मुस्लिम ब्रदरहुड का ही भारतीय वर्जन है जमात-ए-इस्लाम, लोकतंत्र व बहू पांथिक संस्कृति के लिए है घातक

मुस्लिम ब्रदरहुड का ही भारतीय वर्जन है जमात-ए-इस्लाम, लोकतंत्र व बहू पांथिक संस्कृति के लिए है घातक

गौतम चौधरी

पश्चिमी ईसाई दुनिया का प्रभुत्व विस्तार ही आधुनिक दुनिया का उदय माना जाता है। इससे पहले ओटोमन साम्राज्य की तूति बोलती थी। क्रूसेड के आह्वान के बाद भी ओटोमन पराजित नहीं हुए और उनका इकबाल बुलंदियों पर था। दो भागों में बंट चुके क्रर ईसाइत के झंडावदारों ने मध्य-पूर्व एशिया से लेकर पूरे यूरोप तक तबाही मचा रखी थी। धर्मांध ईसाई पदरियों ने महिलाओं, अल्पसंख्यकों और युद्धबंदियों पर अत्याचार की हदे पार कर रखी थी। ऐसे में तुर्क कबीलों के एक संगठन ने उन्हें चुनौती दी और वही तुर्क बाद में ऑटोमन  साम्राज्य के अधिपति होकर उभरे।

जबतक ओटोमन प्रगतिशील सोच के रहे तबतक दुनिया पर शासन करते रहे, ज्यों ही इस्लाम की धार्मिक जरता में उलझे उनका साम्राज्य बिखड़ गया और फिर से पश्चिमी ईसाई समूह जो कभी रोमन साम्राज्य का हिस्सा हुआ करते थे, ने उन्हें परास्त कर दिया। ओटोमन को पराभूत करने का सबसे पहला श्रेय फ्रांसीसी नेता नेपोलियन बोनापार्ट को जाता है। आधुनिक दुनिया में पहली बार नेपोलियन ने मुसलमानों को चुनौती दी और मिस्र पर आक्रमण कर दिया। इसके बाद जहां एक ओर ब्रिटेन व रूस ने मिलकर नेपोलियन को पराभूत किया वहीं दूसरी ओर एशिया में फिरंगियों ने अपनी ताकत बढ़ा ली। अंग्रेज धीरे-धीरे ओटोमन के साम्राज्य को सिकुरने के लिए मजबूर कर दिए।

आधुनिक दुनिया के आगमन के साथ, पश्चिमी शक्ति यानी पश्चिमी ब्लॉक की तुलना में इस्लाम की ताकत कमजोर होती गई। अंग्रेजों ने भारत में मुगलों को उखाड़ फेंक दिया तो ओटोमन तुर्की के छोटे से भाग में जाकर सिमट गए। वहां भी अंग्रेजों ने उन्हें स्थिर नहीं छोड़ा और अतातुर्क मुस्तफा कमाल पाशा ने आधुनिकता के नाम पर ओटोमन की सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंका। इसके के साथ इस्लामी साम्राज्य का अंत हो गया और दुनिया पर इंग्लैंड के नेतृत्व में ईसाई शक्ति का साम्राज्य स्थापित हो गया। अपने आप को इस्लाम का झंडाबरदार कहने वाले ओटोमन तुर्क तो गायब हो गए लेकिन इस्लाम के मानने वालों के बीच शरिया कानून यानी इस्लामिक कानून की चमक कायम रही।
 
बीसवीं शताब्दी की शुरुआत तक कुछ कट्टरपंथी मुसलमान जो इस्लामी दुनिया के घटते महत्व के बारे में चिंतित थे, ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया कि इस्लामी दुनिया का पतन पारंपरिक शरिया कानून के अपर्याप्त प्रयोग के लिए ईश्वर की सजा थी। समाधान के रूप में समाज, परिवार, शैक्षिक प्रणाली, कार्यस्थल, और अंततः, कानूनी प्रणाली और राजनीति जैसे प्रमुख संस्थानों का इस्लामीकरण करने की योजना बनाई जाने लगी। इसी सोच ने हसन अल-बन्ना को मुस्लिम ब्रदरहुड बनाने की प्रेरणा दी। वर्ष 1928 में हसन ने दुनिया भर में इस्लामिक मूल्यों की स्ािापना के नाम पर मुस्लिम ब्रदरहुड नामक संगठन की स्ािापना कर डाली लेकिन इसके पीछे इस्लामिक साम्राज्यवाद की परिकल्पना पल रही थी। यह संगठन दुनिया भर में शरिया कानून को लागू करने का अभियान छेड़ा। इस संगठन के साथ जुड़ने वालों ने प्रचार किया कि इस्लामिक साम्राज्य का पतन शरिया कानून से विगल होने के कारण ही हुआ है। इसलिए शरिया कानून को लागू कर हम फिर से इस्लामिक राज्य की स्थापना कर सकते हैं।

समय के साथ, मुस्लिम ब्रदरहुड वैचारिक लड़ाई से दूर होता गया और तेजी से उग्रवाद, हत्याओं और आतंकवादी हमलों में बदल गया। आज, मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा है, ‘‘अल्लाह हमारा उद्देश्य है, कुरान हमारा कानून है, पैगंबर हमारे नेता हैं, जिहाद हमारा रास्ता है और अल्लाह के लिए मौत हमारी सर्वोच्च आकांक्षा है।’’ यह नारा स्वयं लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष कानूनों की धारणा जो दुनिया भर के अधिकांश देशों में प्रचलित हैं, उसे खारिज करता है। ऐसी विचारधारा के साथ आधुनिक दुनिया कैसे चल सकती है। निःसंदेह एक धर्म विशेष के लिए पवित्र कुरान की मान्यता सर्वोच्च है लेकिन उसे कानून की मान्यता देना सर्वथा अनुचित होगा। यह मुस्लिम देशों के लिए बेहद खतरनाक है।

