जंतर-मंतर का CJP प्रदर्शन : जब पुलिस की डिजिटल नजर पर ही उठ गए सवाल

जंतर-मंतर का CJP प्रदर्शन : जब पुलिस की डिजिटल नजर पर ही उठ गए सवाल

जंतर-मंतर पर जुलाई में हुआ Cockroach Janta Party (CJP) से जुड़ा छात्र प्रदर्शन अब केवल एक राजनीतिक आंदोलन या पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। इस पूरे प्रकरण में लोकतांत्रिक प्रदर्शन, पुलिस की निगरानी, Facial Recognition System (FRS), नागरिक निजता और पुलिस जांच की विश्वसनीयता जैसे कई गंभीर सवाल एक साथ खड़े हो गए हैं।

सबसे असहज सवाल उस समय पैदा हुआ, जब दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 20 से 26 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान उसके Facial Recognition System ने 2,873 ऐसे लोगों की पहचान की, जिनके चेहरे पुलिस के आपराधिक रिकॉर्ड से मेल खाते थे। इनमें 2,402 लोग दिल्ली पुलिस के बायोमेट्रिक डेटाबेस ‘Crime Kundli’ से और 471 लोग अन्य आपराधिक रिकॉर्ड से जुड़े डेटाबेस से संभावित रूप से मैच किए गए थे। पुलिस ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि केवल FRS मैच के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाएगी और प्रत्येक मामले में field verification किया जाएगा। यहीं से कहानी दिलचस्प भी होती है और गंभीर भी।

2,873 चेहरे और 25 जेलबंद लोग

The Indian Express ने पुलिस, जेल और अदालतों के रिकॉर्ड के आधार पर इन संभावित पहचानों की पड़ताल की। उसकी जांच में कम-से-कम 25 ऐसे लोग मिले, जिन्हें FRS ने जंतर-मंतर पर मौजूद बताया था, जबकि संबंधित रिकॉर्ड के अनुसार वे उस समय जेल में बंद थे। इनमें 17 लोग हत्या, चार बलात्कार और चार हत्या के प्रयास से जुड़े मामलों में जेल में थे।

इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि FRS की पूरी प्रणाली गलत है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि पुलिस ने जानबूझकर गलत नाम जोड़े। मगर इतना जरूर कहा जा सकता है कि FRS द्वारा मिला चेहरा और किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान एक ही चीज नहीं है।

मसलन, प्रताप सिंह सिसोदिया को पुलिस की Facial Recognition System ने जंतर-मंतर प्रदर्शन में मौजूद व्यक्ति के रूप में चिन्हित किया। मगर उपलब्ध जेल रिकॉर्ड के अनुसार वह उस समय जेल में था। इसी तरह योगेश उर्फ राजू का मामला सामने आया, जिसे FRS ने 25 जुलाई को जंतर-मंतर पर मौजूद बताया, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार वह उस समय तिहाड़ जेल में बंद था।

यहां तकनीक के विरुद्ध भावनात्मक निष्कर्ष निकालने के बजाय एक सरल सवाल पूछना चाहिए—अगर किसी व्यक्ति के जेल में होने का रिकॉर्ड उपलब्ध है और वही व्यक्ति किसी प्रदर्शन में मौजूद बताया जाता है, तो अंतिम सत्य कौन है—कैमरा या रिकॉर्ड? जवाब शायद दोनों में से किसी एक को चुनने का नहीं है। जवाब है—स्वतंत्र सत्यापन।

Facial Recognition : पहचान या केवल संकेत?

Facial Recognition System चेहरे की विशेषताओं का डिजिटल विश्लेषण करके उन्हें किसी डेटाबेस में मौजूद तस्वीरों से मिलाता है। किसी निर्धारित समानता-स्तर को पार करने पर सिस्टम संभावित match देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि मशीन ने किसी व्यक्ति की पहचान को न्यायिक रूप से प्रमाणित कर दिया।

The Indian Express की व्याख्या के अनुसार दिल्ली पुलिस ने 2022 में एक RTI के जवाब में बताया था कि उसके सिस्टम में 80 प्रतिशत accuracy threshold को “positive” match माना जाता था। इसका सीधा अर्थ यह है कि सिस्टम का परिणाम आगे की जांच का आधार हो सकता है, अंतिम प्रमाण नहीं।

यही कारण है कि दिल्ली पुलिस का यह कहना महत्वपूर्ण है कि FRS से मिले परिणामों पर सीधे कार्रवाई नहीं होगी और field verification किया जाएगा। मगर फिर दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—जब शुरुआती तकनीकी पहचान में ही गलतियां सामने आ रही हों, तो verification की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और स्वतंत्र होगी? यहीं इस पूरे मामले की असली परीक्षा है।

