राजेश खण्डेलवाल
कभी घर-घर में मिट्टी के दीये, मटके और बर्तनों की मांग होती थी। कुम्हार के चाक पर घूमती मिट्टी से सिर्फ बर्तन ही नहीं बनते थे, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक परंपरा भी आकार लेती थी। पिता के साथ चाक पर हाथ आजमाते बच्चे इसी हुनर को सीखकर बड़े होते थे, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। नई पीढ़ी इस परंपरागत काम को अपनाने से कतरा रही है। इसकी वजह केवल कम आमदनी और अधिक मेहनत नहीं, बल्कि मिट्टी जैसी बुनियादी जरूरत का संकट भी है। हालात ऐसे हैं कि जिन परिवारों की पहचान पीढिय़ों से मिट्टी के बर्तन बनाने से रही है, वे भी अपने बच्चों को दूसरे काम, नौकरी या व्यवसाय की राह तलाशने की सलाह दे रहे हैं।
यह कहानी केवल मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों की नहीं है, बल्कि उस पुश्तैनी हुनर की है, जो कच्चे माल के अभाव और आर्थिक अनिश्चितता के बीच अगली पीढ़ी तक पहुंचने के लिए संघर्ष करता हुआ दम तोड़ रहा है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों की बातों से साफ है कि उन्हें काम से परहेज नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से शिकायत है, जिसमें मेहनत करने के लिए जरूरी मिट्टी तक जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। भरतपुर के रामबाबू प्रजापति ने करीब 30-35 साल पहले मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शुरू किया। उनसे पहले उनके पिता इसी काम से परिवार चलाते थे। पहले मिट्टी की उपलब्धता आसान थी लेकिन अब हालात बदल गए हैं। नहरों से मिट्टी मिलना बंद होने और दूसरे स्रोतों पर निर्भरता बढ़ने के कारण कच्चे माल की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बन गया है। मिट्टी की एक ट्रॉली के लिए करीब पांच हजार रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
यह खर्च केवल मिट्टी लाने तक सीमित नहीं है। इसके बाद बर्तन बनाने, सुखाने, पकाने और बाजार तक पहुंचाने में भी समय, श्रम और पैसा लगता है। मिट्टी की गुणवत्ता सही नहीं मिली और पकाते समय बर्तन फट गए तो पूरी मेहनत और लागत पर पानी फिर जाता है। कुम्हारों की समस्या यह है कि महंगी मिट्टी खरीदने के बाद भी उसकी गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं होती। अलग-अलग जगह की मिट्टी का स्वभाव अलग होता है। जिस मिट्टी से दीये या साधारण बर्तन तैयार हो जाते हैं, जरूरी नहीं कि उसी से ऐसे बर्तन बन सकें, जिन्हें चूल्हे पर रखकर खाना पकाया जा सके।
कुम्हारों के सामने केवल मिट्टी की कीमत बढऩे का सवाल नहीं है, बल्कि उसे वैध तरीके से प्राप्त करने की समस्या भी है। पहले नहरों से मिट्टी ले आते थे लेकिन नहरों के पक्का होने और सडक़ों के निर्माण के बाद यह रास्ता भी सीमित हो गया। अब निजी जमीन से मिट्टी लेने के लिए जमीन मालिक की अनुमति और भुगतान की जरूरत पड़ती है। सरकारी जमीन से मिट्टी लेने पर भी रोक-टोक का सामना करना पड़ता है। वे सरकार से बड़ी आर्थिक सहायता के बजाए सबसे पहले मिट्टी उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने की मांग करते हैं। अगर पर्याप्त और उपयुक्त मिट्टी मिल जाए तो कुम्हार अपने हुनर के दम पर आगे बढऩे की कोशिश कर सकते हैं। मिट्टी के बर्तनों का कारोबार अब केवल पारंपरिक मांग पर निर्भर नहीं है। बाजार में उत्पादों की विविधता, डिजाइन, एक जैसी गुणवत्ता, उत्पादन की मात्रा और कीमत भी मायने रखती है।
कुम्हारों के सामने गुजरात के प्रजापति समुदाय के कारीगरों और वहां से आने वाले मिट्टी के उत्पादों का उदाहरण भी चर्चा में आता है। गुजरात में प्रजापति समुदाय के अनेक परिवार पीढिय़ों से मिट्टी के बर्तन और दूसरे उत्पाद बनाने के काम से जुड़े हैं।
रवि ने अपने पिता से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम सीखा है। वे भी समय-समय पर इस काम को करते हैं लेकिन इसे बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। उनका मानना है कि जब नए प्रकार के बर्तन बनाने की कोशिश की जाती है तो मिट्टी की गुणवत्ता और पकाने की प्रक्रिया के कारण कई उत्पाद खराब हो जाते हैं। कुकर और बोतल जैसे उत्पाद तैयार करने के प्रयोग में कभी 100 बर्तन बनाने पर केवल करीब 20 ही सही निकल पाते हैं। बाकी बर्तन पकाने के दौरान टूट जाते हैं या उपयोग के लायक नहीं रहते। ऐसे में नए उत्पाद बनाने के लिए लगाई गई मेहनत और पैसा दोनों जोखिम में पड़ जाते हैं।
रवि का पारंपरिक काम मुख्य रूप से दीपावली जैसे अवसरों पर ज्यादा चलता है। करीब तीन महीने के काम में 14-15 हजार रुपए तक की कमाई हो पाती है। यह राशि परिवार की नियमित जरूरतों के मुकाबले बहुत कम है। इसके अलावा बारिश के तीन-चार महीने कामकाज प्रभावित रहता है। बर्तन बनाने, सुखाने और पकाने की प्रक्रिया मौसम पर भी निर्भर करती है. ऐसे में युवा त्योहारी सीजन में मिट्टी का काम कर लेते हैं बाकी दिनों में मजदूरी और अन्य काम करते हैं।
पहले मिट्टी के मटकों और दूसरे बर्तनों का इस्तेमाल अधिक होता था, लेकिन अब पानी रखने और दूसरे घरेलू कामों में विकल्प बढ़ गए हैं। इससे पारंपरिक उत्पादों की मांग प्रभावित हुई है। दीपावली पर दीये बनाने का अवसर जरूर मिलता है, लेकिन यह मांग पूरे साल का कारोबार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में कुम्हारों को केवल परंपरागत उत्पादों के सहारे रहने के बजाय बाजार की जरूरत के मुताबिक नए उत्पाद तैयार करने होंगे, लेकिन यह बदलाव तभी संभव है जब कारीगरों को कच्चा माल, तकनीक, डिजाइन, बिक्री के अवसर और जरूरी संसाधन उपलब्ध हों।
कुम्हारों का मानना है कि मेहनत करने के बावजूद अगर आमदनी नहीं बढ़ती और बनाए गए उत्पादों के टूटने का जोखिम बना रहता है, तो इस काम को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाना मुश्किल है। उनके लिए पारंपरिक हुनर से जुड़ाव अपनी जगह है, लेकिन परिवार चलाने की जरूरत उससे भी बड़ी है। चाक, हुनर और अनुभव को उपयोगी बनाने के लिए प्रदेश सरकार कुम्हारों को मिट्टी उपलब्ध कराने का रास्ता बनाए।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
