ऑस्ट्रेलिया की हालिया घटना को पवित्र कुरान की नजरों से सही नहीं ठहराया जा सकता

ऑस्ट्रेलिया की हालिया घटना को पवित्र कुरान की नजरों से सही नहीं ठहराया जा सकता

अभी हाल ही की बात है। ऑस्ट्रेलिया स्थित सिडनी के एक समुद्री किनारे पर यहूदी समुदाय के लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपना त्योहार मना रहे थे, उसी बीच दो आतंकवादियों ने उन पर हमला कर दिया। इस घटना में कम से कम 12 लोगों की जान चली गयी। इस घटना को एक बार फिर से इस्लाम के साथ जोड़ा जा रहा है। कुछ मौकापरस्थ लोग इसे इस्लामिक आतंकवाद की भी संज्ञा देने लगे हैं लेकिन वे इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि जब दो सिरफिरे अंधाधुंध गोलिया वर्षा रहे थे, ठीक उसी वक्त एक निहत्था व्यक्ति आतंकवादियों से भिड़ गया और उसकी बंदूक छीन ली। अगर वह शख्स आतंकवादियों से नहीं जूझता तो और कई लोग मारे जाते। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उस शख्‍स का नाम अहमद अल-अहमद है। अहमद भी अरबी मूल का है और वह फल बेचने का व्यवसाय करता है। 43 साल के अहमद के दो बच्चे हैं और वह भी मुसलमान है। अब इस घटना को इस्लामिक आतंकवाद कहना कितना जायज होगा?

आइए, इस पूरे मामले को कुरान के नजरीए से देखते हैं। ’‘कुरान 2ः62, 5ः69, 2ः112 और 3ः113-115 से यह बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि अल्लाह किसी खास धार्मिक समूह का पक्ष नहीं लेता। वह हर उस इंसान से प्यार करता है जो अल्लाह पर विश्वास करता है, आखिरत को मानता है और अच्छे काम करता है।” इसी तरह, ‘‘सूरह यूनुस, आयत 32 की व्याख्या कभी किसी मुस्लिम विद्वान ने उस तरह से नहीं दी। इसका प्रैक्टिकल प्रदर्शन और व्याख्या फ्रांस के एक ईसाई डॉक्टर, डॉ. मौरिस ने 1975 में की थी। इसी तरह, सूरह फुस्सिलात, आयत 53 की व्याख्या भी वैज्ञानिकों ने दी थी। पवित्र ग्रंथ कुरान सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के लिए नहीं उतारी गई है। यह पूरी इंसानियत के लिए एक यूनिवर्सल और हमेशा रहने वाला मार्गदर्शन है लेकिन मुसलमानों के कुछ ठेकेदारों ने इसे सीमाओं में बांध दिया। जब लोग इस पर ज्यादा सोचते हैं, तो वे कुरान से इस्लामी राजनीतिक शासन साबित करने की कोशिश करने लगते हैं। यह गलत है। कुरान तो मानवता के उन्नयन की पवित्र किताब है। अगर ये आयतें नहीं होतीं, तो कुरान इस धरती पर रहने वाले हर इंसान के लिए मार्गदर्शन का ज़रिया नहीं रहता। पवित्र ग्रंथ के इतने साफ़ मार्गदर्शन के बावजूद, कुछ सिरफिरे लोगों ने खुद को हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और यहूदी जैसे ग्रुप में बाँट लिया और ऐसा करके, उन्होंने खुद को बनाने वाले का असली इरादा खो दिया।