प्रदर्शन और ‘बाहरी लोगों’ का सवाल

CJP से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने प्रदर्शन के दौरान बाहरी लोगों द्वारा हिंसा किए जाने और उन्हें कथित संरक्षण मिलने के आरोप लगाए हैं। यह आरोप गंभीर हैं, मगर उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री के आधार पर इसे अभी स्थापित तथ्य के रूप में नहीं लिखा जा सकता कि पुलिस ने स्वयं किसी बाहरी समूह को प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए भेजा था। आरोप को आरोप की तरह और प्रमाण को प्रमाण की तरह प्रस्तुत करना जरूरी है। लोकतांत्रिक आंदोलनों में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाना उतना ही वैध है, जितना प्रदर्शनकारियों के आचरण की जांच होना। मगर दोनों मामलों में प्रमाण का एक ही मानदंड होना चाहिए।

स्वतंत्र भारद्वाज का मामला

इस पूरे विवाद में स्वतंत्र भारद्वाज का प्रकरण इसलिए अलग महत्व रखता है क्योंकि यहां मामला केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आपराधिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचा।

जुलाई के प्रदर्शन से जुड़े एक मामले में छात्र कार्यकर्ता निशु आजाद के पिता संजय आजाद के साथ कथित मारपीट को लेकर स्वतंत्र भारद्वाज को सितंबर में गिरफ्तार किया गया। पुलिस और अन्य रिपोर्टों के अनुसार गिरफ्तारी उनके एक वीडियो/बयान के बाद हुई, जिसमें उन्होंने कथित हमले का उल्लेख किया था। बाद में मामले में SC/ST Act सहित अतिरिक्त धाराएं जोड़ी गईं। अब इस मामले में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो चुका है। दिल्ली की अदालत ने सितंबर में भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी। अदालत ने जांच से जुड़े कुछ सवालों और शिकायतकर्ता तथा उसकी बेटी की सुरक्षा को भी ध्यान में रखा। इसका अर्थ यही है कि मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और अंतिम दोष या निर्दोषता का निष्कर्ष अदालत के समक्ष ही तय होगा।

इसलिए उन्हें “हमलावर” कहना उचित नहीं होगा। “हमले के मामले में आरोपी और बाद में अंतरिम जमानत पाने वाले स्वतंत्र भारद्वाज” कहना अधिक तथ्यपरक होगा।

एक नाबालिग कार्यकर्ता के घर पत्थरबाजी का आरोप

इसके बाद CJP से जुड़े एक नाबालिग कार्यकर्ता के घर पर पत्थर फेंके जाने का आरोप भी सामने आया। यदि यह घटना हुई है तो इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। मगर किसने पत्थरबाजी की, उसका उद्देश्य क्या था और इसका संबंध प्रदर्शन से था या नहीं—इन प्रश्नों का उत्तर जांच पूरी होने के बाद ही दिया जा सकता है। किसी घटना को नजरअंदाज नहीं किया जाए, मगर किसी अपुष्ट आरोप को तथ्य भी न बनाया जाए।

सुप्रीम कोर्ट और 2,873 लोगों का सवाल

इस प्रकरण का संवैधानिक पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शन से जुड़ी FIRs को रद्द करते हुए पुलिस को FRS के जरिए चिन्हित 2,873 लोगों के संबंध में आगे बढ़ने की अनुमति दी थी। साथ ही पुलिस का अपना पक्ष यह रहा कि इन लोगों के खिलाफ केवल Facial Recognition match के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाएगी, बल्कि field verification किया जाएगा। इससे एक महत्वपूर्ण स्थिति बनती है।

अदालत ने जांच के रास्ते को बंद नहीं किया है। मगर उस जांच की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि पुलिस तकनीकी पहचान को किस तरह स्वतंत्र प्रमाणों से पुष्ट करती है। यानी अदालत ने FRS को अंतिम सत्य घोषित नहीं किया है। बल्कि पुलिस के अपने कथन के अनुसार भी यह जांच की शुरुआती कड़ी है।

असली मुद्दा तकनीक नहीं, तकनीक पर निर्भरता है

आज पुलिसिंग में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कैमरे, बायोमेट्रिक डेटाबेस, Facial Recognition और दूसरे डिजिटल उपकरण अपराध की जांच में उपयोगी हो सकते हैं। मगर तकनीक जितनी शक्तिशाली होती जाती है, उसके इस्तेमाल की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। जंतर-मंतर की घटना इसी बिंदु पर महत्वपूर्ण हो जाती है।

अगर किसी प्रदर्शन स्थल से हजारों चेहरे स्कैन किए जाते हैं और उनमें से 2,873 संभावित matches सामने आते हैं, तो नागरिक को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि—

  • कुल कितने matches का स्वतंत्र सत्यापन हुआ?
  • कितने सही पाए गए?
  • कितने गलत निकले?
  • कितने मामलों में केवल FRS के आधार पर आगे जांच शुरू हुई?
  • कितने मामलों में दूसरे स्वतंत्र प्रमाण मिले?
  • जिन लोगों की गलत पहचान हुई, उनके लिए जवाबदेही की व्यवस्था क्या है?

