गौतम चौधरी
इतिहास अपने आपको हूबहू दोहराता तो नहीं, मगर उसके संकेत कई बार पुराने दौर की याद जरूर दिलाते हैं। आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले की परिस्थितियों की कुछ समानताएं दिखाई दे रही है। आज हमारे विमर्श का यही विषय है। मसलन, राष्ट्रवाद का उभार, सैन्य शक्ति बढ़ाने की होड़, सामरिक गठबंधनों का विस्तार, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष और महाशक्तियों के बीच बढ़ता अविश्वास-ये सभी मिलकर एक ऐसी विश्व-व्यवस्था बना रहे हैं, जिसमें किसी छोटे क्षेत्रीय संकट के बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में बदलने का खतरा बढ़ गया है।
इसे सीधे-सीधे तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत कहना अतिशयोक्ति होगी। दुनिया अभी उस स्थिति में नहीं पहुंची है। परमाणु हथियारों की मौजूदगी, स्वयं महाशक्तियों को प्रत्यक्ष टकराव से रोकने वाला महत्वपूर्ण कारक है। इसके बावजूद यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या दुनिया ऐसी परिस्थितियां पैदा हो रही है, जिनमें किसी दिन युद्ध को रोकना, पहले की तुलना में कठिन हो सकता है?
रूस इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहां सोवियत अतीत और विशेषकर जोसेफ स्टालिन की छवि का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है। इसे स्टालिन रिटर्न की संज्ञा दी जा रह है। स्टालिन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले रूसियों की संख्या पिछले वर्षों में बड़ी तेजी से बढ़ी है। इसके पीछे केवल स्टालिन की प्रशंसा नहीं, बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध में सोवियत विजय, राष्ट्रीय शक्ति और पश्चिम के साथ वर्तमान टकराव की मानसिकता भी काम करती है। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय गौरव की भाषा रूसी राजनीतिक मानस में फिर प्रभावशाली हुई है।
यूरोप की स्थिति भी बदल रही है। जर्मनी में हिटलर की विचारधारा की वापसी कहना उचित नहीं होगा लेकिन दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद नए रंग-रूप में प्रस्तुत हो रहा है। इधर के दिनों में जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों में प्रवासन, राष्ट्रीय पहचान, सुरक्षा और यूरोपीय संघ की भूमिका को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। इटली में जॉर्जिया मेलोनी की राजनीति की ऐतिहासिक जड़ें उस दक्षिणपंथी परंपरा से जुड़ी हैं जिसकी चर्चा मुसोलिनी की विरासत के संदर्भ में होती रही है। इसे भी सीधे फासीवाद की वापसी कहना उचित नहीं होगा, मगर यूरोप में राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर अमेरिका अपनी वैश्विक सैन्य और आर्थिक शक्ति के इस्तेमाल से पीछे हटता दिखाई नहीं देता। दुनिया के अनेक हिस्सों में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और हस्तक्षेप लंबे समय से विवाद का विषय बना हुआ है। 2026 में मध्य-पूर्व के संघर्षों ने इस बहस को फिर तेज किया है। साथ ही अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, समुद्री शक्ति, ताइवान और वैश्विक प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार गहरी हो रही है, जो किसी भी समय संघर्ष में बदल सकता है।
इन्हीं खतारों को ध्यान में रखते हुए चीनी रणनीतिकार तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। ताइवान, दक्षिण चीन सागर और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता ने पड़ोसी देशों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया है। इसके जवाब में जापान ने भी अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जिस जापान ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अपनी सैन्य भूमिका को संविधान और राजनीतिक परंपरा के कारण सीमित रखा था, वह अब मिसाइल, ड्रोन, साइबर क्षमता और आधुनिक सैन्य तकनीक पर अधिक निवेश कर रहा है।
