अशोक कुमार झा
झारखंड की राजधानी रांची स्थित होटवार जेल इन दिनों केवल एक जेल नहीं बल्कि पूरे राज्य की प्रशासनिक संवेदनहीनता, राजनीतिक टकराव, मानवाधिकार संकट और महिला सुरक्षा पर उठते गंभीर सवालों का केंद्र बन चुकी है। न्यायिक अभिरक्षा में बंद एक महिला कैदी के साथ कथित शारीरिक शोषण, उसके गर्भवती होने और फिर पूरे मामले को दबाने की कोशिशों से जुड़े आरोपों ने राज्य की राजनीति से लेकर न्यायिक व्यवस्था तक में भूचाल ला दिया है।
यह मामला अब केवल एक अपराध का आरोप नहीं रह गया बल्कि उस भयावह सच्चाई का प्रतीक बनता जा रहा है जिसमें सुरक्षा देने वाली व्यवस्था पर ही शोषण का आरोप लग रहा है। जिस जेल को कानून और न्याय की निगरानी में संचालित होना चाहिए, वहीं यदि एक महिला बंदी खुद को असुरक्षित महसूस करे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहरा आघात है।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता द्वारा लगाए गए आरोपों ने इस पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है। बाबूलाल मरांडी ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि होटवार जेल में न्यायिक अभिरक्षा में बंद एक महिला कैदी का जेल सुपरिटेंडेंट द्वारा लगातार शारीरिक शोषण किया गया और वह गर्भवती हो गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मामले को दबाने के लिए जेल प्रशासन और उच्च अधिकारियों द्वारा सुनियोजित तरीके से सबूत मिटाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि इन आरोपों का एक छोटा हिस्सा भी सत्य साबित होता है, तो यह झारखंड के इतिहास के सबसे शर्मनाक प्रशासनिक अपराधों में गिना जाएगा।
सलाखों के पीछे की दुनिया, जहां सुरक्षा की गारंटी राज्य की जिम्मेदारी होती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जेल केवल अपराधियों को बंद रखने की जगह नहीं होती बल्कि वह राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा होती है। न्यायिक अभिरक्षा में भेजे गए व्यक्ति की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और मानवाधिकार की पूरी जिम्मेदारी सरकार और जेल प्रशासन की होती है।
विशेष रूप से महिला बंदियों के मामले में कानून और सुप्रीम कोर्ट के कई दिशा-निर्देश बेहद स्पष्ट हैं। महिला कैदियों की सुरक्षा, मेडिकल जांच, महिला कर्मियों की निगरानी, मानसिक स्वास्थ्य और गोपनीयता को लेकर विस्तृत नियम बनाए गए हैं। लेकिन होटवार जेल को लेकर सामने आए आरोप यह संकेत देते हैं कि कागजों पर मौजूद नियम और वास्तविकता के बीच कितना बड़ा अंतर हो सकता है।
सोचिए, जिस महिला को न्यायिक प्रक्रिया के तहत जेल भेजा गया हो, यदि उसी जेल में उसका कथित शोषण होने लगे, तो वह आखिर किससे न्याय मांगे? कौन उसकी आवाज सुने? और यदि आरोपों के अनुसार सबूत मिटाने का प्रयास भी किया जा रहा हो, तो यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है।
पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि पीड़ित महिला बंदी को बीमारी और इलाज का बहाना बनाकर अलग-अलग चिकित्सालयों और गुप्त स्थानों पर ले जाया गया ताकि गर्भ और फॉरेंसिक साक्ष्यों को समाप्त किया जा सके।
यह आरोप सामान्य नहीं है। किसी भी यौन शोषण मामले में मेडिकल साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माने जाते हैं। यदि वास्तव में साक्ष्यों से छेड़छाड़ या उन्हें मिटाने की कोशिश हुई है, तो यह केवल अपराध नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की गंभीर साजिश मानी जाएगी।
यह भी सवाल उठ रहा है कि आखिर जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था क्या कर रही थी? जेल परिसर में सीसीटीवी कैमरे, रजिस्टर एंट्री, मेडिकल रिकॉर्ड और सुरक्षा जांच की प्रक्रियाएं आखिर क्यों इस कथित घटनाक्रम को रोक नहीं सकीं?