अबू अला मौदुदी ने हसन अल-बन्ना के विचारों से प्रेरित होकर वर्ष 1941 में लाहौर में जमात-ए-इस्लामी की स्थापना की, जिसमें मुस्लिम ब्रदरहुड के समान उद्देश्य और आदर्शों को शामिल किया गया। मोहम्मद मुर्सी सरकार को हटाने के मुद्दे पर अपना रुख व्यक्त करते हुए, जलालुद्दीन उमरी (तत्कालीन राष्ट्रपति, जेएलएच) और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं ने आरोप लगाया कि मिस्र में उथल-पुथल संयुक्त राज्य अमेरिका और साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा समर्थित अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा था, ताकि इस्लामवादियों को सत्ता में आने से रोका जा सके।

जमात-ए-इस्लामी के मजलिस-ए-शूरा ने यहां तक दावा किया कि मिस्र का मुस्लिम ब्रदरहुड शांतिपूर्ण संघर्ष में लगा हुआ है। ब्रदरहुड के शांतिपूर्ण संघर्ष का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1948 में मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंधित 23 वर्षीय पशु चिकित्सा छात्र ने मिस्र के तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या कर दी थी। दो हफ्ते बाद, संगठन के एक अन्य सदस्य को एक कोर्ट हाउस पर बमबारी करने के प्रयास के लिए गिरफ्तार किया गया था। 1960 के दशक में, मिस्र में एक सशस्त्र विंग को फिर से स्थापित करने की साजिश रचने के आरोप में मुस्लिम ब्रदरहुड के एक छोटे समूह को गिरफ्तार किया गया था। राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सीसी की सरकार ने ब्रदरहुड को एक आतंकवादी संगठन के रूप में स्वीकार किया है और नियमित रूप से उस पर आतंकवादी हमलों के पीछे होने का आरोप लगाता आया है। हस्म और लीवा अल-थवरा, मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखाओं को संयुक्त राज्य सरकार द्वारा आतंकवादी संगठनों के रूप में मान्यता दी गयी है। संयुक्त राष्ट्र यह मानता है कि फिलिस्तीन में मुस्लिम ब्रदरहुड की ही शाखा हमास है जो नागरिक ठिकानों पर बम बसाने, अपहरण, आत्मघाती हमले, रॉकेट हमले के लिए उत्तरदायी है। हालांकि इजरायल में सरकार का भी रूख कोई अच्छा नहीं है लेकिन इसके लिए आतंक का सहारा लेना उचित नहीं है।

अमेरिका ने हमास को आतंकवादी संगठन घोषित किया है। मिस्र का अयमान अल-जवाहिरी, जिसने ओसामा-बिन-लादेन के साथ मिल कर अलकायदा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह भी पहले मुस्लिम ब्रदरहुड का ही सदस्य था। ब्रदरहुड की इस्लामी विचारधारा, राष्ट्र-राज्य की विचारधारा के लिए खतरा है और इस प्रकार विश्व व्यवस्था की स्थिरता के लिए भी खतरा है। ब्रदरहुड और अल कायदा अनिवार्य रूप से एक ही आंदोलन का हिस्सा हैं क्योंकि दोनों ही इस्लामिक साम्राज्यवाद के चिंतन पर आधारित हैं। जमात-ए-इस्लामी अपने वैचारिक गुरु ब्रदरहुड की तरह एक खतरनाक संगठन के सभी गुण समेटे हुए हैं। अगर हमास, अल-कायदा आदि जैसे संगठन बनाने और चलाने में ब्रदरहुड के कारनामों से सबक सीखना है, तो जमात-ए-इस्लामी को तुरंत प्रतिबंधित करने की आवश्यकता है। भारत जैसा बहुपंथिक और बहुसांस्कृतिक देश के लिए तो यह बेहद खतरनाक है। यदि इसकी गतिविधियों पर अविलंब रोक नहीं लगायी गयी तो जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के संरक्षण में कट्टरपंथी इस्लाम के विकास की पूरी संभावना है।

हमारे पड़ोस में पाकिस्तान जैसा खतरनाक देश, इस्लाम के नाम पर दुनिया भर में आतंकवाद का व्यापार कर रहा है। अभी हाल ही में अफोनिस्तान की धरती पर मध्ययुगीन असभ्यत और बरबर समूहों ने सभ्यता को सर्शसार करते हुए काबुल की धरती को रक्तरंजित कर दिया। जैसे ही तालिबानियों ने काबुल को अपने कब्जे में लिया वहां की महिलाओं पर अत्याचार प्रारंभ हो गए। हजारे शिआओं पर आफत आन पड़ी है। अल्पसंख्यक दहशत में हैं और जो मुसलमान तालिबानी फरमान मानने से इन्कार कर रहे हैं उन्हें चैक-चैराहों पर गोलियों से भून दिया जा रहा है। ऐसे में भारत जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध देशों को एक मंच पर आकर सभी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ जंग का ऐलान करना चाहिए और जमात-ए-इस्लामी पर सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए।  

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