यही वह बिंदु है, जहां वर्तमान परिस्थिति 1914 के यूरोप की याद दिलाती है। प्रथम विश्वयुद्ध से पहले किसी एक घटना ने अकेले विश्वयुद्ध पैदा नहीं किया था। सैन्य गठबंधन, हथियारों की दौड़, साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा और परस्पर अविश्वास वर्षों से जमा हो रहे थे। सारायेवो की घटना ने केवल उस बारूद में चिंगारी का काम किया।
आज भी दुनिया में बारूद के कई ढेर मौजूद हैं-यूक्रेन, मध्य-पूर्व, ताइवान, दक्षिण चीन सागर, कोरियाई प्रायद्वीप और रूस-पश्चिम गतिरोध। इनमें से किसी एक क्षेत्र में गंभीर संकट पैदा होने पर उसके प्रभाव का दूसरे क्षेत्रों तक फैलना पहले की तुलना में आज आसान हो गया है।
सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि वर्तमान दौर में युद्ध केवल सैनिकों और मिसाइलों से नहीं लड़ा जाता। ड्रोन, साइबर हथियार, उपग्रह, कृत्रिम मेधा और स्वचालित सैन्य प्रणालियां युद्ध का स्वरूप बदल रही हैं। कृत्रिम मेधा कुछ ही क्षणों में विशाल मात्रा में सैन्य सूचनाओं का विश्लेषण कर सकती है। लक्ष्य की पहचान, मिसाइल चेतावनी, साइबर सुरक्षा और युद्धक्षेत्र में निर्णय लेने की प्रक्रिया में कृत्रित मेधा की भूमिका बढ़ रही है।
यह तकनीकी प्रगति उपयोगी भी हो सकती है, मगर इसमें एक गंभीर खतरा छिपा है। यदि किसी कृत्रित मेधा प्रणाली ने गलत सूचना के आधार पर किसी हमले को वास्तविक खतरा मान लिया तो प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो सकता है। परमाणु हथियारों के मामले में यह खतरा और भी गंभीर हो जाता है। मशीन की गति और मनुष्य की विवेकपूर्ण निर्णय प्रक्रिया के बीच संतुलन बिगड़ना पूरी मानवता के लिए चिंता का विषय साबित हो सकता है।
फिर भी उम्मीद का आधार मौजूद है। परमाणु हथियारों के कारण महाशक्तियां जानती हैं कि सीधा युद्ध किसी एक पक्ष की विजय तक सीमित नहीं रहेगा। कूटनीतिक संपर्क अभी समाप्त नहीं हुए हैं। अमेरिका और चीन के बीच संवाद जारी है। रूस, यूरोप और अमेरिका के बीच भी विभिन्न स्तरों पर संपर्क के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
इसलिए आज सबसे जरूरी प्रश्न यह नहीं है कि तीसरा विश्वयुद्ध कब होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या दुनिया ऐसी व्यवस्था बना पाएगी जिसमें तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना को पैदा होने से पहले ही रोका जा सके?
हथियारों की संख्या बढ़ाना सुरक्षा का एक पक्ष हो सकता है लेकिन स्थायी सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं आती। उसके लिए संवाद, पारदर्शिता, संकट के समय संचार के रास्ते, अंतरराष्ट्रीय कानून और ऐसी कूटनीति चाहिए जो विरोधी को दुश्मन समझने से पहले उसके हितों को समझने का प्रयास करे।
इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि विश्वयुद्ध हमेशा किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं होते। कई बार परिस्थितियां इतनी जटिल हो जाती हैं कि घटनाएं स्वयं अपनी गति पकड़ लेती हैं। इसलिए 2026 की दुनिया के लिए सबसे बड़ा सबक यही हैकृयुद्ध की तैयारी से ज्यादा जरूरी युद्ध को रोकने की तैयारी है।
दुनिया अभी तीसरे विश्वयुद्ध में नहीं है। मगर जिस तेजी से सैन्य गठजोड़, हथियारों की दौड़, राष्ट्रवादी राजनीति, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ रहे हैं, उसे सामान्य मानकर चलना भी खतरनाक होगा। मानव सभ्यता के सामने आज फिर वही पुराना प्रश्न खड़ा हैकृक्या शक्ति का अर्थ केवल दूसरे को पराजित करने की क्षमता है, या शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण युद्ध को टालने की क्षमता भी है?
इस प्रश्न का उत्तर ही आने वाली पीढ़ियों का इतिहास तय करेगा।
