आज़ादी केवल अधिकार नहीं, हमें देश के खातिर जिम्मेदारियां भी निभानी होगी

आज़ादी केवल अधिकार नहीं, हमें देश के खातिर जिम्मेदारियां भी निभानी होगी

15 अगस्त बीत चुका है। तिरंगे उतार दिए गए हैं, देशभक्ति के गीतों की आवाज धीमी पड़ गई है और स्वतंत्रता दिवस के मंचों पर दिए गए भाषण अब अगले वर्ष तक स्मृति में रहने वाले हैं। मगर स्वतंत्रता का सवाल 15 अगस्त के साथ समाप्त नहीं होता। असली सवाल तो अब शुरू होता हैकृजिस आज़ादी का हमने उत्सव मनाया, वह हमारे रोजमर्रा के जीवन में कितनी दिखाई देती है?

1947 में भारत ने औपनिवेशिक शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल की थी। मगर स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी सत्ता से मुक्ति नहीं है। उसका अर्थ हैकृहर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार, अपने विश्वास और संस्कृति के पालन की स्वतंत्रता, अपनी बात कहने का अवसर, शिक्षा और रोजगार की संभावना तथा देश के निर्माण में बराबरी की भागीदारी। इसलिए स्वतंत्रता दिवस किसी एक समुदाय का उत्सव नहीं हो सकता। यह हर भारतीय की साझी विरासत है।

भारत की स्वतंत्रता की कहानी भी किसी एक धर्म, जाति या क्षेत्र की कहानी नहीं है। 1857 के संघर्ष से लेकर राष्ट्रीय आंदोलन तक मुसलमानों सहित विभिन्न समुदायों के लोगों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। बहादुर शाह ज़फ़र, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और अनेक ऐसे लोग इस इतिहास का हिस्सा हैं जिनके नाम आज व्यापक रूप से याद नहीं किए जाते। जेल जाने वाले, आर्थिक कठिनाइयां झेलने वाले और पुलिस की कार्रवाई का सामना करने वाले असंख्य सामान्य भारतीयों ने भी स्वतंत्रता की नींव मजबूत की।

इस इतिहास को याद करने का उद्देश्य किसी समुदाय के योगदान का हिसाब रखना नहीं, बल्कि यह समझना है कि भारत की आज़ादी मूलतः साझे संघर्ष की देन थी। इसलिए आज का भारत भी किसी एक समुदाय की जागीर नहीं हो सकता।

विशेष रूप से भारतीय मुसलमानों के लिए यह समझ महत्वपूर्ण है कि भारतीय होना और अपनी धार्मिक पहचान के प्रति प्रतिबद्ध रहना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। इसी तरह किसी हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध या आदिवासी की सांस्कृतिक पहचान भी उसकी भारतीय नागरिकता को कम नहीं करती। भारत की शक्ति इसी बहुलता में है। मगर यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि हम दूसरे की गरिमा नष्ट करने को अपना अधिकार समझें। धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि दूसरे की आस्था का अपमान किया जाए। राजनीतिक असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, मगर असहमति को दुश्मनी में बदल देना लोकतंत्र को कमजोर करता है।

आज स्वतंत्रता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक डिजिटल दुनिया भी है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अवसर दिया है, मगर उसी के साथ झूठ, अफवाह और नफरत फैलाने की गति भी बढ़ी है। शिक्षित नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह किसी सूचना को केवल इसलिए आगे न बढ़ाए कि वह उसकी अपनी धारणा के अनुकूल है। सत्यापन, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज नागरिक जिम्मेदारी का अनिवार्य हिस्सा हैं।

यह जिम्मेदारी युवाओं पर सबसे अधिक है। विश्वविद्यालय और कॉलेज केवल डिग्री हासिल करने की जगह नहीं हैं। वे विचार, बहस और लोकतांत्रिक चेतना के निर्माण के केंद्र हैं। आने वाले भारत की दिशा सरकारी नीतियों से जितनी तय होगी, उतनी ही शिक्षित युवाओं की ईमानदारी, प्रतिभा, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक संवेदनशीलता से भी तय होगी।

राष्ट्र निर्माण केवल संसद, मंत्रालयों या राजनीतिक दलों का काम नहीं है। ईमानदारी से काम करने वाला शिक्षक, जिम्मेदारी से इलाज करने वाला डॉक्टर, सुरक्षित निर्माण करने वाला इंजीनियर, रोजगार पैदा करने वाला उद्यमी, शोध करने वाला वैज्ञानिक और मेहनत से पढ़ने वाला विद्यार्थीकृसब राष्ट्र निर्माण में भागीदार हैं।

इसीलिए 15 अगस्त के बाद हमें अपने भीतर एक दूसरा स्वतंत्रता दिवस मनाने की जरूरत हैकृआत्ममंथन का स्वतंत्रता दिवस। क्या हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से लेते हैं? क्या हम कानून का सम्मान करते हैं? क्या हम सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझते हैं? क्या हम अपने पड़ोसी की आस्था और अधिकार का सम्मान करते हैं? क्या हम असहमति को सुनने का धैर्य रखते हैं? क्या हम अपने बच्चों को केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए भी तैयार कर रहे हैं?

स्वतंत्रता की वास्तविक रक्षा इन्हीं सवालों के जवाब में होगी। तिरंगा साल में एक दिन हमारे हाथ में आता है, मगर भारत की जिम्मेदारी हर दिन हमारे हाथ में रहती है। 15 अगस्त बीत गया है। उत्सव समाप्त हो गया है। अब बारी उस भारत को बनाने की है जिसकी कल्पना स्वातंत्र समर के बलिदानियों व योद्धाओं ने की थीकृएक ऐसा भारत जिसमें विविधता विभाजन का कारण नहीं, शक्ति बने; धर्म पहचान हो, संघर्ष का हथियार नहीं; असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक भाषा हो और नागरिकता अधिकार के साथ जिम्मेदारी का भी नाम हो। आज़ादी हमने विरासत में पाई है। अब उसे अपने आचरण से सार्थक करना हमारी जिम्मेदारी है।

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