गौतम चौधरी
भारत की राजनीति में अक्सर सबसे कठिन काम तथ्यों और भय के बीच की रेखा पहचानना होता है। अकसर यहां वही नेता सफल माना जाता है, जो भारत की लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था को सही तरीके से समझता है। विपक्ष जब किसी संकट की चेतावनी देता है, तो सत्ता पक्ष उसे “डर फैलाना” कहकर खारिज करता है और जब सरकार आश्वासन देती है कि “सब नियंत्रण में है”, तब विपक्ष उसे वास्तविकता से आँख चुराना बताता है।
अभी हाल ही में राहुल गांधी द्वारा वैश्विक “वर्ल्ड ऑर्डर” के बदलाव और उसके कारण भारत में संभावित पेट्रोल-गैस संकट की आशंका भी इसी राजनीतिक द्वंद्व का हिस्सा है। परंतु इस बहस को केवल चुनावी बयानबाज़ी मान लेना एक गंभीर भूल होगी, क्योंकि इसके केंद्र में भारत की ऊर्जा सुरक्षा का वह प्रश्न मौजूद है, जो आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था और सामरिक नीति, दोनों को प्रभावित करने वाला है।
सच यह है कि दुनिया की भू-राजनीतिक संरचना तेजी से बदल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की ऊर्जा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया। चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता ने वैश्विक व्यापार और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं को अस्थिर बनाया। पश्चिम एशिया में पुराने गठबंधनों का पुनर्गठन हो रहा है, जबकि डॉलर-आधारित आर्थिक व्यवस्था को भी कई देश खुली चुनौती दे रहे हैं। ऐसे समय में ऊर्जा केवल बाजार की वस्तु नहीं रह गई है; वह कूटनीतिक दबाव और सामरिक शक्ति का साधन बन चुकी है।
भारत के संदर्भ में यह स्थिति इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि देश अभी भी अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर आयातित तेल और गैस पर निर्भर है। पश्चिम एशिया से आने वाली आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता हैकृवह समुद्री मार्ग, जिसके इर्द-गिर्द ईरान, खाड़ी देश और वैश्विक शक्तियों के हित टकराते रहते हैं। यदि इस मार्ग में व्यवधान आता है, तो उसका सीधा असर केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार पर नहीं, बल्कि भारतीय रसोई, परिवहन व्यवस्था और महँगाई पर भी पड़ता है।
यही कारण है कि ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव बढ़ने के समय वैश्विक तेल और गैस बाजारों में घबराहट दिखाई दी। कीमतों में उछाल आया और भारत में भी स्च्ळ तथा ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताएँ बढ़ीं। दिलचस्प तथ्य यह है कि उस समय केवल विपक्ष ही चेतावनी नहीं दे रहा था; स्वयं केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नागरिकों से ईंधन के संयमित उपयोग की अपील की थी। कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन और वर्क फ्रॉम होम जैसी सलाहें यह संकेत थीं कि सरकार भी वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता के संभावित प्रभाव को लेकर सतर्क थी।
इसलिए राहुल गांधी का यह कहना कि “युद्ध समाप्त होने के बाद भी संकट तुरंत समाप्त नहीं होगा”, पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता। आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकट केवल युद्धभूमि पर नहीं पैदा होते; वे आपूर्ति श्रृंखलाओं, समुद्री व्यापार मार्गों और वित्तीय बाजारों के माध्यम से लंबे समय तक प्रभाव डालते हैं। ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता का असर महीनों और कभी-कभी वर्षों तक बना रहता है।
दूसरी ओर, इस खतरे को तत्काल “पूर्ण पेट्रोल-गैस संकट” के रूप में प्रस्तुत करना भी अतिशयोक्ति होगी। भारत आज 1970 के दशक जैसा असहाय देश नहीं है। उसने रूस सहित कई स्रोतों से तेल आयात बढ़ाया है, रणनीतिक तेल भंडार विकसित किए हैं और ऊर्जा आपूर्ति के विविधीकरण पर काम किया है। सरकार का यह दावा भी पूरी तरह गलत नहीं कि देश में व्यापक ईंधन कमी जैसी स्थिति फिलहाल नहीं है। समस्या यह है कि राजनीति दोनों पक्षों को अतियों की ओर धकेल देती हैकृविपक्ष संभावित संकट को नाटकीय बनाता है और सत्ता पक्ष जोखिम को न्यूनतम बताने की कोशिश करता है।
दरअसल, इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि भारत की ऊर्जा निर्भरता अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रह गई है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है। जब तक देश आयातित तेल और गैस पर अत्यधिक निर्भर रहेगा, तब तक पश्चिम एशिया का हर युद्ध, हर समुद्री तनाव और हर वैश्विक प्रतिबंध भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालता रहेगा। महँगाई से लेकर परिवहन लागत और घरेलू रसोई तक-सब कुछ इस भू-राजनीतिक अस्थिरता से जुड़ा रहेगा।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो राहुल गांधी की टिप्पणी में चेतावनी भी है और राजनीतिक नाटकीयता भी। किंतु यदि उस बयान के मूल तर्क को अलग करके देखा जाए, तो वह भारत के सामने मौजूद एक वास्तविक और दीर्घकालिक चुनौती की ओर संकेत करता है। वहीं सरकार का आश्वासन भी आंशिक सत्य हैकृस्थिति नियंत्रण में हो सकती है, परंतु वैश्विक ऊर्जा बाजारों की अनिश्चितता से कोई देश पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता।
इसलिए आवश्यकता भय या आत्मसंतोष की नहीं, बल्कि गंभीर राष्ट्रीय विमर्श की है। भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, रणनीतिक भंडारण और स्थायी आपूर्ति नेटवर्क पर कहीं अधिक तीव्रता से काम करना होगा। क्योंकि आने वाले समय में दुनिया का बदलता “वर्ल्ड ऑर्डर” केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति की खबर नहीं रहेगा; वह सीधे भारतीय नागरिक की जेब, रसोई और जीवन स्तर को प्रभावित करेगा।
