शोध में खुलासा : स्वच्छ व किफायती पानी उपलब्ध कराने में विफल रही ब्रितानी कंपनियां

शोध में खुलासा : स्वच्छ व किफायती पानी उपलब्ध कराने में विफल रही ब्रितानी कंपनियां

नयी दिल्ली/ इंग्लैंड की जल कंपनियां इस गर्मी में भारी आलोचना का शिकार हुई हैं। सुखे की मार झेल रहे यूके में पेना का पानी उपलब्ध कराने वाली निजी कंपनियां लगातार आलोचनाओं का शिकार हो रही है। एक शोध में बताया गया है कि पानी पर स्वामित्व वाली कंपनियों ने इस वर्ष जबर्दस्त मुनाफा कमाया है, जबकि आम उपभोक्ताओं को पीने के पानी की किल्लत झेलनी पड़ रही है। अध्ययन में बताया गया है कि जुलाई में पड़ी भारी गर्मी के कारण कई क्षेत्रों में सूखे की स्थिति घोषित कर दी है, जबकि रिसाव के कारण हर दिन 3 अरब लीटर पानी बर्बाद हो जाता है।

यह कंपनियां उनके द्वारा किए जाने वाले प्रदूषण के कारण आलोचना के घेरे में आ गई हैं। इंग्लैंड की केवल 14 प्रतिशत नदियाँ पारिस्थितिक स्थिति के लिहाज से‘‘अच्छी’’ होने के मानदंड को पूरा करती हैं। नदियों और समुद्रों में सीवेज का बढ़ना एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा है, पर्यावरण एजेंसी ने सबसे गंभीर घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों के लिए जेल की सजा का आह्वान किया है।

इस बीच इन कंपनियों के शेयरधारकों और निवेशकों को भरपूर लाभ हुआ है। 2021 से पहले के 12 वर्षों में, इंग्लैंड की नौ जल और सीवरेज कंपनियों ने लाभांश के रूप में प्रति वर्ष औसतन 1.6 अरब पाउंड का भुगतान किया। निदेशकों का वेतन भी बढ़ गया है। टेम्स वाटर की नयी सीईओ को 2020 में कंपनी में शामिल होने पर 31 लाख पाउंड का ‘‘गोल्डन हैलो’’ मिला।

हमारा नवीनतम शोध इस बात की जांच करता है कि निजी इक्विटी निवेशक इंग्लैंड की जल कंपनियों के स्वामित्व पर हावी हो गए हैं – और वे सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों की तुलना में काफी कम पारदर्शिता के साथ कैसे काम करते हैं और लाभ निकालने के लिए अधिक आक्रामक दृष्टिकोण रखते हैं।

लाभांश के ये उच्च स्तर, निदेशकों को वेतन (और ऋण वित्त, जो कुछ कंपनियों को ब्याज दरों में वृद्धि के रूप में तेजी से डांवाडोल कर सकता है) का भुगतान जल उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है। इनमें से कई ग्राहकों को भुगतान करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है और यह रकम उनके संकटपूर्ण जीवन यापन को और भी अधिक तनाव में डाल देती है।

कुल मिलाकर, इंग्लैंड की जल प्रणाली सामान्य घरों के माध्यम से काम करती है, जो उनके द्वारा की जाने वाली पानी की खपत के बदले में मिलने वाली राशि को बड़े पैमाने पर अज्ञात शेयरधारकों को जटिल कॉर्पोरेट संरचनाओं के माध्यम से उदार रिटर्न का वित्तपोषण करते हैं।

तो इस सब में विनियमन को क्या हो गया है? हमारे पेपर में, हम तर्क देते हैं कि नियामक प्रक्रिया – जिसमें इंग्लैंड में गुणवत्ता, पर्यावरणीय प्रभाव और कीमतों के लिए जिम्मेदार तीन अलग-अलग एजेंसियां – निवेशकों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण के हितों के बीच उचित संतुलन कायम करने में महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करती हैं।

लाभ से प्रेरित जल कंपनियों को व्यापक सामाजिक हित में काम करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। उन्हें ग्राहकों से जो राशि वसूल करने की इजाजत दी गई है वह भविष्य की लागतों के अनुमानों और पानी की गुणवत्ता, प्रदूषण की घटनाओं, रिसाव और खपत से संबंधित कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने पर आधारित हैं।

इसके परिणाम कुछ अजीब हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सरकार चाहती है कि 2050 तक पानी की खपत लगभग 140 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन से गिरकर 110 लीटर हो जाए। अगर ऐसा होता है, तो पानी कंपनियां कीमतों में वृद्धि करने में सक्षम होंगी। मतलब यह कि हम अपने उपभोग में कमी करके उन्हें अधिक भुगतान भी करेंगे।

किसी अन्य देश ने इंग्लैंड के उदाहरण का अनुसरण नहीं किया है, और अन्य देशों में पानी बड़े पैमाने पर सार्वजनिक क्षेत्र में है। 25 साल के निजी नियंत्रण के बाद पेरिस ने 2010 में अपना पानी वापस सार्वजनिक स्वामित्व में ले लिया। एक साल बाद, सार्वजनिक प्रबंधन के कारण बचत के परिणामस्वरूप पानी की कीमत में 8ः की कटौती की गई।

सार्वजनिक स्वामित्व पर स्विच करना आसान नहीं है, लेकिन एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि यह यूरोप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इससे न केवल पानी सस्ता होगा, बल्कि लंबे समय में, मुनाफे के पुनर्निवेश के साथ लागत में कमी की संभावना है, और सार्वजनिक स्वामित्व से अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए।

मौजूदा व्यवस्था काम नहीं कर रही है। सीधे शब्दों में कहें, तो पानी से जुड़े सार्वजनिक हित को पूरा करने के दौरान निजी कंपनियों को लाभ प्रोत्साहन देना असंभव है। चरम मौसम की घटनाओं का बढ़ना तय लग रहा है और ऐसे में पानी को सार्वजनिक स्वामित्व में होना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निजी मुनाफे पर सामाजिक और पर्यावरणीय परिणामों को प्राथमिकता दी जा सकती है।

निजी क्षेत्र की दक्षता में एक वैचारिक विश्वास के साथ इंग्लैंड के पानी का निजीकरण किया गया था। लेकिन 33 वर्षों के बाद, निजी स्वामित्व प्रयोग विफल हो गया है।

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