गैतम चौधरी
अठारहवीं सदी का भारतीय इतिहास केवल मुगल साम्राज्य के पतन और अंग्रेजी सत्ता के उदय की कहानी नहीं है। यह उस दौर का इतिहास भी है, जब क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने राजनीतिक अधिकारों का विस्तार कर रही थीं, पुराने साम्राज्य की वैधता चुनौती के घेरे में थी और सैन्य शक्ति के साथ कूटनीति भी सत्ता प्राप्त करने का महत्त्वपूर्ण साधन बन गई थी। इस संक्रमणकाल में बेगम समरू का व्यक्तित्व विशेष महत्त्व रखता है। एक साधारण सामाजिक पृष्ठभूमि से उठकर सरधना की शासक और प्रशिक्षित सेना की कमांडर बनने वाली बेगम समरू ने मुगल दरबार, मराठा शक्ति और सिख सरदारों के बीच अपने लिए विशिष्ट स्थान बनाया।
उनके जीवन का सबसे रोचक प्रसंग 1783 में दिल्ली पहुँची सिख सेना और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के बीच हुए राजनीतिक समझौते से जुड़ा है। यह घटना केवल एक महिला की कूटनीतिक सफलता नहीं थी। यह उस समय की सत्ता-व्यवस्था, सिख राजनीतिक उभार और मुगल साम्राज्य की घटती क्षमता को समझने की कुंजी भी है।
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का विघटन क्रमशः तेज होता गया। प्रांतीय शासकों, मराठों, जाटों, सिखों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों ने अपनी राजनीतिक स्वायत्तता बढ़ाई। दिल्ली में बादशाह का पद बना रहा, लेकिन उसके पास साम्राज्य के विशाल भूभाग पर प्रभावी नियंत्रण रखने के साधन लगातार कम होते गए।
पंजाब और उत्तर-पश्चिमी भारत में सिख मिसलों का सैन्य तथा राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा था। सिख सरदार केवल स्थानीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर रहे थे। वे यमुना के पार दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में भी अपनी शक्ति स्थापित करने लगे थे। उनके अभियानों में सैन्य कार्रवाई के साथ राजस्व वसूली, सुरक्षा संबंधी समझौते और राजनीतिक मान्यता प्राप्त करने की कोशिशें भी शामिल थीं।
मार्च 1783 में बघेल सिंह के नेतृत्व में सिख सेना दिल्ली पहुँची। इस अभियान में जस्सा सिंह अहलूवालिया और अन्य सिख नेताओं की भी भूमिका थी। सिख सेनाओं ने लाल किले के दीवान-ए-आम तक पहुँचकर मुगल सत्ता की वास्तविक कमजोरी उजागर कर दी। शाह आलम द्वितीय के लिए यह केवल सैन्य चुनौती नहीं थी, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा और राजधानी पर नियंत्रण का प्रश्न भी था।
इस संकट के समय शाह आलम द्वितीय ने बेगम समरू से सहायता माँगी। बेगम समरू सरधना की जागीर की शासक थीं और उनके पास प्रशिक्षित सैनिकों तथा यूरोपीय सैन्य अधिकारियों से युक्त सेना थी। मुगल दरबार के साथ उनके पुराने संबंध थे। बादशाह उन्हें अपनी विश्वस्त सहयोगी मानता था।
बेगम समरू ने सिख सेनानायक बघेल सिंह से बातचीत की। इतिहासकार हरि राम गुप्ता के विवरण के अनुसार, 1783 में हुए समझौते में सिख सेना के बड़े हिस्से की पंजाब वापसी, बघेल सिंह की टुकड़ी का दिल्ली में बने रहना, गुरुद्वारों के निर्माण की अनुमति और सैनिकों के खर्च के लिए चुंगी से आय प्राप्त करने जैसी शर्तें शामिल थीं। इस समझौते को बादशाह की स्वीकृति भी मिली। अलग-अलग विवरणों में गुरुद्वारों की संख्या और राजस्व संबंधी शर्तों के उल्लेख में अंतर मिलता है।
