झारखंड बना देश का हेल्थ-लैब : पांच बीमारियों से लड़ने के लिए एक व्यवस्था, देश के लिए बन सकता है मॉडल

झारखंड बना देश का हेल्थ-लैब : पांच बीमारियों से लड़ने के लिए एक व्यवस्था, देश के लिए बन सकता है मॉडल

झारखंड की पहचान लंबे समय तक खनिज, जंगल, पहाड़ और जनजातीय जीवन से जुड़ी रही है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी राज्य की चर्चा प्रायः कुपोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, मलेरिया, टीबी और ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के संदर्भ में होती रही है। अब राज्य सरकार ने स्वास्थ्य व्यवस्था के एक ऐसे क्षेत्र में प्रयोग करने की पहल की है, जिसका महत्व आने वाले वर्षों में झारखंड ही नहीं, पूरे देश के लिए हो सकता है।

सितंबर के तीसरे सप्ताह में सामने आई जानकारी के अनुसार झारखंड को गैर-संचारी रोगों यानी Non-Communicable Diseases (NCDs) के लिए एकीकृत मॉडल विकसित करने की केंद्र से मंजूरी मिली है। इस मॉडल में पांच अलग-अलग राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को एक साझा ढांचे में लाने की योजना है। इसे फिलहाल झारखंड के लिए मॉडल के रूप में लागू किया जाना है और सफल मूल्यांकन के बाद इसे देश के दूसरे हिस्सों में भी लागू करने की संभावना बताई गई है। यह सुनने में भले ही एक प्रशासनिक निर्णय लगे, मगर इसके पीछे स्वास्थ्य व्यवस्था को देखने की एक अलग सोच दिखाई देती है।

पांच कार्यक्रम, एक मंच

अब तक गैर-संचारी रोगों से संबंधित अलग-अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग कार्यक्रम संचालित होते रहे हैं। झारखंड के प्रस्तावित मॉडल में इन्हें एक साझा व्यवस्था के तहत जोड़ने की बात कही गई है।

इसके अंतर्गत पांच राष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल होंगे—

  • राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय पेलिएटिव केयर कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम

इन कार्यक्रमों को एक साथ लाने का उद्देश्य केवल प्रशासनिक समन्वय नहीं है। प्रस्तावित मॉडल में प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर जांच, बीमारी की शुरुआती पहचान, उपचार और डिजिटल ट्रैकिंग को एक-दूसरे से जोड़ने की बात कही गई है। यही इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।

अक्सर हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीज को एक बीमारी के लिए एक केंद्र, दूसरी बीमारी के लिए दूसरा केंद्र और तीसरी समस्या के लिए अलग व्यवस्था की तलाश करनी पड़ती है। प्रस्तावित एकीकृत मॉडल इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश करता है।

बीमारी अलग-अलग, शरीर एक

मानव शरीर किसी सरकारी विभाग की तरह अलग-अलग खानों में बंटा हुआ नहीं है। मसलन, तंबाकू का सेवन केवल मुंह या फेफड़ों की समस्या नहीं पैदा करता। इससे कैंसर और हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम भी बढ़ता है। मधुमेह और उच्च रक्तचाप भी एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं। लंबे समय तक गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को शारीरिक उपचार के साथ मानसिक और पेलिएटिव केयर की भी आवश्यकता पड़ सकती है।

ऐसे में बीमारी के बजाय व्यक्ति को केंद्र में रखकर स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करना अधिक व्यावहारिक दिखाई देता है। झारखंड का प्रस्तावित मॉडल इसी दिशा में जाने की कोशिश है।

कैंसर से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक

इस मॉडल में कैंसर की रोकथाम और नियंत्रण को महत्वपूर्ण प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय संबंधी रोग, तंबाकू नियंत्रण, मौखिक स्वास्थ्य, पेलिएटिव केयर और मानसिक स्वास्थ्य को भी जोड़ा गया है। राज्य को सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए टीकाकरण की गति बढ़ाने की सलाह भी दी गई है। यह सूची अपने आप में बदलते स्वास्थ्य संकट की ओर संकेत करती है।

भारत में स्वास्थ्य की चुनौती अब केवल संक्रामक रोगों तक सीमित नहीं है। जीवनशैली, भोजन, तनाव, तंबाकू और बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारियां भी स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगातार दबाव डाल रही हैं। झारखंड भी इससे अलग नहीं है।

एक तरफ राज्य के ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती है, दूसरी तरफ गैर-संचारी रोगों का बढ़ता दबाव। ऐसे में यदि एक ही प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था के माध्यम से कई तरह की जांच और सेवाओं को जोड़ा जा सके तो इसका असर दूरगामी हो सकता है।

