरी तरफ इन्हें स्वतंत्र अधिवक्ता के रूप में प्राप्त अधिकारों और सरकारी सेवा के बीच एक अस्पष्ट स्थिति में रखा जाता है। यदि वे स्वतंत्र अधिवक्ता हैं, तो उनकी स्वतंत्र पेशेवर स्थिति का सम्मान होना चाहिए। यदि वे राज्य के कर्मचारी हैं, तो Article 309 और उससे जुड़ी संवैधानिक सेवा-व्यवस्था का पालन होना चाहिए।
इन दोनों के बीच कोई तीसरी व्यवस्था बनाई जाती है तो उसके लिए भी स्पष्ट वैधानिक आधार, पारदर्शी प्रक्रिया और संवैधानिक औचित्य आवश्यक है।
सरकारी वकील केवल सरकार के मुकदमों की पैरवी करने वाले निजी अधिवक्ता नहीं होते। वे अदालत के सामने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके माध्यम से सरकार की ओर से न्यायालय के समक्ष कानून और तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति में योग्यता, अनुभव, पेशेवर प्रतिष्ठा और निष्पक्षता के साथ-साथ पारदर्शिता का महत्व सामान्य contractual नियुक्ति से कहीं अधिक है। किसी भी ऐसी व्यवस्था में यह आशंका नहीं होनी चाहिए कि सरकारी वकील का चयन पेशेवर योग्यता से अधिक राजनीतिक निकटता या प्रशासनिक पसंद पर निर्भर करता है। सरकार के पास अपने विधि पदाधिकारियों के चयन की शक्ति अवश्य होनी चाहिए, लेकिन यह शक्ति मनमानी शक्ति नहीं हो सकती।
झारखंड में विधि पदाधिकारियों की नियुक्ति को सुव्यवस्थित करना अपने आप में एक आवश्यक प्रशासनिक सुधार हो सकता है। राज्य को सक्षम, अनुभवी और जवाबदेह सरकारी अधिवक्ताओं की आवश्यकता है। लेकिन सुधार का अर्थ केवल अधिक पद बनाना या नियुक्ति की नई नियमावली बनाना नहीं है।
सच्चा सुधार तब होगा जब पूरी व्यवस्था में यह स्पष्ट हो कि—कौन नियुक्त होगा, किस आधार पर नियुक्त होगा, उसकी संवैधानिक स्थिति क्या होगी, उसका कैडर क्या होगा, उसके अधिकार और दायित्व क्या होंगे और उसे हटाने की प्रक्रिया क्या होगी। वरिष्ठ अधिवक्ता बिनोद सिंह की जनहित याचिका इसलिए केवल कुछ Law Officers की नियुक्ति का विवाद नहीं है। यह राज्य में विधि-व्यवस्था और विधि-शासन के संबंध से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।
सरकार को अदालत में यह स्पष्ट करना होगा कि 2026 की नियमावली संविधान, Advocates Act और पेशेवर स्वतंत्रता के सिद्धांतों के साथ किस तरह संगत है। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार कानून बनाती है, प्रशासन कानून लागू करता है और न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है—लेकिन इन तीनों से ऊपर स्वयं कानून और संविधान होता है और विडंबना यही होगी कि कानून के पहरेदारों की नियुक्ति के लिए बनाई गई व्यवस्था ही अगर कानून की कसौटी पर खड़ी न उतर सके।
इसलिए इस नियमावली की समीक्षा किसी राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि संविधान, Advocates Act, Article 14, Article 19(1)(g), Article 217 और Article 309 की कसौटी पर होनी चाहिए। अदालत का अंतिम निर्णय जो भी हो, इस बहस का परिणाम झारखंड में एक अधिक पारदर्शी, पेशेवर और संवैधानिक विधि-सेवा व्यवस्था के रूप में सामने आना चाहिए।
