शर्मनाक और चिंताजनक रहा उत्तराखंड के लिए साल का अंत

शर्मनाक और चिंताजनक रहा उत्तराखंड के लिए साल का अंत

विदाई की बेला में यह साल 2025 उत्तराखंड के माथे पर दो ऐसे गहरे और रिसते हुए जख्म छोड़ गया है जिनकी टीस आने वाले लंबे समय तक देवभूमि की फिजाओं में महसूस की जाएगी। शांत उत्तराखंड के लिए इस साल का अंत बेहद शर्मनाक और चिंताजनक रहा है। एक तरफ देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की नृशंस हत्या ने राज्य में पनप रही हिंसक मानसिकता और असुरक्षा को उजागर किया है तो दूसरी तरफ शांत पड़ चुके अंकिता भंडारी हत्याकांड में एक कथित वायरल ऑडियो ने उस श्वीआईपीश् के सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है जिसे व्यवस्था ने लगभग दफन कर दिया था। ये दोनों घटनाएं महज अपराध नहीं हैं बल्कि ये उस सामाजिक और प्रशासनिक क्षरण का प्रमाण हैं जो धीरे-धीरे इस पहाड़ी राज्य की जड़ों को खोखला कर रहा है।

उत्तराखंड में मजहबी वैमनस्य तो एक सुनियोजित एजेंडे के तहत काफी पहले से फैलाया जा रहा था लेकिन साल के अंत में हुई इस नृशंस हत्या ने उसे श्नस्ली हिंसाश् का एक भयावह रूप दे दिया है जिसने न केवल राज्य की कानून-व्यवस्था बल्कि इसकी श्अतिथि देवो भवरूश् वाली सांस्कृतिक पहचान को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

देहरादून जिसे देश भर में शिक्षा के हब के रूप में जाना जाता है और जहाँ पूर्वाेत्तर भारत से लेकर देश के हर कोने से छात्र अपना भविष्य संवारने आते हैं, वहां त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की हत्या ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया है। यह घटना इसलिए और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि इसके तार उस नफरती माहौल से जुड़ते दिख रहे हैं जो बीते कुछ समय से राज्य में बनाया जा रहा था हालांकि उत्तराखंड पुलिस और प्रशासन ने त्रिपुरा के छात्र की हत्या को श्नस्ली हत्याश् मानने से साफ इनकार कर दिया है। पुलिस का आधिकारिक बयान इसे दो पक्षों के बीच का तात्कालिक विवाद और सामान्य अपराध बता रहा है। सरकार भी अपनी पूरी मशीनरी के साथ देवभूमि के दामन पर लगे इस बदनुमा दाग को धोने के प्रयास में जुटी है ताकि राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की छवि धूमिल न हो लेकिन धरातल की सच्चाई और विपक्षी दलों के आरोप एक अलग ही कहानी बयां करते हैं।

सामाजिक विश्लेषकों और विपक्ष का स्पष्ट मानना है कि यह हत्या अचानक नहीं हुई, बल्कि यह उस ‘इम्युनिटी’ यानी दंड के भय से मुक्ति का परिणाम है जो पिछले कुछ वर्षों में उपद्रवियों को मिली है। पुरोला से लेकर कोटद्वार, सतपुली, गौचर और अगस्तमुनि तककृबीते समय में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जिस तरह सुनियोजित रूप से एक खास वर्ग की दुकानों को निशाना बनाया गया, तोड़फोड़ की गई और खुलेआम धमकियां दी गईं, उसने अराजक तत्वों के हौसले बुलंद किए हैं। चिंताजनक बात यह रही कि इन स्थानों पर बलवा करने वालों, नफरत फैलाने वालों और कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ कोई ऐसी सख्त और नजीर बनने वाली कार्यवाही नहीं हुई, जो भविष्य के लिए सबक बन सकती। जब भीड़तंत्र को यह संदेश चला जाता है कि हिंसा करने पर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा तो परिणाम देहरादून जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है। विपक्ष का तर्क है कि त्रिपुरा के छात्र की हत्या समाज में बोये गए उन्हीं नफरती बीजों की अगली और खूनी कड़ी है। जब आप समाज में श्अन्यश् के प्रति घृणा भरते हैं तो वह आग किसी न किसी रूप में बाहर आती है, चाहे वह सांप्रदायिक हो या नस्लीय।