मामले ने और अधिक विस्फोटक रूप तब ले लिया जब बाबूलाल मरांडी ने जेल आईजी पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि जेल आईजी स्वयं इस पूरे मामले को रफा-दफा करने, फाइलें गायब करने और आरोपी अधिकारियों को संरक्षण देने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
साथ ही यह भी दावा किया गया कि जेल कर्मियों और उन कर्मचारियों को, जो इस पूरे घटनाक्रम के गवाह थे, योजनाबद्ध तरीके से इधर-उधर स्थानांतरित किया जा रहा है ताकि कोई सच्चाई बाहर न ला सके।
यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का उदाहरण होगा। सबसे चिंता की बात यह है कि अब तक इस मामले में स्पष्ट सरकारी प्रतिक्रिया सामने नहीं आने से लोगों के मन में संदेह और गहरा होता जा रहा है। जनता यह जानना चाहती है कि क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या मामला राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा।
यह घटना इसलिए भी अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि यह सीधे महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी है। झारखंड सहित पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर लगातार बहस होती रही है। सड़क, कार्यस्थल, शिक्षण संस्थान और घर के बाद अब यदि जेल जैसी नियंत्रित और सुरक्षित मानी जाने वाली जगह पर भी महिला सुरक्षित नहीं है, तो यह पूरे समाज के लिए चेतावनी है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जेलों के भीतर महिलाओं की स्थिति अक्सर समाज की नजरों से दूर रहती है। कई बार बंदियों की आवाज बाहर तक पहुंच ही नहीं पाती। ऐसे में यदि किसी महिला ने साहस कर अपनी पीड़ा सामने रखी होगी, तो उसकी सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
इस पूरे मामले ने झारखंड की राजनीति को भी गर्म कर दिया है। विपक्ष लगातार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी सरकार पर हमला बोल रहा है। बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि आरोपी जेल सुपरिटेंडेंट और कथित रूप से मामले को दबाने वाले अधिकारियों को तत्काल पदमुक्त कर गिरफ्तार नहीं किया गया, तो यह माना जाएगा कि सरकार स्वयं ऐसे कृत्यों को संरक्षण दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में झारखंड की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। महिला सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और जेल सुधार जैसे विषयों पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है।
इस पूरे मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, उच्च न्यायालय और सर्वाेच्च न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की जा रही है। दरअसल, जब आरोप सीधे राज्य की संस्थाओं और अधिकारियों पर लगते हैं, तब निष्पक्ष जांच के लिए स्वतंत्र एजेंसियों या न्यायिक निगरानी की आवश्यकता महसूस की जाती है।
मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि जेलों में बंद महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए नियमित निरीक्षण, स्वतंत्र मेडिकल जांच और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है। यदि किसी महिला बंदी के साथ अत्याचार होता है और वह न्याय नहीं पा पाती, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 कृ यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार कृ की भावना के खिलाफ माना जाएगा।
यह सवाल अब तेजी से उठने लगा है कि आखिर झारखंड की जेलों की वास्तविक स्थिति क्या है? क्या जेलें अपराधियों को सुधारने का केंद्र हैं या वहां सत्ता और पद का दुरुपयोग हो रहा है? क्या जेलों के भीतर पारदर्शिता की कमी है? क्या महिला बंदियों की सुरक्षा केवल कागजों में सीमित है? इन सवालों का जवाब केवल सरकार ही नहीं, पूरे प्रशासनिक तंत्र को देना होगा।
होटवार जेल से जुड़ा यह मामला केवल एक घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो खुद को कानून और न्याय का संरक्षक कहती है। यदि किसी महिला बंदी के साथ अन्याय हुआ है, तो दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त हो।
यदि जेल की सलाखों के भीतर भी महिलाओं की गरिमा सुरक्षित नहीं रह गई तो यह केवल झारखंड नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के लिए चिंता का विषय होगा। आज आम लोगों के मन में बड़ा यह है कि क्या यह सच सामने आ भी पाएगा? क्या दोषियों पर कार्रवाई भी होगी? क्या पीड़िता को वास्तव में इंसाफ मिल पायेगा? या फिर यह मामला भी सत्ता, प्रभाव और फाइलों के अंधेरे में दब कर रह जाएगा? क्योंकि जनता अब केवल बयान नहीं बल्कि सच और न्याय दोनों देखना चाहती है।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
