जनजातीय आदि चिंतन के पुरोधा से भगवान बिरसा मुंडा

जनजातीय आदि चिंतन के पुरोधा से भगवान बिरसा मुंडा

उत्पल परमार

हर वर्श बिरसा मुुुंडा की जयंती नवंबर 9 को मनायी जाती है। धरती आबा यानी बिरसा मुंडा को उनके अनुयायी भगवान कहकर संबोधित करते हैं और उन्हें भगवान बिरसा मुंडा कहा जाता है। कई वामपंथी और और चर्च समर्थक बुद्धजीवी उन्हें अपने पक्ष का बताते हैं और उनके चिंतन को हड़पने की कोशिश करते हैं लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा के असली उत्तराधिकारी वे हैं जो आज भी जनजातीय चिंतन में विश्वास करते हैं।

उनकी विरायत और आदिवासियों को गौर हिंदुऔं के रूप में प्रस्तुत करने वाले किसी कीमत पर उनके बौद्धिक उत्तराधिकारी नहीं हो सकते हैं। वे आसानी से इस तथ्य को छुपाते हैं कि भगवान बिरसा मुंडा जो शुरू में एक मिशनरी स्कूल में पढ़ाई की उनका चर्च और ईसाई धर्म से मोह भंग हो गया था। भगवान बिरसा मंुडा वास्तव में अंग्रेजों द्वारा मारे गए थे क्यों कि वह आदिवासियों के बीच ईसाई धर्म के प्रसार को रोक रहे थे और गुलामी का सबसे बड़ा कारण चर्च को बताते थे। उन्होंने अपने समाज को यह बताने की कोशिश की यदि चर्च और ईसाई इसी तरह हमारे बीच काम करते रहे तो हम कभी दासता से मुक्त हो ही नहीं सकते हैं। ईसाई चर्च ही दासता का प्रतीक है। हमारी आस्था प्रकृति की पूजा में है। पहाड़ और विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं की पूजा में है और ये तमाम आस्थाएं, आदिवासियों को हिन्दू चिंतन के बेहद करीब लाता है।

विडंबना यह है कि आज उनकी हत्या के लिए जिम्मेवार ताकतें भगवान बिरसा मुंडा की विरासत के ध्वजवाहक के रूप में खुद को पेश करके उनकी विरासत को हथियाने और आदिवासियों को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा करके वे वे आसानी से इस तथ्य को छिपाने की कोशिश करते हैं कि एक वैष्णव प्रचारक, आनंद पंत ने ईसाइ धर्म को त्यागने के बाद भगवान बिरसा को सलाह दी थी। भगवान बिरसा ने भगवान बिरसा ने भगवद गीता, रामायण और महाभारत भी पढ़ी थी, जिससे उनका आध्यात्मिक परिवर्तन हुआ। उनके अनुयायियों ने उन्हें भगवान के अवतार के रूप में देखा, जो सनातन र्धम की एक गहन विशेषता है। अवतार की परंपरा न तो ईसाई चिंतन में है और न ही इस्लाम में। इस प्रकार का चिंतन साम्यवादी विचारधारा में भी नहीं है।

बिरसा मंुडा पर एक किताब (गोपी कृष्ण कुंवर द्वारा ‘‘लाइफ एंड टाइम्स आॅफ बिरसा मुंडा’’) लिखी गयी है। उस किताब में बताया गया है कि उन्होंने 1899 के विद्रोह से पहले रांची के पास, जग़त्राथ मंदिर में प्रार्थना की शुरूआत की, जिसमें सनातन र्धम के साथ कई समानताएं थीं (इसे सनातन र्धम के कई संप्रदायों में से एक भी माना जा सकता है) और भगवान बिरसा अक्सर महाभारत और रामायण से अदाहरणों को उद्धृत करते थे। अपने सनातनी जनजातीय वंशजों को उन्होंने रूप से ईसाई र्धम छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, मांस, शराब, खैनी, बीड़ी आदि व्यसनों को छोड़ने के लिए बाध्य किया। गोहत्या पर प्रतिबंध की बात कही। मितव्ययी जीवन जीने की सलाह दी। जादू-टोना का विरोध किया और जनेऊ धारन करने का आह्वान किया।

इससे साबित होता है कि भगवान बिरसा मुंडा सानातनी चिंतनधारा के बेहद करीब थे। उन्होंने कभी भी हिन्दू चिंतन के खिलाफ कोई काम नहीं किया और न ही किसी प्रकार का कोई बयान दिया बावजूद इसके उन्हें ईसाई और साम्यवादी चिंतन गैर हिन्दू साबित करने पर लगे हुए हैं। उनकी उसी रणनीति के एक हिस्से के रूप में (भ्रमित मूल धार्मिक पहचान के बारे में, कन्ंिवस अपनी मूल धार्मिक पहचान को छोड़ने और गैर सनातनी र्धमों में कनवर्ट करने के बारे में) आदिवासी विरोधी ताकतों की रणनीति हमेशा आदिवासियों को अलग थलग करने की है, जिन्होंने सनातन की सबसे बड़ी ताकत सनातन से और इस तरह सांस्कृतिक /धार्मिक जड़ो को कमजोर कर देता है और उन्हें अन्य धर्मों में धर्मांतरण के लिए प्रेरित करता है। भारतीय आदिवासियों को इस साजिश को समझना और उस षड्यंत्र को नाकाम करने की कोशिश करनी चाहिए।


(लेखक के विचार निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई लेना देना नहीं है।)

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