ये केवल CJP के लिए सवाल नहीं हैं। ये भविष्य के हर लोकतांत्रिक प्रदर्शन से जुड़े सवाल हैं।

नागरिक की निजता और विरोध का अधिकार

किसी लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों का हिस्सा है। वहीं कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है। दोनों के बीच संतुलन आसान नहीं है।

यदि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद हर व्यक्ति की पहचान आपराधिक डेटाबेस से मिलाई जाती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस प्रक्रिया की कानूनी सीमा क्या है। क्या हर प्रदर्शनकारी संभावित संदिग्ध है? क्या किसी नागरिक का चेहरा किसी पुलिस डेटाबेस में मौजूद होने भर से उसे संदिग्ध मानने का आधार बन सकता है?

इन सवालों का उत्तर तकनीक नहीं दे सकती। इसका उत्तर कानून, न्यायिक निगरानी और पारदर्शी प्रक्रिया से ही मिलेगा।

क्या इससे किसी बड़ी साजिश का निष्कर्ष निकलता है?

अभी नहीं। यह सावधानी इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए सबसे जरूरी है। हमारे सामने कुछ अलग-अलग तथ्य और आरोप हैं।

पहला, दिल्ली पुलिस ने 2,873 लोगों के FRS matches की बात कही है। दूसरा, The Indian Express की रिकॉर्ड-आधारित जांच में कम-से-कम 25 ऐसे लोग मिले जो उस समय जेल में थे। तीसरा, प्रदर्शनकारियों ने बाहरी लोगों द्वारा हिंसा और कथित संरक्षण का आरोप लगाया है। चौथा, स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ कथित मारपीट का मामला दर्ज हुआ, गिरफ्तारी हुई और बाद में उन्हें अंतरिम जमानत मिली। पांचवां, एक नाबालिग कार्यकर्ता के घर पर कथित पत्थरबाजी की घटना सामने आई है।

इन सबको जोड़कर तत्काल यह निष्कर्ष निकाल देना कि “पुलिस ने सुनियोजित तरीके से आंदोलन दबाया”, उपलब्ध प्रमाणों से आगे जाना होगा। उसी तरह यह कहना भी उतना ही जल्दबाजी भरा होगा कि “जंतर-मंतर पर हजारों अपराधी जमा थे और पुलिस ने उन्हें पहचान लिया।” 25 जेलबंद लोगों का मामला कम-से-कम इतना जरूर बताता है कि तकनीकी पहचान को स्वतंत्र सत्यापन के बिना अंतिम तथ्य नहीं बनाया जा सकता।

असली कहानी 2,873 चेहरों की नहीं है

जंतर-मंतर का यह प्रकरण अंततः CJP बनाम दिल्ली पुलिस की कहानी से कहीं बड़ा प्रश्न सामने रखता है। यह प्रश्न है—क्या लोकतंत्र में तकनीक निगरानी का साधन बनेगी या नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर निगरानी का तंत्र? पुलिस को अपराधियों की पहचान करने के लिए आधुनिक तकनीक मिलनी चाहिए। मगर नागरिक को यह भरोसा भी मिलना चाहिए कि मशीन की गलती उसकी स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा या कानूनी अधिकारों को नुकसान नहीं पहुंचाएगी।

एक कैमरा किसी चेहरे को पहचान सकता है। एक डेटाबेस किसी पुराने रिकॉर्ड से समानता खोज सकता है। एक एल्गोरिद्म संभावित match दे सकता है। मगर अपराध सिद्ध नहीं कर सकता। न्याय तो बिल्कुल नहीं कर सकता।

इसलिए जंतर-मंतर प्रकरण में सबसे जरूरी काम किसी एक पक्ष को दोषी या निर्दोष घोषित करना नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम का स्वतंत्र परीक्षण है। FRS की 2,873 पहचानों का audit होना चाहिए। गलत matches कितने थे, सही matches कितने थे और किन मामलों में field verification के बाद कार्रवाई हुई—यह सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनना चाहिए।

बाहरी लोगों द्वारा हिंसा के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। स्वतंत्र भारद्वाज के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को अपना काम करने दिया जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों के आरोपों की जांच होनी चाहिए तो पुलिस के दावों की भी। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार केवल प्रदर्शनकारी का नहीं होता और जवाब देने की जिम्मेदारी केवल पुलिस की नहीं होती। दोनों को प्रमाण की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है।

जंतर-मंतर की इस कहानी से फिलहाल सबसे बड़ा सबक यही निकलता है—तकनीक पुलिस की आंख हो सकती है, मगर न्याय की आंख नहीं। और जब पुलिस की डिजिटल आंख किसी जेल में बंद व्यक्ति को जंतर-मंतर पर खड़ा दिखा दे, तब उस आंख पर भरोसा करने से पहले उसका परीक्षण करना लोकतंत्र के लिए कमजोरी नहीं, बल्कि मजबूती की निशानी है।

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