रैली की भीर से आगे : राहुल गांधी का नेतृत्व और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

रैली की भीर से आगे : राहुल गांधी का नेतृत्व और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि सत्ता को जवाबदेह बनाए रखना भी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की शक्ति जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका संस्थागत संतुलन भी है। संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। इसलिए जब किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तब विपक्ष का दायित्व केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि उन सवालों को तथ्य, तर्क और लोकतांत्रिक मर्यादा के साथ देश के सामने रखना भी होता है।

एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित INDA गठबंधन की रैली को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वोट बचाओ, देश बचाओ के नारे के साथ आयोजित इस रैली का मुख्य उद्देश्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष की आपत्तियों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाना था। इस आयोजन में कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दलों और अन्य विपक्षी संगठनों के नेताओं की भागीदारी रही। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी और अन्य नेताओं की उपस्थिति ने इसे किसी एक दल के कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर विपक्षी गठबंधन के सामूहिक शक्ति प्रदर्शन का रूप दिया।

इस रैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष राहुल गांधी का नेतृत्व प्रभाव है। पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने अपनी राजनीतिक भूमिका को केवल कांग्रेस के संगठनात्मक नेतृत्व तक सीमित रखने के बजाय विपक्षी राजनीति के व्यापक चेहरे के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। भारत जोड़ो यात्रा, भारत जोड़ो न्याय यात्रा और संसद में उठाए गए विभिन्न मुद्दों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक न्याय, संविधान, लोकतांत्रिक अधिकारों और संस्थागत जवाबदेही को अपनी राजनीति के प्रमुख विषयों में शामिल किया है।

रामलीला मैदान की रैली इस राजनीतिक प्रयास की एक और कड़ी थी। विभिन्न विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दलों को एक मंच पर लाना अपने आप में आसान काम नहीं है। विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस के अतिरिक्त ऐसे दल भी हैं जिनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और नेतृत्व संबंधी अपेक्षाएं हैं। ऐसे में राहुल गांधी के लिए चुनौती केवल भीड़ जुटाने की नहीं, बल्कि सहयोगी दलों के बीच साझा राजनीतिक उद्देश्य विकसित करने की भी है।

इस दृष्टि से रैली में विपक्ष के प्रमुख नेताओं की भागीदारी महत्वपूर्ण रही। इससे यह संकेत अवश्य मिला कि चुनावी प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर विपक्ष के भीतर कुछ साझा चिंताएं हैं। हालांकि साझा मंच पर उपस्थिति को स्थायी राजनीतिक एकजुटता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। विपक्ष की वास्तविक एकजुटता की परीक्षा तब होगी जब सीटों के बंटवारे, नेतृत्व, चुनावी रणनीति और क्षेत्रीय राजनीतिक हितों से जुड़े कठिन सवाल सामने आएंगे।

राहुल गांधी के नेतृत्व की वास्तविक सफलता इस बात से निर्धारित होगी कि वे इन अंतर्विरोधों के बीच कितना संवाद और समन्वय स्थापित कर पाते हैं। किसी भी राजनीतिक रैली का मूल्यांकन करते समय उसमें जुटी भीड़ एक महत्वपूर्ण संकेतक होती है, लेकिन उसे सफलता का एकमात्र पैमाना नहीं बनाया जा सकता। इस रैली के आयोजन से पहले कांग्रेस ने दस लाख लोगों की भागीदारी का लक्ष्य रखा था। आयोजन में हजारों लोग शामिल हुए। हालांकि वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। भाजपा ने खाली कुर्सियों और मैदान के कुछ हिस्सों के खाली रहने का हवाला देते हुए कांग्रेस के दावों पर सवाल उठाए। स्वतंत्र रूप से प्रमाणित कुल संख्या उपलब्ध नहीं होने के कारण किसी एक राजनीतिक पक्ष के दावे को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा।

फिर भी यह स्पष्ट है कि दिल्ली में विभिन्न राज्यों से कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जुटाने के लिए व्यापक संगठनात्मक प्रयास किया गया। विपक्षी नेताओं का एक साथ मार्च करना और रामलीला मैदान में सभा करना राजनीतिक दृष्टि से उल्लेखनीय रहा।

इसके बावजूद दस लाख की घोषित अपेक्षा और वास्तविक भागीदारी के बीच अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी राजनीतिक दल को अपनी उपलब्धियों का आकलन करते समय अपने ही घोषित लक्ष्यों के प्रति ईमानदार होना चाहिए। केवल आयोजन की भव्यता या मंच पर उपस्थित नेताओं की संख्या से जनसमर्थन की व्यापकता प्रमाणित नहीं होती। रैली की भीड़ ने विपक्ष की संगठनात्मक क्षमता का संकेत दिया, लेकिन इसे स्वतः व्यापक जनआंदोलन का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी।

इस रैली का सबसे महत्वपूर्ण विषय निर्वाचन प्रक्रिया की विश्वसनीयता था। विपक्ष ने विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने पर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने लगभग 13.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का उल्लेख करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बताया।

दूसरी ओर निर्वाचन आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखने के लिए मृत, स्थानांतरित, दोहराव वाले तथा अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना आवश्यक है। आयोग यह भी कहता रहा है कि जिन पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हट गए हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से पुनः पंजीकरण करा सकते हैं।

यहां मूल प्रश्न केवल नाम हटाए जाने की संख्या का नहीं है। असली सवाल यह है कि नाम हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी, पात्र मतदाताओं को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिला या नहीं और किसी नागरिक का मताधिकार प्रशासनिक त्रुटि के कारण समाप्त तो नहीं हो गया।