बरेलवी फिरके के मुफ्ती मौलाना तुफैल खान कादिरी साहब फरमाते हैं, ‘‘पवित्र कुरान में कई ऐसी आयते नाजिल हुई है, जिसमें मानवता की रक्षा का संकल्प दोहराया गया है। एक आयत तो साफ संदेश देता है कि जिसने निर्दोष की हत्या की मानों उससे पूरी मानवता का कत्ल कर दिया और जिसने किसी निर्दोष की रक्षा की मानों उसने पूरी मानवता की रक्षा की हो।’’ कादिरी साहब कहते हैं कि ‘‘ऑस्ट्रेलिया में हुए यहूदियों पर हमले को यदि कुरान की नजरों से देखें तो यह निहायत नाजायज है। इससे मुसलमानों का कोई सरोकार नहीं है। जबकि अहमद अल-अहमद न केवल मानवता का नायक है अपितु इस्लाम का भी गाजी है। अहमद अल-अहमद असल में धर्म का रक्षक और इस्लाम का सच्चा सिपाही है। इस्लाम हमें यही सिखाता है।’’

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बीते रविवार शाम को अंधाधुंध फायरिंग में 12 लोगों की जानें गई। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि यहूदी ऑस्ट्रेलियाई लोगों को निशाना बनाकर हमला करने वाले दो में से एक का संबंध पाकिस्तान से है। दो हमलावरों में से एक मारा गया है, जबकि एक को घायल हालत में गिरफ्तार किया गया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि दोनों हमलावर पिता-पुत्र हैं। सूत्रों के अनुसार, जांचकर्ताओं ने संदिग्ध की पहचान न्यू साउथ वेल्स की अल-मुराद इंस्टीट्यूट के छात्र के रूप में की है। यह संस्थान अरबी और कुरान की शिक्षा देता है। जांच अधिकारी उसकी शैक्षिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की जांच कर रहे हैं। फिलहाल उसके संस्थान का आतंकी हमले से कोई संबंध नहीं मिला है। हमलावर, नवीद अकरम ने सिडनी में सेंट्रल क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी और इस्लामाबाद में हैमदर्द यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। उसने अल-मुराद इंस्टीट्यूट में भी पढ़ाई की, जहां उसे एक आदर्श छात्र बताया गया था। द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड ने बताया है कि उसने हाल ही में अपनी नौकरी खो दी थी।

मीडिया रिपोर्ट और दावों पर ध्यान दें तो हमलावर निःसंदेह मुसलमान है। उसने मुस्लिम शिक्षा भी ग्रहण कर रखी थी। इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान की पढ़ाई कर चुका था लेकिन आतंकवादियों से बिना किसी हथियार के भिड़ने वाला शख्स का कोई धार्मिक पृष्ठभूमि सामने नहीं आया है। उसका नाम अरबी है इसलिए लोगों का मानना है कि वह भी मुसलमान ही है। इस घटना ने साफ कर दिया है कि कुछ ऐसी संस्थाएं हैं, जो धार्मिक पुस्तकों की व्याख्या निजी हितों के लिए कर रहे हैं। इस्लामिक विद्वानों और समझदार संस्थाओं को इसपर गंभीरता से विचार करनी चाहिए। इजरायल में हो रही घटना, या फिर फिलिस्तीनियों के साथ हो रहे अन्याय को यहूदियों पर आक्रमण कर बदला लेना इसे किसी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता है। यह न तो मानवता के लिए ठीक है और न ही इस्लाम इसकी इजाजत देता है। इससे इस्लाम का भला नहीं होगा। उलट इस्लाम के खिलाफ जो षड्यंत्र चल रहे है, उसे बल मिलेगा।  

इस प्रकार के सिरफिरे लोग भारत में भी हैं। हमारा देश लगातार इस प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहा है। इसका एक वैश्विक रूप तैयार हो गया है। इस प्रकार के मानस को तैयार करने में कौन लोग जिम्मेदार हैं, उस पर सत्ता और शासन से ज्यादा मुसलमानों को नजर रखने की जरूरत है। इधर के दिनों में अरब के कई मुस्लिम देश अपने आप को बदलने लगे हैं, जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे इस्लामिक राष्ट्र नकारात्मक मानसिकता को लगातार हवा दे रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका का वर्तमान नेतृत्व भी फिलहाल इसी दिशा में काम कर रहा है। इसे संभालने की जरूरत है और ईमान वाले इसे बेहतर समझ समझ सकते हैं। 

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