भृंगी ऋषि की मिथकीय कथा से माइटोकॉन्ड्रिया तक : क्या एक मिथक में छिपा है शक्ति का विज्ञान?

भृंगी ऋषि की मिथकीय कथा से माइटोकॉन्ड्रिया तक : क्या एक मिथक में छिपा है शक्ति का विज्ञान?

हिन्दू धार्मिक परंपरा की अनेक कथाएँ ऐसी हैं, जिन्हें केवल मिथकीय आख्यान मानकर छोड़ देना उनके अर्थ को सीमित कर देना होगा। इन कथाओं में प्रतीक हैं, दर्शन है, सामाजिक संदेश हैं, मनुष्य तथा अस्तित्व को समझने की कोशिश है और कुछ हद तक विज्ञान भी छुपा है। भृंगी ऋषि और भगवान शिव-पार्वती की कथा इसी श्रेणी में आती है।

आज इस कथा की एक आधुनिक व्याख्या जरूरी है। हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि भृगु की कथा में माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के मातृवंशीय उत्तराधिकार कैसे जुड़ा हुआ है। हालांकि यह कोई वैज्ञानिक शोध नहीं है लेकिन बहुत हद तक मातृवंशीय उत्तराधिकार का उद्भेदन तो जरूर है। किसी पुराणकथा और आधुनिक वैज्ञानिक खोज के बीच समानता दिखाई देना इस बात का प्रमाण नहीं है कि प्राचीन ऋषियों को आधुनिक आनुवंशिकी का ज्ञान था। फिर भी सवाल महत्वपूर्ण है कि आखिर इस कथा में ऐसा क्या है, जो आज के जीवविज्ञान के संदर्भ में भी हमें सोचने के लिए मजबूर करता है?

भृंगी ऋषि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उनकी भक्ति इतनी एकांगी थी कि वे केवल शिव की परिक्रमा करना चाहते थे। भगवती पार्वती को वे उसी रूप में पूजने के पक्ष में नहीं थे। कथा के अलग-अलग रूपों में घटनाओं का विवरण अलग मिलता है। एक प्रसिद्ध परंपरा में शिव और पार्वती अर्धनारीश्वर का रूप धारण करते हैं। शिव और शक्ति एक ही देह में दिखाई देते हैं। भृंगी तब भी केवल शिव की परिक्रमा करना चाहते हैं।

कथा के एक रूप में वे भृंग यानी भौंरे का रूप धारण करते हैं और शिव तथा पार्वती के संयुक्त शरीर के बीच से निकलकर केवल शिव की परिक्रमा करने का प्रयास करते हैं। यहीं कथा एक गहरे दार्शनिक प्रश्न में बदल जाती है। ’’क्या शिव को शक्ति से अलग करके समझा जा सकता है?’’ शिव और शक्ति, चेतना और ऊर्जा, पुरुष और स्त्री को पूर्णतः अलग करके अस्तित्व को समझना संभव नहीं है। अर्धनारीश्वर इसी एकता का प्रतीक है और भृगु इस दर्शन को समझने में भूल कर दी।

भृंगी कथा का एक दूसरा रूप इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। स्कंद पुराण से जुड़े एक प्रसंग में पार्वती भृंगी से शरीर की उत्पत्ति और संरचना के संबंध में कहती हैं कि शरीर के कुछ अंग मातृपक्ष से और कुछ पितृपक्ष से प्राप्त होते हैं। भृंगी अपनी योगशक्ति से मातृपक्ष से प्राप्त मांस आदि का त्याग कर देते हैं। परिणामस्वरूप उनका शरीर अत्यंत दुर्बल होकर अस्थिपंजर जैसा रह जाता है। बाद में उन्हें तीसरे पैर का वरदान मिलता है। यहाँ कथा का केंद्र केवल चमत्कार नहीं है। इसमें शरीर के निर्माण को माता और पिता दोनों से जोड़ने की एक प्राचीन अवधारणा दिखाई देती है। यही वह बिंदु है जहाँ आधुनिक आनुवंशिकी के साथ इस कथा का संवाद शुरू होता है।

