झारखंड, बिहार सहित पूरे देश के मौसम की समीक्षा रिपोर्ट
नयी दिल्ली/पटना/रांची/
दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 की शुरुआत उम्मीद के अनुरूप नहीं रही। जून महीने में वर्षा सामान्य से काफी कम दर्ज की गई, जिससे किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ गई। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जून में देशभर में वर्षा में लगभग 40 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई, जिसका प्रमुख कारण प्रशांत महासागर में मजबूत होता अल नीनो, प्रतिकूल मैडन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) तथा बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में अपेक्षित निम्न दबाव प्रणालियों का पर्याप्त विकास नहीं होना रहा।
हालाँकि जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई के पहले सप्ताह में मानसून ने फिर से रफ्तार पकड़ी है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार देश के अधिकांश हिस्सों में वर्षा गतिविधियाँ तेज हुई हैं और उत्तर, मध्य, पूर्वी तथा पश्चिमी भारत के कई राज्यों में भारी से अत्यधिक भारी वर्षा की स्थिति बन रही है।
झारखंड में विगत दो-तीन दिनों से चिट-पुट राहत की बारिश हो रही है लेकिन सतर्कता भी जरूरी है। चालू वर्ष में झारखंड में मानसून की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रही। जून के अधिकांश दिनों में सामान्य से कम वर्षा हुई, जिससे धान की नर्सरी और खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हुई लेकिन जुलाई के प्रारंभ में वर्षा की गतिविधियाँ तेज हुई हैं। मौसम विभाग ने राज्य के अधिकांश जिलों में गरज, वज्रपात और भारी वर्षा की संभावना जताई है। किसानों के लिए यह राहत की खबर है, हालांकि निचले इलाकों में जलभराव तथा नदी-नालों के उफान की आशंका भी बढ़ गई है।
इस बार बिहार के हालात कुछ अच्छे नहीं दिख रहे हैं लेकिन विगत दो-तीन दिनों में कुछ अच्छे संकेत मिले हैं। बिहार में भी जून का अधिकांश समय अपेक्षाकृत शुष्क रहा। इससे धान की रोपाई प्रभावित हुई और सिंचाई पर निर्भरता बढ़ी। अब मानसून के सक्रिय होने से राज्य के अधिकांश हिस्सों में अच्छी वर्षा की संभावना बनी है। यदि अगले एक-दो सप्ताह तक वर्षा का यह क्रम बना रहता है, तो खरीफ कृषि को बड़ा संबल मिल सकता है।
देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून का स्वरूप अलग-अलग दिखाई दे रहा है। पश्चिमी तट (कोंकण, गोवा, गुजरात) तथा मध्य भारत के कई क्षेत्रों में भारी से अत्यधिक भारी वर्षा दर्ज की जा रही है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अन्य पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन तथा अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। पूर्वी भारत, विशेषकर ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में मानसून अब सक्रिय चरण में प्रवेश कर चुका है। पूर्वाेत्तर भारत में जून के दौरान सामान्य से काफी कम वर्षा हुई, जिससे जल संसाधनों और कृषि पर असर पड़ा।
मानसून के जो प्रारंभिक संकेत मिल रहे हैं उसके आधार पर कृषि क्षेत्र में इसके प्रभाव की समीक्षा जरूरी हो जाती है। जून की कमी ने खरीफ फसलों की बुआई को प्रभावित किया, विशेषकर धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों को। अब जुलाई की वर्षा इस कमी की आंशिक भरपाई कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई के पहले पखवाड़े में अच्छी बारिश जारी रहती है तो बुआई का रकबा सुधर सकता है, लेकिन यदि दूसरे पखवाड़े में मानसून कमजोर पड़ता है तो उत्पादन पर फिर दबाव बन सकता है।
मौसम विभाग का विस्तारित पूर्वानुमान बताता है कि जुलाई के पहले पखवाड़े में मानसून सक्रिय रहने की संभावना है लेकिन दूसरे पखवाड़े में इसकी तीव्रता कुछ कम हो सकती है। ऐसे में किसानों को वर्षा आधारित खेती के साथ-साथ जल संरक्षण और खेतों में जल निकासी, दोनों पर समान रूप से ध्यान देना होगा।
कुल मिलाकर मानसून 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में वर्षा का स्वरूप लगातार अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। कभी लंबा शुष्क दौर, तो कभी कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा-यही नई सामान्य स्थिति बनती दिखाई दे रही है। झारखंड और बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्यों के लिए यह केवल मौसम का नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल प्रबंधन का भी प्रश्न है।
फिलहाल जुलाई के शुरुआती दिनों की सक्रिय वर्षा ने राहत अवश्य दी है, लेकिन पूरे मानसून का आकलन अभी बाकी है। आने वाले सप्ताह तय करेंगे कि यह वर्ष किसानों के लिए समृद्धि लेकर आएगा या फिर मौसम की अनिश्चितता नई चुनौतियाँ खड़ी करेगी।