यहाँ बेगम समरू की कूटनीतिक भूमिका का वास्तविक महत्त्व सामने आता है। उन्होंने सिख सेना को निर्णायक युद्ध में पराजित करने का दावा नहीं किया, बल्कि बातचीत के माध्यम से ऐसा समाधान निकालने का प्रयास किया जिससे दिल्ली में तत्काल तनाव कम हो और मुगल बादशाह को अपनी सत्ता बनाए रखने का अवसर मिले।
दूसरी ओर, सिख नेतृत्व भी अपने राजनीतिक और धार्मिक हितों को आगे बढ़ाने में सफल रहा। दिल्ली में गुरुद्वारों के निर्माण का अधिकार और आर्थिक संसाधनों तक पहुँच महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं। इस प्रकार समझौते को केवल मुगल बादशाह की रक्षा के रूप में देखना अधूरा होगा। यह सिख शक्ति की बढ़ती राजनीतिक मान्यता का भी प्रमाण था।
बघेल सिंह और अन्य सिख सरदारों की रणनीति को समझने के लिए उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर ध्यान देना आवश्यक है। सिख मिसलों के बीच अपने-अपने क्षेत्रीय हित थे, फिर भी दिल्ली की ओर अभियान में सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के साथ राजनीतिक लाभ प्राप्त करने की संभावना भी थी।
दिल्ली में गुरुद्वारों के निर्माण की अनुमति का प्रश्न विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह धार्मिक स्मृति, संस्थागत उपस्थिति और राजधानी में स्थायी पहचान से जुड़ा था। आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था ने सिख सैन्य दल की उपस्थिति को बनाए रखने में भी सहायता की।
इसलिए 1783 के समझौते को सिख कूटनीति की दृष्टि से देखें तो तीन बातें उभरती हैं। पहली, सैन्य दबाव को वार्ता में बदलना। दूसरी, धार्मिक और संस्थागत हितों को राजनीतिक समझौते का हिस्सा बनाना। तीसरी, राजधानी में अपनी उपस्थिति को केवल अस्थायी सैनिक अभियान तक सीमित न रखना।
इस घटनाक्रम को आधुनिक अर्थों में किसी एकीकृत राष्ट्रीय या लोकतांत्रिक कूटनीति का उदाहरण मानना ऐतिहासिक संदर्भ को सरल बना देना होगा। उस समय सिख मिसलें, मुगल दरबार और मराठा सत्ता अलग-अलग हितों तथा संसाधनों के आधार पर निर्णय ले रहे थे। उनकी नीतियों में धार्मिक उद्देश्य, क्षेत्रीय विस्तार, राजस्व और सैन्य सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
बेगम समरू की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते समय एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—क्या उनकी मुगल बादशाह के प्रति निष्ठा व्यक्तिगत संबंधों का परिणाम थी, अथवा अपने राज्य के हितों की रक्षा करने की व्यावहारिक रणनीति?
इसका उत्तर किसी एक कारण में सीमित नहीं किया जा सकता। मुगल बादशाह से प्राप्त जागीर और राजकीय मान्यता उनकी सत्ता के महत्त्वपूर्ण आधार थे। शाह आलम द्वितीय की सहायता करना उनके लिए राजनीतिक संबंधों को सुरक्षित रखने का साधन भी था। साथ ही, उनकी अपनी प्रशिक्षित सेना और स्वतंत्र निर्णय क्षमता उन्हें सामान्य दरबारी सहयोगियों से अलग करती थी।
बेगम समरू का राजनीतिक जीवन यह भी दिखाता है कि अठारहवीं सदी के शासकों के लिए स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु की अवधारणा अक्सर व्यावहारिक राजनीति के सामने कमजोर पड़ जाती थी। बदलते शक्ति-संतुलन में संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करना शासन की आवश्यकता बन गया था।
उनका व्यक्तित्व इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने हर संघर्ष में विजय प्राप्त की, बल्कि इसलिए कि उन्होंने सीमित संसाधनों और अस्थिर राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अपनी सत्ता को लंबे समय तक बनाए रखा।
