प्रमोद दीक्षित मलय
पुणे में स्थित सैन्य लेखा विभाग के अधिकारी कक्ष में घुसते ही उस 25 वर्षीय युवक ने अधिकारी की मेज पर एक तार रख छुट्टी देने हेतु प्रार्थना की। युवक के चेहरे पर अधीरता, व्याकुलता एवं व्यग्रता के भाव पसरे हुए थे, सांसें गहरी और धीमी हो गई थीं। अधिकारी ने तार पढ़ना शुरू किया, प्रिय वासु, मां मृत्युशय्या पर है। अंतिम दर्शन करने हो तो तुरंत घर आ जाओ। अधिकारी ने युवक के चेहरे पर नजर गड़ाते हुए कहा कि काम की अधिकता है। छुट्टी नहीं मिलेगी। वह युवक मुड़ा और सीधे अपने गांव की ओर चल पड़ा। दुर्भाग्य! उसके पहुंचने से पूर्व ही मां स्वर्ग सिधार गयी थी। युवक का चेहरा तमतमा गया और अंग्रेज सरकार की नौकरी छोड़ उसे जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प ले सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में जुट गया और अंग्रेजी सत्ता की नींव हिला दी। उसके नाम से ही अंग्रेज भयाक्रांत हो जाते थे। इतिहास में उसे भारतीय उग्र राष्ट्रवाद का पितामह कहा गया तो सशस्त्र संघर्ष छेड़ने वाला प्रथम क्रांतिकारी भी। वह युवक है वासुदेव बलवंत फड़के, जिसे जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए अंग्रेजी सत्ता ने 50 हजार का इनाम घोषित किया था।
वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म बाम्बे प्रेसीडेंसी अंतर्गत थाणे के निकट शिरढोण गांव में चितपावन ब्राह्मण परिवार में पिता बलवंत फड़के एवं माता सरस्वती बाई के घर हुआ था, जो अब रायगढ़ जिला में आता है। परिवार में बालक को सभी प्यार से वासु कहते थे। वासुदेव की शुरुआती पढ़ाई गांव में ही हुई। मराठी के साथ ही आपने रुचि पूर्वक अंग्रेजी भाषा का भी अध्ययन किया और महारत हासिल की। पढ़ाई के साथ ही वासुदेव नियमित रूप से अखाड़े जाकर कुश्ती, तलवारबाजी और घुड़सवारी का अभ्यास करते थे। वह जब हाईस्कूल कर रहे थे, तब पिता ने पढ़ाई छोड़कर 10 रुपए मासिक पर एक व्यापारी के यहां नौकरी करने हेतु कहा किंतु वासुदेव आगे पढ़ना चाहते थे, इसीलिए घर से वह मुम्बई चले गये और जीआरपी में 20 रुपए मासिक वेतन पर सेवा करते हुए वर्ष 1862 में मुम्बई विद्यापीठ से स्नातक पूर्ण किया। उस समय स्नातक पूर्ण करने वाले वह कुछ गिने-चुने लोगों में से एक थे। मानव जीवन में शिक्षा के महत्व से वह सर्वथा परिचित थे। तभी तो 1860 में आपने दो-तीन साथियों के साथ मिलकर महाराष्ट्र एजुकेशन सोसायटी का गठन किया और पुणे में एक शिक्षा संस्थान खोला। आज इस सोसायटी द्वारा पूरे महाराष्ट्र में 75 से अधिक शिक्षण संस्थान संचालित किये जा रहे हैं।
वासुदेव बलवंत फड़के दो-तीन संस्थाओं में कार्य करते हुए अंततः 1865 में सैन्य लेखा विभाग में नौकरी पाकर पुणे आ गये। वह पुणे में भी कुश्ती के अभ्यास हेतु प्रसिद्ध पहलवान लाहुजी राघोजी साल्वे के अखाड़े में जाने लगे थे। लाहुजी पहलवानी के साथ ही युवाओं में राष्ट्रीयता का भाव भी भरते थे। अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े होने का आह्वान करते थे। वासुदेव लाहुजी साल्वे को अभिभावक एवं मार्गदर्शक के रूप में मानने लगे। इसी बीच महादेव गोविंद रानाडे का पुणे में भाषण हुआ जिसमें रानाडे ने अंग्रेजों द्वारा भारत की आर्थिक लूट एवं किसानों के शोषण सम्बंधित महत्त्वपूर्ण विचार जनता के समझ रखते हुए जन जागरण की अपील किया। उनके भाषण से वासुदेव बहुत प्रभावित हुए और उनको एक दिशा मिली। अब वासुदेव कार्यालय से बचे समय का सदुपयोग आसपास के गांवों में लोगों से बातचीत करते हुए लोक जागरण में करने लगे। गांव-गांव घूम-घूम कर किसानों, युवाओं, मजदूरों, विद्यार्थियों और महिलाओं से गम्भीरता पूर्वक संवाद करने और लोगों को जगाने वाले वह पहले व्यक्ति थे।