आधुनिक आनुवंशिकी के अनुसार मनुष्य के अधिकांश नाभिकीय डीएनए में माता और पिता दोनों का योगदान होता है। सामान्यतः आधा आनुवंशिक पदार्थ माता से और आधा पिता से आता है। मगर हमारी कोशिकाओं के भीतर एक विशेष अंग है ’’माइटोकॉन्ड्रिया’’। उसके पास अपना अलग डीएनए होता है।

माइटोकॉन्ड्रिया को सामान्यतः कोशिका का ‘‘पावरहाउस’’ कहा जाता है, क्योंकि वे कोशिका की ऊर्जा-व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और एटीपी के निर्माण में योगदान देते हैं। यहाँ एक उल्लेखनीय आनुवंशिक तथ्य सामने आता है। मनुष्य का माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए सामान्यतः माता से प्राप्त होता है। निषेचन के बाद पितृ माइटोकॉन्ड्रिया सामान्यतः संतान के माइटोकॉन्ड्रियल वंश में योगदान नहीं करते। उन्हें हटाने या निष्क्रिय करने वाली जैविक प्रक्रियाएँ काम करती हैं। इसी कारण माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए को सामान्य मानव आनुवंशिकी में ’’मातृवंशीय उत्तराधिकार’’ का उदाहरण माना जाता है। यहीं से भृंगी कथा की आधुनिक व्याख्या शुरू होती है।

भृंगी कथा में मातृपक्ष से शरीर के निर्माण की बात आती है। आधुनिक विज्ञान बताता है कि माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए सामान्यतः मातृवंश से चलता है। दोनों के बीच एक प्रतीकात्मक समानता जरूर दिखाई देती है। मगर इससे यह निष्कर्ष निकालना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा कि प्राचीन ऋषियों को माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए की आधुनिक संरचना या उसके आनुवंशिक व्यवहार का ज्ञान था।

माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए, कोशिका विज्ञान, डीएनए की संरचना और आनुवंशिकता के आधुनिक सिद्धांत लंबे वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रयोगों के परिणाम हैं। मातृवंशीय माइटोकॉन्ड्रियल आनुवंशिकता के स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण भी आधुनिक काल के शोध से स्थापित हुए। इसलिए यह कहना कि प्राचीन भारत में माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए की खोज हो चुकी थी, इतिहास और विज्ञान दोनों के साथ न्याय नहीं होगा।

यदि इसे आधुनिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक की तरह पढ़ने के बजाय प्रतीकात्मक ज्ञान-परंपरा के रूप में पढ़ा जाए तो इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक दिखाई देता है। शिव को चेतना और पार्वती को शक्ति का प्रतीक मानें तो अर्धनारीश्वर कहता है कि चेतना और शक्ति अलग-अलग होकर पूर्ण अस्तित्व नहीं बनाते। शिव स्थिरता हैं। शक्ति गति है। शिव आधार हैं। शक्ति अभिव्यक्ति है। शिव संभावना हैं। शक्ति उस संभावना को क्रिया में बदलने वाली सामर्थ्य है। हालाँकि धार्मिक दर्शन की शक्ति को सीधे आधुनिक विज्ञान की ऊर्जा के बराबर रख देना भी उचित नहीं होगा। दोनों अलग संदर्भों की अवधारणाएँ हैं। फिर भी जीवविज्ञान के स्तर पर यह तथ्य निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण है कि माइटोकॉन्ड्रियल का कोशिका के जीवन में ऊर्जा उत्पादन की केंद्रीय भूमिका है।

भृंगी कथा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए से भी आगे जाता है। भृंगी केवल शिव को देख रहे थे। देवी पार्वती उन्हें शरीर का वह पक्ष दिखाती हैं, जिसे वे स्वीकार नहीं करना चाहते थे। यानी समस्या केवल भक्ति की नहीं थी। समस्या ’’एकांगी दृष्टि’’ की थी।

मनुष्य जब किसी सत्य के एक पक्ष को ही संपूर्ण सत्य मान लेता है तो उसकी दृष्टि अधूरी हो जाती है। इसी संदर्भ की व्यापक व्याख्या जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अपने आख्यानों में किया है। उन्होंने श्यादवाद और अनेकांतवाद का प्रतिपादन करते हुए कहा कि इस पूरे जगत में कुछ भी इस्थिर नहीं है। इसलिए विचार और चिंतन में भी परिवर्तन होता रहता है। एक ही तथ्य को सत्य नहीं माना जा सकता है। संदर्भों के साथ सत्य का भी स्वरूप बदल जाता है। अर्धनारीश्वर का दर्शन अधूरेपन को चुनौती देता है। शिव और शक्ति का संबंध केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है। वह अस्तित्व को समझने की एक दार्शनिक पद्धति है-’’पूर्णता विरोधी पक्षों को मिटाने में नहीं, उनके संबंध को समझने में है।’’