अभी राज्य एंजेल चकमा की हत्या से उपजे अविश्वास, भय और आक्रोश के माहौल से उबरने की कोशिश ही कर रहा था कि साल के आखिरी दिनों में एक और पुराने नासूर ने दर्द देना शुरू कर दिया। अंकिता भंडारी हत्याकांड जिसने पूरे उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया था और जिसे मई 2025 में मुख्य आरोपियों को सजा होने के बाद बंद मान लिया गया था, वह एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार कारण बना है भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर और उनकी कथित पूर्व पत्नी उर्मिला सनावर के बीच का एक वायरल वार्तालाप। इस कथित ऑडियो क्लिप ने सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है और उस श्वीआईपीश् के रहस्य को फिर से गहरा दिया है जिसे बचाने के आरोप शुरू से ही सरकार और जांच एजेंसियों पर लगते रहे हैं। इस बातचीत में जिस तरह से रसूखदारों के शामिल होने, लेनदेन और वीआईपी के नाम पर चर्चा के संकेत मिले हैं, उसने आम जनता के मन में न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।

अंकिता भंडारी केस महज एक हत्या का मामला नहीं था, वह पहाड़ की बेटियों के स्वाभिमान और रसूखदारों द्वारा उनके शोषण के विरुद्ध एक प्रतीक बन गया था। जनता को उम्मीद थी कि देर से ही सही, पूरा सच सामने आएगा और वह श्वीआईपीश् बेनकाब होगा जिसके लिए वनंत्रा रिज़ॉर्ट में अनैतिक कार्य करने का दबाव अंकिता पर डाला गया था लेकिन चार्जशीट से वीआईपी का नाम गायब रहना और अब इस वायरल ऑडियो का सामने आना यह दर्शाता है कि ताकतवर लोग कानून की जद से बाहर रहने के लिए किस हद तक जा सकते हैं। हालांकि संबंधित नेताओं ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है लेकिन जनमानस में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि सिस्टम रसूखदारों को बचाने के लिए काम कर रहा है।

इन दोनों घटनाओं का एक साथ साल के अंत में उभरना सरकार के लिए दोहरी और विकट चुनौती है। एक ओर उसे पूर्वाेत्तर और देश के अन्य राज्यों के छात्रों और उनके अभिभावकों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उत्तराखंड में श्नस्लीय भेदभावश् या हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है ताकि यहाँ के शिक्षण संस्थानों और पर्यटन की साख बची रहे। वहीं दूसरी ओर, अंकिता मामले में उसे यह साबित करना होगा कि कानून की नजर में कोई भी श्वीआईपीश् नहीं है और न्याय केवल कागजों तक सीमित नहीं है। दुर्भाग्यवश, वर्तमान परिदृश्य में सरकार की भूमिका डैमेज कंट्रोल तक सीमित नजर आ रही है। एंजेल चकमा मामले में पुलिसिया कार्रवाई में देरी और लीपापोती के आरोप, और अंकिता मामले में नए सबूतों की अनदेखी या उन्हें साजिश बताना, जनता के विश्वास को बहाल करने में नाकाफी साबित हो रहा है। उत्तराखंड की पहचान हमेशा से एक शांत, सुरक्षित और न्यायप्रिय समाज की रही है, जहाँ महिलाएं रात में भी बेखौफ निकल सकती थीं और अतिथि को भगवान माना जाता था। लेकिन 2025 के ये दो जख्म बताते हैं कि वह पहचान अब खतरे में है। पुरोला और सतपुली जैसी घटनाओं ने जहाँ सामाजिक ताने-बाने को तोड़ा, वहीं देहरादून की घटना ने यह बताया कि नफरत की आग अब किसी को भी जला सकती है। यह अब केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड की श्आत्माश् और श्अस्मिताश् को बचाने की लड़ाई बन गई है।

साल 2026 की दहलीज पर खड़ा उत्तराखंड आज अपनी सरकार और प्रशासन से जवाब मांग रहा है। वह पूछ रहा है कि क्या नफरत फैलाने वालों को इसी तरह अभयदान मिलता रहेगा? क्या रसूखदार श्वीआईपीश् हमेशा पर्दे के पीछे छिपे रहेंगे? एंजेल चकमा का परिवार हो या अंकिता भंडारी के माता-पिता, दोनों ही इंसाफ की आस में हैं। यदि सरकार ने इन दोनों मामलों में कठोर, निष्पक्ष और पारदर्शी कदम नहीं उठाए तो यह केवल एक साल का अंत नहीं होगा, बल्कि यह उस भरोसे का अंत होगा जो जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों पर करती है। नफरत और वीआईपी कल्चर की यह जुगलबंदी देवभूमि के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। समय की मांग है कि लीपापोती छोड़कर सच का सामना किया जाए क्योंकि नासूर पर पट्टी बांधने से वह ठीक नहीं होता, उसका इलाज करना पड़ता है चाहे वह कितना भी कड़वा क्यों न हो। 2025 का साल जाते-जाते यही कड़वा सबक देकर जा रहा है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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