असली बदलाव गांव के स्वास्थ्य केंद्र में

इस पूरी पहल की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना रांची या जमशेदपुर के बड़े अस्पताल नहीं होंगे। सवाल यह होगा कि सुदूर गांव के स्वास्थ्य केंद्र में क्या बदला? क्या वहां रक्तचाप की नियमित जांच होगी? क्या मधुमेह की जांच आसानी से हो सकेगी? क्या कैंसर के शुरुआती संकेतों की पहचान की जाएगी? क्या तंबाकू सेवन करने वाले व्यक्ति को केवल चेतावनी दी जाएगी या उसे छोड़ने में मदद भी मिलेगी? क्या मानसिक स्वास्थ्य की समस्या को बीमारी माना जाएगा? क्या गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज और उसके परिवार को पेलिएटिव केयर की सुविधा मिल सकेगी? अगर इन सवालों का जवाब हां में आता है, तभी यह मॉडल वास्तव में परिवर्तनकारी माना जाएगा।

डिजिटल ट्रैकिंग क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रस्तावित मॉडल में डिजिटल ट्रैकिंग भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि मरीज की जांच, बीमारी की स्थिति और उपचार को अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया जाए तथा स्वास्थ्य व्यवस्था को यह पता रहे कि मरीज कहां है और उसे आगे किस प्रकार की सेवा की आवश्यकता है। मगर यहां तकनीक को साधन ही बनाए रखना होगा, समाधान नहीं।

झारखंड की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां इस मामले में चुनौतीपूर्ण हैं। दूरदराज के गांवों में इंटरनेट, बिजली, उपकरण और प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता समान नहीं है। इसलिए डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था तभी सफल होगी जब उसके पीछे मजबूत जमीनी स्वास्थ्य ढांचा भी हो। मोबाइल एप बना देने से स्वास्थ्य सेवा डिजिटल नहीं होती। डिजिटल व्यवस्था का अर्थ है—सही मरीज की सही जानकारी, सही समय पर सही स्वास्थ्यकर्मी तक पहुंचे और उसके आधार पर सही निर्णय लिया जा सके।

जनजातीय और दूरस्थ इलाकों के लिए विशेष महत्व

झारखंड की एक बड़ी चुनौती उसकी भौगोलिक विविधता है। राज्य के कई इलाके ऐसे हैं जहां स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना ही कठिन है। ऐसे क्षेत्रों में बीमारी का इलाज शुरू होने तक समस्या गंभीर हो जाती है। यदि प्राथमिक स्तर पर बीमारी की पहचान हो जाए तो मरीज को समय रहते उच्च स्वास्थ्य केंद्र तक भेजा जा सकता है।

इसीलिए इस मॉडल का सबसे बड़ा परीक्षण शहरी झारखंड में नहीं, बल्कि सुदूर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में होगा। सरकार की पहल में दूरस्थ और ग्रामीण इलाकों तक सेवाओं को पहुंचाने के लिए विकास साझेदारों, नागरिक समाज संगठनों और सार्वजनिक उपक्रमों से CSR के माध्यम से सहयोग लेने की बात भी कही गई है।

यह रास्ता उपयोगी हो सकता है, लेकिन सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की मूल जिम्मेदारी को CSR पर निर्भर नहीं किया जा सकता। CSR सहयोग कर सकता है। स्वास्थ्य व्यवस्था का आधार सरकार को ही बनाना होगा।

इस प्रयोग की सबसे बड़ी खूबी क्या है?

इस पहल की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यह नहीं है कि झारखंड में पांच कार्यक्रम एक साथ चलेंगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार बीमारी को विभागों में बांटने के बजाय मरीज को एक इकाई के रूप में देखने की कोशिश कर रही है। यही सोच अगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचती है तो इसका स्वरूप बहुत बड़ा हो सकता है।

एक व्यक्ति स्वास्थ्य केंद्र पहुंचता है। वहां केवल बुखार या रक्तचाप की जांच नहीं होती, बल्कि उसकी उम्र, रक्तचाप, रक्त शर्करा, तंबाकू सेवन, मौखिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और कैंसर के संभावित संकेतों की समग्र जांच हो। जरूरत होने पर उसे आगे की चिकित्सा व्यवस्था से जोड़ा जाए। ऐसी व्यवस्था बीमारी को गंभीर अवस्था में पहुंचने से पहले पकड़ सकती है।

स्वास्थ्य अर्थशास्त्र की दृष्टि से भी शुरुआती पहचान महत्वपूर्ण है। किसी गंभीर बीमारी का अंतिम चरण में उपचार आमतौर पर मरीज और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों पर अधिक बोझ डालता है। शुरुआती पहचान और रोकथाम उस बोझ को कम कर सकती है।