आधुनिक आनुवंशिकी भी एक अलग स्तर पर हमें यही बताती है कि जीवन की विरासत को समझना सरल द्वैत से संभव नहीं है। नाभिकीय डीएनए में माता और पिता दोनों का योगदान है, जबकि माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए सामान्यतः मातृवंश से चलता है। जीवन की जैविक कहानी कई स्तरों पर लिखी जाती है।

वैसे हर पुराणकथा को आधुनिक विज्ञान की छिपी हुई खोज बताना उचित नहीं है। दूसरी ओर इन कथाओं को केवल काल्पनिक कहकर उनके दार्शनिक अर्थ को समाप्त कर देना भी उचित नहीं होगा।

भृंगी कथा इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि इसमें शरीर, माता-पिता, पुरुष-स्त्री, शक्ति और अस्तित्व के संबंधों पर गंभीर चिंतन दिखाई देता है। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए की आधुनिक खोज इस कथा का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। मगर आधुनिक विज्ञान की रोशनी में इस कथा को फिर से पढ़ने पर एक अलग दृष्टिकोण विकसित जरूर होता है।

पुराण पूछता है-’’क्या शिव को शक्ति से अलग किया जा सकता है?’’ जीवविज्ञान बताता है-’’कोशिका के जीवन में ऊर्जा-व्यवस्था के बिना जैविक गतिविधियाँ चलना संभव नहीं।’’ पुराण कहता है-’’माता को हटाकर शरीर की पूर्णता नहीं समझी जा सकती।’’ आनुवंशिकी बताती है-’’नाभिकीय आनुवंशिकता में माता और पिता दोनों की भूमिका है, जबकि माइटोकॉन्ड्रियल वंश सामान्यतः मातृवंश से चलता है।’’ इन दोनों को एक ही बात मान लेना गलत होगा। मगर इनके बीच संवाद की संभावना को नकारना भी नहीं जा सकता।

शायद इस कथा का सबसे बड़ा रहस्य यह नहीं है कि हजारों वर्ष पहले किसी ऋषि ने माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए खोज लिया था। उस दावे के लिए हमारे पास वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। कथा का बड़ा संदेश शायद इससे कहीं अधिक मानवीय है। मसलन, ’’जिस सत्य को हम केवल एक दृष्टि से देखते हैं, वह पूर्ण सत्य नहीं हो सकता।’’

भृंगी केवल शिव को देख रहे थे। भगवती पार्वती ने उन्हें वह पक्ष दिखाया जिसे वे देखना नहीं चाहते थे। अर्धनारीश्वर ने यह स्पष्ट कर दिया कि अस्तित्व को आधा करके देखने से उसकी पूर्णता नहीं समझी जा सकती। यही वह जगह है जहाँ भृंगी की पुराणकथा और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे से संवाद करते दिखाई देते हैं।

विज्ञान हमें जीवन की सूक्ष्म संरचनाओं को समझने का उपकरण देता है। पुराण हमें जीवन के अर्थ और संबंधों पर विचार करने के लिए प्रतीक देता है। दोनों को एक बना देना विज्ञान के साथ अन्याय होगा। दोनों के बीच संवाद की संभावना को समाप्त कर देना हमारी अपनी बौद्धिक परंपरा को सीमित करना होगा।

’’भृंगी से माइटोकॉन्ड्रिया तक की यात्रा शायद किसी प्राचीन वैज्ञानिक खोज का प्रमाण नहीं है। यह उससे अधिक सुंदर चीज की ओर संकेत करती है-एकांगी दृष्टि से पूर्ण दृष्टि की ओर जाने की मानवीय यात्रा।’’ और शायद अर्धनारीश्वर का सबसे आधुनिक अर्थ भी यही है।

’’अस्तित्व को आधा करके समझा नहीं जा सकता।’’

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