इसके पूर्व 1859 में उनका विवाह सईबाई से हो चुका था और संतान के रूप में एक पुत्री मथुताई प्राप्त हुई थी, किंतु किसी रोग से पत्नी की वर्ष 1872 में मृत्यु हो गई। वासुदेव का दूसरा विवाह गोपिका बाई से 1873 में सम्पन्न हुआ। तत्कालीन समाज की सोच के विरुद्ध आपने पत्नी को पढ़ना-लिखना के साथ घुड़सवारी और तलवारबाजी सिखाई। इसी बीच माता सरस्वती बाई का निधन हुआ, जिसका प्रसंग लेख के आरम्भ में दिया गया गया और वासुदेव नौकरी का त्याग कर अंग्रेजों के विरुद्ध समाज संगठन के काम में जुट गये। 1875-76 में महाराष्ट्र में भीषण अकाल पड़ा, चतुर्दिक त्राहि-त्राहि मच गई। जनता के लिए भोजन का प्रबंध करना मुश्किल हो गया, ऊपर से अंग्रेजों का जुल्म-अत्याचार चरम पर था। इससे क्षुब्ध वासुदेव ने भील, कोली और धांगर जाति समूहों के युवाओं का श्रामोशीश् नामक संगठन बना अंग्रेजी कोष लूटने हेतु पुणे निवासी अंग्रेजों के विश्वासपात्र व्यापारी के यहां रखे गये लगान और आयकर का रुपया छापा मार कर लूट लिया तथा भूखी जनता के भोजन का प्रबंध किया। अंग्रेजों की बड़ी किरकिरी हुई।
अब अंग्रेज अधिकारी और सिपाही वासुदेव के पीछे पड़ गये। अंग्रेजों का सामना करने के लिए फ़रवरी 1879 में वासुदेव ने 300 आदमियों की एक सशस्त्र फौज बनाई और 13 मई, 1879 की अर्धरात्रि को एक अंग्रेजों के प्रमुख भवन को आग लगा दी जिसमें अधिकारियों की महत्वपूर्ण बैठक कार्यवाही चल रही थी। कुपित अंग्रेज अधिकारी ने वासुदेव को पकड़ने हेतु 50 हजार का इनाम घोषित किया। अगले ही दिन वासुदेव फड़के ने पलटवार करते हुए अपने हस्ताक्षर से मुम्बई में इश्तहार लगवा दिये जिसमें गवर्नर रिचर्ड का सिर काटने वाले को 75 हजार रुपए का इनाम घोषित था। इससे अंग्रेज बौखला गये। वासुदेव को पकड़ने हेतु पूरी ताकत झोंक दी और वासुदेव के बहुत साथियों को पकड़ लिया या मार दिया। अपनी ताकत कम देख संयम से काम लेते हुए वासुदेव हैदराबाद निकल गये किंतु अंग्रेजों और निजाम हैदराबाद की सेना संयुक्त रूप से वासुदेव को घेरने लगी। एक स्थानीय निवासी ने इनाम के प्रलोभन में एक मंदिर में शरण लिए वासुदेव बलवंत फड़के का पता अंग्रेजों को दे दिया।
20 जुलाई, 1879 को बीजापुर के देवर नवादगी ग्राम के मंदिर में सोते समय वासुदेव को गिरफ्तार कर पुणे की यरवदा जेल में बंद कर दिया गया। तत्पश्चात राजद्रोह का मुकदमा चला, आजन्म कारावास की सजा हुई और भारत की मुख्य भूमि से दूर मध्य-पूर्व देश यमन की अदन जेल में कैद कर अमानवीय यातनाएं दीं। उनको तपेदिक रोग हो गया और 17 फरवरी, 1883 को भारत माता के इस महान सपूत ने स्वतंत्रता के महायज्ञ में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनके बलिदान को नमन कर भारत सरकार ने वर्ष 1984 में 50 पैसे का डाक टिकट जारी किया। मुम्बई के चौक का नामकरण उनके नाम पर हुआ और गिरफ्तारी स्थल को एक स्मारक के रूप में सुसज्जित किया ताकि आने वाली पीढ़ी भारत के उस महान क्रांतिकारी के योगदान से परिचित हो सके जिसके नामोल्लेख मात्र से आजादी के आंदोलन में युवाओं में त्याग एवं बलिदान की भावना बलवती होती रही। वासुदेव बलवंत फड़के की पुण्यतिथि पर देश श्रद्धा सुमन समर्पित कर रहा है।
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