मतदाता सूची में अनावश्यक नाम बने रहना जितना अनुचित है, उतना ही गंभीर मामला किसी पात्र नागरिक का नाम हटा दिया जाना भी है। दोनों स्थितियां चुनावी विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं। इसलिए इस विषय पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय निर्वाचन आयोग को स्पष्ट आंकड़ों, सार्वजनिक स्पष्टीकरण और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था के माध्यम से अपनी विश्वसनीयता मजबूत करनी चाहिए।

साथ ही विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह अपने आरोपों को प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करे। किसी संस्था पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सवालों की गंभीरता उनके प्रमाणों से ही स्थापित होती है।

रैली में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध भविष्य में कानूनी कार्रवाई की बात कही। उनके भाषण में राजनीतिक चुनौती का स्वर स्पष्ट था। यह विपक्ष की आक्रामक राजनीतिक शैली का हिस्सा हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी आरोप और संभावित कार्रवाई के बीच कानूनी प्रक्रिया तथा प्रमाणों का महत्व बना रहना चाहिए।

वहीं भाजपा ने रैली को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। सत्ता पक्ष की इस प्रतिक्रिया को भी राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। किसी भी संवैधानिक संस्था की आलोचना को स्वतः अराजकता का प्रयास नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर किसी संस्था के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को केवल विपक्षी राजनीति कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा।

लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि आरोपों की जांच हो, संस्थाओं को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले और राजनीतिक असहमति को देशविरोध या अराजकता के रूप में प्रस्तुत करने से बचा जाए।

रामलीला मैदान की रैली के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आगे क्या होगा? क्या यह आयोजन एक दिन के राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन तक सीमित रह जाएगा या मतदाता अधिकारों और चुनाव सुधारों को लेकर किसी व्यापक लोकतांत्रिक अभियान का आधार बनेगा?

यदि विपक्ष वास्तव में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर गंभीर है तो उसे कुछ ठोस प्रस्ताव देश के सामने रखने होंगे। मतदाता सूची के पुनरीक्षण की स्पष्ट और सार्वजनिक प्रक्रिया, नाम हटाए जाने के कारणों की जानकारी, पात्र मतदाताओं के लिए आसान अपील व्यवस्था, राजनीतिक दलों की शिकायतों के निष्पक्ष निस्तारण और निर्वाचन आयोग की संस्थागत पारदर्शिता जैसे विषयों पर एक विस्तृत सुधार कार्यक्रम प्रस्तुत करना आवश्यक है।

सिर्फ मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। यदि किसी पदाधिकारी के विरुद्ध गंभीर आरोप हैं तो उनकी जांच के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। साथ ही निर्वाचन आयोग की नियुक्ति, कार्यप्रणाली और जवाबदेही से जुड़े व्यापक सुधारों पर भी राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश होनी चाहिए।

विपक्ष को यह भी समझना होगा कि लोकतांत्रिक आंदोलन केवल अपने समर्थकों को जुटाने से नहीं बनते। वे तब व्यापक होते हैं जब उनसे असहमत लोग भी उनके द्वारा उठाए गए सवालों की गंभीरता को स्वीकार करने लगते हैं। इसके लिए राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी सीमाओं से बाहर निकलकर नागरिक समाज, युवाओं, सामाजिक संगठनों और आम मतदाताओं के साथ संवाद स्थापित करना होगा।

राहुल गांधी के नेतृत्व वाली रामलीला मैदान की रैली को न तो केवल भीड़ के आधार पर सफल घोषित किया जा सकता है और न ही भाजपा की आलोचना के आधार पर विफल। इसने विपक्ष को एक साझा मंच दिया, चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय विमर्श में बनाए रखा और राहुल गांधी को विपक्षी राजनीति के एक प्रमुख समन्वयकारी चेहरे के रूप में सामने आने का अवसर दिया। लेकिन इन उपलब्धियों का वास्तविक महत्व भविष्य की राजनीतिक और संगठनात्मक निरंतरता से तय होगा।

राहुल गांधी के सामने भी यही चुनौती है कि वे विरोध की राजनीति को सकारात्मक राजनीतिक विकल्प में बदलें। किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की स्थायी शक्ति केवल इस बात में नहीं होती कि वह किसका विरोध कर रहा है, बल्कि इस बात में होती है कि वह देश के सामने कौन-सा बेहतर विकल्प रख रहा है।

भारतीय लोकतंत्र को मजबूत विपक्ष की आवश्यकता है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यकता ऐसे विपक्ष की है जो सत्ता से सवाल पूछने के साथ स्वयं भी जवाबदेही स्वीकार करे। उसे केवल चुनावी अनियमितताओं का विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि निष्पक्ष चुनाव की ऐसी व्यवस्था के लिए भी पहल करनी चाहिए जिसे सत्ता और विपक्ष, दोनों स्वीकार कर सकें।

अंततः इस रैली की सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि क्या यह भारतीय लोकतंत्र में संस्थागत जवाबदेही की मांग को व्यापक जनआंदोलन में बदल पाएगी, या विपक्षी राजनीति के एकदिवसीय शक्ति प्रदर्शन के रूप में दर्ज होकर रह जाएगी? क्या विपक्ष चुनाव आयोग की आलोचना से आगे बढ़कर चुनाव सुधारों का कोई ठोस, विश्वसनीय और सर्वस्वीकार्य प्रस्ताव देश के सामने रख पाएगा?

लोकतंत्र की असली शक्ति न सत्ता की निरंकुशता में है और न विपक्ष के आक्रोश में। उसकी शक्ति संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों के विश्वास और सत्ता को जवाबदेह बनाने वाली सतत लोकतांत्रिक चेतना में निहित है। रामलीला मैदान की रैली की ऐतिहासिक उपयोगिता भी इसी कसौटी पर तय होगी।

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