भारतीय न्याय प्रणाली में यह कैसा युग प्रारंभ हो रहा है?

भारतीय न्याय प्रणाली में यह कैसा युग प्रारंभ हो रहा है?

‘यशवन्त’ का अर्थ जिसे यश प्राप्त हो, या ‘महिमाशाली’ होता है किन्तु जस्टिस यशवन्त वर्मा के मामले में नाम के साथ श्यशश् का अन्त हो गया लगता है। यह कोई साधारण बात नहीं बल्कि बहुत गम्भीर विषय है लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि अब गम्भीर बातों, अथवा सवालों पर सोच-समझ तथा चिन्तन-मनन अत्यन्त कम होता है। परिणामत-विशेषकर, न्यायपालिका के क्षेत्र में अब पालिका यानी प्रणाली अथवा व्यवस्था ही शेष है, न्याय लगभग लापता या, कमसे कम दुर्लभ तो अवश्य हो गया है। अधिकतर मामलों में जिन्हें कथित न्याय मिलता है, उमकी तो बड़ी चर्चा होती है किन्तु दूसरे पक्ष के समग्र हितों को अनदेखा, अर्थात् नजरअन्दाज कर दिया जाता है।

यशवन्त प्रकरण ने भारतीय न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी 2026 को उनकी याचिका खारिज कर महाभियोग जाँच समिति के गठन को वैध ठहराया, जिससे भ्रष्टाचार के आरोपों की प्रक्रिया तेज हो गयी है। यह घटना न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार का प्रतीक मात्र है, जहाँ आन्तरिक जाँच और पारदर्शिता की कमी ने संस्थागत क्षय को बढ़ावा दिया।

वर्मा के दिल्ली हाईकोर्ट आवास पर मार्च 2025 में अग्निशमनकर्मियों को जले नोट मिलने से कैश काण्ड उजागर हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ने अगस्त 2025 में तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविन्द कुमार शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है अब वह संसदीय प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करेगा लेकिन यह फैसला न्यायिक स्वायत्तता पर सवाल उठाता है।

भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के कई प्रमाणित मामले सामने आये हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन पर उनके परिवार की अकूत सम्पत्ति और अनुकूल फैसलों के बदले सौदेबाजी के आरोप लगे, फिर भी उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। जस्टिस सौमित्र सेन ने 2011 में धन दुरुपयोग के दोषी पाये जाने पर महाभियोग से पहले इस्तीफा दे दिया। प्रशान्त भूषण ने 2009 में दावा किया कि पिछले 16-17 मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे जिसके लिए उन्हें अवमानना का सामना करना पड़ा।

निचली अदालतों में 80-90ः मामले लम्बित रहते हैं, जहाँ क्लर्क रिश्वत लेते हैं। कॉलेजियम प्रणाली अपारदर्शी है, जो भ्रष्ट जजों को पदोन्नत करती है। जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट 1968 के तहत महाभियोग दुर्लभ हैकृ1993 के बाद कोई जज हटाया नहीं गया। इन-हाउस जाँच परिवारवाद को बढ़ावा देती है।

राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की स्थापना से नियुक्ति और जाँच पारदर्शी हो सकती है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में जजों को शामिल कर एफआईआर सम्भव बनाएँ। डिजिटल निगरानी और समयबद्ध जाँच अनिवार्य करें। गंभीरता से सोचना होगा कि न्यायपालिका को घेरे हुए वर्तमान संकट ही न्यायपालिका को सही तरीके से पुनर्स्थापित करने का अवसर है।

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