बेगम समरू की कूटनीतिक भूमिका का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रसंग रोहिल्ला सरदार गुलाम कादिर से जुड़ा है। 1787 में गुलाम कादिर ने दिल्ली की ओर बढ़ते हुए मुगल सत्ता को चुनौती दी। बेगम समरू ने शाह आलम द्वितीय का साथ दिया और गुलाम कादिर के साथ सत्ता तथा लूट बाँटने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। 1788 में गुलाम कादिर फिर दिल्ली पहुँचा और बादशाह को अंधा कर दिया। इसके बाद महादजी सिंधिया की मराठा शक्ति ने हस्तक्षेप किया और गुलाम कादिर को पकड़ लिया गया।
यह प्रसंग बेगम समरू के राजनीतिक चरित्र की एक दूसरी परत सामने लाता है। जहाँ 1783 में उन्होंने सिख शक्ति के साथ समझौते का रास्ता चुना, वहीं गुलाम कादिर के मामले में मुगल बादशाह की रक्षा के लिए सैन्य प्रतिरोध का रास्ता अपनाया। इन दोनों घटनाओं में विरोधाभास खोजने के बजाय परिस्थितियों को समझना अधिक उपयोगी है। बघेल सिंह के साथ वार्ता से परस्पर हितों पर आधारित समझौता संभव था, जबकि गुलाम कादिर की कार्रवाई ने मुगल दरबार की सुरक्षा और बेगम समरू के अपने राजनीतिक संबंधों को सीधे चुनौती दी।
बेगम समरू की कहानी को केवल एक साहसी महिला की जीवनी के रूप में प्रस्तुत करना आकर्षक हो सकता है, लेकिन उससे इतिहास की व्यापक तस्वीर अधूरी रह जाती है। उनकी सफलता के पीछे प्रशिक्षित सेना, आर्थिक संसाधन, जागीर से प्राप्त आय, मुगल दरबार से संबंध और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की क्षमता थी।
इसी प्रकार सिखों की दिल्ली में उपस्थिति को केवल आक्रमण या लूट की दृष्टि से देखना भी पर्याप्त नहीं है। उनके अभियान में सैन्य दबाव के साथ धार्मिक संस्थाओं की स्थापना, राजस्व संबंधी अधिकार और राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के उद्देश्य भी दिखाई देते हैं। इन उद्देश्यों का मूल्यांकन तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
बेगम समरू और बघेल सिंह का प्रसंग इस तथ्य की याद दिलाता है कि इतिहास में शक्ति का अर्थ केवल युद्धभूमि में जीतना नहीं होता। कभी-कभी बातचीत, संसाधनों का प्रबंधन और विरोधी पक्ष के हितों को समझना भी निर्णायक सिद्ध होता है। मुगल बादशाह अपनी राजधानी में सत्ता के प्रतीक के रूप में मौजूद था, लेकिन सिख सेना की शक्ति ने उसे समझौता करने के लिए विवश किया। बेगम समरू ने इस संकट में मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जबकि सिख नेतृत्व ने अपने राजनीतिक और धार्मिक हितों को आगे बढ़ाया।
इतिहास की संतुलित समझ यही है कि बेगम समरू की कूटनीति और सिख शक्ति के उभार—दोनों को अपने-अपने संदर्भ में देखा जाए। न बेगम समरू को केवल मुगल सत्ता की रक्षक बनाकर सीमित किया जा सकता है, न सिखों की राजनीतिक उपलब्धियों को केवल सैन्य आक्रमण की कहानी में समेटा जा सकता है। दोनों के बीच हुआ संवाद उस समय की बहुध्रुवीय राजनीति का उदाहरण है, जिसमें कोई भी शक्ति अकेले पूरे उत्तर भारत पर निर्णायक नियंत्रण स्थापित नहीं कर पा रही थी।
आज इस इतिहास से सबसे महत्त्वपूर्ण सीख यह मिलती है कि राजनीतिक शक्ति की स्थिरता केवल सैन्य सामर्थ्य से नहीं आती। उसे वैधता, संस्थागत उपस्थिति, आर्थिक आधार और वार्ता की क्षमता की भी आवश्यकता होती है। अठारहवीं सदी का उत्तर भारत इसी जटिल अंतर्संबंध का साक्षी था।
