गौतम चौधरी
बीसवीं सदी का इतिहास ऐसे व्यक्तित्वों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने देशों की चित्र और नियति दोनों बदल दी। कुछ नेता केवल अपने राष्ट्र की राजनीति तक सीमित नहीं रहते, वे एक युग की वैचारिक बेचौनी, संघर्ष और आकांक्षा का प्रतीक बन जाते हैं। वियतनाम के महानायक और राष्ट्रवादी आन्दोलन के प्रतीक, Ho Chi Minh ऐसे ही व्यक्तित्व थे। वे एक साथ राष्ट्रवादी भी थे और साम्यवादी भी; जननेता भी थे और कठोर सत्ता-संरचना के निर्माता भी। यहां एक बात और बता दें कि मजदूरों की लड़ाई बिना राष्ट्रवादी आन्दोलन के संभव नहीं हो सकता है। इसलिए उन्हें केवल “महानायक” या “तानाशाह” कह देना इतिहास के साथ अन्याय और उनके व्यक्तित्व के साथ एकतरफा विश्लेषण होगा।
जब हो ची मिन्ह का जन्म हुआ, तब वियतनाम फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के अधीन था। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की तरह वहाँ भी यूरोपीय साम्राज्यवाद स्थानीय समाज, संसाधनों और श्रम पर नियंत्रण स्थापित कर चुका था। ऐसे समय में हो ची मिन्ह ने राष्ट्रवादी मुक्ति को अपना जीवन लक्ष्य बनाया। वे दुनिया के कई देशों में रहे, मजदूर जीवन देखा, पश्चिमी लोकतंत्रों की सीमाएँ समझीं और अंततः समाजवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए। उनके लिए साम्यवाद केवल आर्थिक सिद्धांत नहीं था; वह उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का हथियार भी था।
यही कारण है कि वियतनाम की जनता के एक बड़े हिस्से ने उन्हें स्वतंत्रता संघर्ष के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया। 1945 में उन्होंने वियतनाम की स्वतंत्रता की घोषणा की, लेकिन फ्रांस ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद शुरू हुआ संघर्ष केवल एक उपनिवेश और उपनिवेशित जनता के बीच युद्ध नहीं था; यह उस बदलती वैश्विक राजनीति का हिस्सा था जिसमें पश्चिमी शक्तियाँ अपने साम्राज्य बचाने की कोशिश कर रही थीं और उपनिवेशित समाज आत्मनिर्णय की मांग कर रहे थे।
Battle of Dien Bien Phu में फ्रांस की हार ने दुनिया को यह संदेश दिया कि आधुनिक औपनिवेशिक साम्राज्य भी पराजित हो सकते हैं। यही वह क्षण था जिसने एशिया और अफ्रीका के अनेक स्वतंत्रता आंदोलनों को मनोवैज्ञानिक शक्ति दी। भारत सहित तीसरी दुनिया के कई देशों में हो ची मिन्ह को एक प्रतिरोध-नायक के रूप में देखा जाने लगा।
इतिहास का दूसरा पक्ष भी है। वह भी हमें जानना चाहिए। हो ची मिन्ह और उनके नेतृत्व में स्थापित व्यवस्था ने राजनीतिक केंद्रीकरण, वैचारिक नियंत्रण और विरोध के सीमित दायरे को भी जन्म दिया। कम्युनिस्ट शासन की संरचना में एकदलीय सत्ता स्वाभाविक रूप से मजबूत हुई। भूमि सुधार अभियानों और राजनीतिक अभियानों के दौरान दमन तथा कठोर कार्रवाइयों के आरोप भी लगे। आलोचकों का कहना है कि स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते-लड़ते वियतनाम अंततः एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश कर गया जहाँ वैचारिक असहमति के लिए बहुत कम स्थान बचा।
यही वह बिंदु है जहाँ हो ची मिन्ह का मूल्यांकन जटिल हो जाता है। क्या किसी उपनिवेशित समाज को मुक्ति दिलाने वाला नेता लोकतांत्रिक उदारता का भी वाहक होता है? इतिहास कई बार इसका उत्तर “नहीं” में देता है। उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों के अनेक नेता सत्ता में आने के बाद केंद्रीकृत राज्य संरचनाओं की ओर बढ़े। हो ची मिन्ह भी इस प्रवृत्ति से पूरी तरह अलग नहीं थे।
फिर भी यह समझना आवश्यक है कि वियतनाम का संघर्ष केवल वैचारिक नहीं था। अमेरिकी हस्तक्षेप और Vietnam War ने पूरे समाज को युद्ध, हिंसा और ध्रुवीकरण की चरम स्थितियों में धकेल दिया। ऐसे वातावरण में उदार लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है। यही कारण है कि हो ची मिन्ह को केवल “कम्युनिस्ट शासक” कह देना उतना ही अधूरा है जितना उन्हें “निर्मल मुक्ति-पुरुष” कहना।
आज, जब दुनिया फिर से वैचारिक ध्रुवीकरण, राष्ट्रवाद और भू-राजनीतिक संघर्षों के दौर से गुजर रही है, हो ची मिन्ह का अनुभव एक महत्वपूर्ण सबक देता है। राष्ट्रीय मुक्ति और सामाजिक न्याय की आकांक्षा यदि लोकतांत्रिक संतुलन, संस्थागत स्वतंत्रता और वैचारिक बहुलता से न जुड़ी हो, तो वह अंततः एक नई कठोर सत्ता संरचना में बदल सकती है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि उपनिवेशवाद और बाहरी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष करने वालों को केवल पश्चिमी उदारवादी कसौटियों से मापना भी पर्याप्त नहीं होता।
हो ची मिन्ह इसलिए आज भी विवादास्पद हैं – क्योंकि वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि बीसवीं सदी की सबसे बड़ी ऐतिहासिक द्वंद्वात्मकता के प्रतिनिधि थे, स्वतंत्रता की लड़ाई और सत्ता की कठोरता बीच के द्वंद्व का प्रतक।