मगर असली चुनौती क्रियान्वयन है

सरकारी योजनाओं की सबसे बड़ी परीक्षा घोषणा के समय नहीं, क्रियान्वयन के समय होती है। झारखंड के सामने कुछ कठिन प्रश्न हैं। क्या पर्याप्त डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध हैं? क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक जांच उपकरण हैं? क्या स्वास्थ्यकर्मियों को मानसिक स्वास्थ्य, कैंसर स्क्रीनिंग और पेलिएटिव केयर की संयुक्त प्रशिक्षण व्यवस्था मिलेगी? क्या डिजिटल डेटा सुरक्षित रहेगा? क्या मरीज की निजता की रक्षा होगी? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और बिजली की समस्या का समाधान किया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अलग-अलग विभाग और कार्यक्रम वास्तव में एक साथ काम करेंगे? एकीकृत मॉडल की सफलता का आधार यही प्रशासनिक समन्वय होगा।

आंकड़ों से अधिक महत्वपूर्ण होगा परिणाम

सरकार को इस मॉडल की सफलता मापने के लिए स्पष्ट सार्वजनिक मानक भी तय करने चाहिए। मसलन— कितने लोगों की स्क्रीनिंग हुई? कितने नए मरीजों की समय रहते पहचान हुई? कितने मरीजों को उपचार से जोड़ा गया? कितने मरीजों ने उपचार पूरा किया? कैंसर की शुरुआती अवस्था में पहचान कितनी बढ़ी? मधुमेह और उच्च रक्तचाप के कितने मरीज नियमित उपचार में आए? तंबाकू छोड़ने में कितने लोगों को सहायता मिली? मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक कितने लोग पहुंचे? दूरस्थ इलाकों में सेवा की पहुंच कितनी बढ़ी? यदि इन आंकड़ों को नियमित रूप से सार्वजनिक किया जाए तो यह प्रयोग केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहेगा, बल्कि एक ऐसा सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल बन सकता है जिसकी स्वतंत्र समीक्षा भी संभव होगी।

झारखंड के लिए इससे बड़ी संभावना क्या हो सकती है?

झारखंड को अक्सर संसाधन-संपन्न लेकिन सामाजिक सूचकांकों की चुनौतियों वाले राज्य के रूप में देखा जाता है। शायद अब स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक अलग प्रयोग की आवश्यकता है। राज्य को केवल बड़े अस्पतालों की संख्या बढ़ाने के बजाय प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक बुद्धिमान, एकीकृत और रोकथाम आधारित बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

अगर एक गांव में मौजूद स्वास्थ्यकर्मी ही शुरुआती स्तर पर रक्तचाप, मधुमेह, तंबाकू सेवन, मानसिक स्वास्थ्य और कैंसर के संभावित संकेतों की पहचान कर सके, तो मरीज को गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचने की नौबत कम हो सकती है। यह स्वास्थ्य व्यवस्था का मौलिक परिवर्तन होगा।

देश के लिए भी महत्वपूर्ण प्रयोग

झारखंड के एकीकृत NCD मॉडल का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सफल मूल्यांकन के बाद इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने की संभावना व्यक्त की गई है। इसका अर्थ है कि झारखंड केवल अपने लिए कोई कार्यक्रम तैयार नहीं कर रहा, बल्कि एक ऐसा मॉडल तैयार करने की कोशिश कर रहा है जिसे दूसरे राज्यों में भी दोहराया जा सके।

यहां सावधानी भी जरूरी है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि झारखंड का मॉडल सफल हो गया है। अभी तो प्रयोग शुरू होना है। इसकी सफलता के लिए वित्त, मानव संसाधन, तकनीक, प्रशिक्षण, दवाओं की उपलब्धता और सबसे बढ़कर निरंतर राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता आवश्यक होगी लेकिन किसी भी बड़े बदलाव की शुरुआत एक विचार से होती है। झारखंड का विचार फिलहाल यही है—स्वास्थ्य को अलग-अलग बीमारियों और विभागों में बांटने के बजाय एक समन्वित व्यवस्था के रूप में देखना।

बीमारी से पहले व्यवस्था को ठीक करना होगा

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में अब एक बड़ा बदलाव आवश्यक है। अस्पतालों में मरीज बढ़ते रहें और सरकार केवल नए अस्पताल बनाती रहे, यह पर्याप्त नहीं होगा। स्वास्थ्य व्यवस्था को बीमारी आने के बाद इलाज करने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर बीमारी को पहचानने, रोकने और नियंत्रित करने वाली व्यवस्था बनना होगा।

झारखंड का नया एकीकृत NCD मॉडल इसी दिशा में एक प्रयोग है। इस प्रयोग की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने सरकारी आदेश जारी हुए या कितने कार्यक्रम एक साथ जोड़ दिए गए। सफलता तब मानी जाएगी जब किसी दूरदराज के गांव में रहने वाला व्यक्ति बीमारी गंभीर होने से पहले स्वास्थ्य व्यवस्था की पकड़ में आ जाए।

यदि ऐसा हुआ तो झारखंड की यह पहल केवल एक सरकारी योजना नहीं रहेगी। यह उस सोच का उदाहरण बन सकती है जिसमें सरकार मरीज के अस्पताल पहुंचने का इंतजार नहीं करती, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था को मरीज के गांव तक ले जाती है। और शायद यही इस पहल की सबसे रचनात्मक बात है।

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