वामपंथ/ बैंक हड़ताल का व्यापक भावार्थ

वामपंथ/ बैंक हड़ताल का व्यापक भावार्थ

शुक्रवार को थे देश के करीब 10 लाख बैंक कर्मचारी और अधिकारी हड़ताल पर थे । इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ-साथ कुछ पुराने निजी और सहकारी बैंकों के कर्मचारी भी शामिल हैं। नए निजी बैंक, जैसे एचडीएफसी, आईसीआईसीआई और एक्सिस बैंक आदि के कर्मचारी इस हड़ताल में शामिल नहीं थे । शनिवार और उसके अगले दिन रविवार होने के कारण बैंकिंग व्यवस्था में लगातार तीन दिन कामकाज प्रभावित रहेगा।

बैंक कर्मचारियों की सबसे प्रमुख माँग पाँच दिवसीय कार्य-सप्ताह लागू करना है। इसके अलावा वेतन-भत्तों की विसंगतियों को दूर करना भी उनकी प्रमुख माँगों में शामिल है।

भारत के बैंकिंग इतिहास पर नजर डालें तो बैंक कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच पहला समझौता अक्टूबर 1966 में हुआ था। इस समझौते के तहत छह घंटे के कारोबार समय तथा सात घंटे के कार्यदिवस की माँग को स्वीकार किया गया था। बैंक कर्मचारियों के तत्कालीन समझदार और दूरदर्शी नेताओं द्वारा करवाया गया यह समझौता सैद्धांतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। इसके बाद हुए 12 समझौतों में वेतन-भत्तों के संशोधन, कंप्यूटरीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के कारण काम से बाहर किए गए कर्मचारियों को समायोजित करने जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

कर्मचारी और मजदूर आंदोलनों के इतिहास का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि कर्मचारियों की माँगें सामान्यतः आर्थिक मुद्दों से शुरू होती हैं लेकिन व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखें तो इनके पीछे तकनीकी विकास और बेरोजगारी का द्वंद्व प्रमुख रूप से मौजूद रहता है। यदि इस पहलू पर ध्यान न दिया जाए और आंदोलन केवल आर्थिक माँगों तक सीमित रह जाए, तो हड़ताल जीतने के बावजूद उसे व्यापक अर्थों में पराजित माना जा सकता है।

भारत में 1984 के बाद कंप्यूटरीकरण का दौर शुरू हुआ और 1990 के बाद वैश्वीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण की नीतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद एक ओर रोजगारविहीन विकास की चुनौती सामने आई, तो दूसरी ओर काम में लगे कर्मचारियों पर कार्यभार लगातार बढ़ता गया। कर्मचारियों को जितनी आर्थिक सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, उससे अधिक की भरपाई कई बार छंटनी, नई भर्तियों पर रोक और कर्मचारियों की संख्या घटाकर उन्हीं से अधिक काम करवाने के माध्यम से कर ली जाती है।

वर्तमान स्थिति में बैंक कर्मचारियों के कार्यदिवस पर नजर डालें तो वे प्रायः सुबह 9रू30 बजे बैंक पहुँचते हैं और रात 8 से 9 बजे तक काम निपटाकर घर लौट पाते हैं। इस प्रकार उन्हें लगभग 11 घंटे काम करना पड़ता है। कंप्यूटर की तीव्र गति के साथ काम करने के दबाव के कारण कई-कई कर्मचारियों का काम एक ही कर्मचारी से करवाया जा रहा है।

1990 के बाद बैंकिंग कार्यों की प्रकृति में भी व्यापक परिवर्तन आया है। पहले बैंकों का मुख्य कार्य लोगों की बचत जमा करना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें वापस करना था लेकिन वित्तीय पूँजी के विस्तार के उद्देश्य से ऋण वितरण की योजनाओं को बढ़ाया गया और बैंक कर्मचारियों को ऋण देने के लक्ष्य सौंपे जाने लगे। इसके अतिरिक्त खाते खोलने, छोटी बचत योजनाओं, बीमा और विशेष रूप से कृषि बीमा से संबंधित लक्ष्य भी कर्मचारियों को दिए जाते हैं।

बैंकिंग लेन-देन का दायरा हर वर्ष बढ़ रहा है। इसके साथ ही साइबर अपराध और बैंकिंग धोखाधड़ी की घटनाओं की जिम्मेदारी भी कई बार खाता खोलने वाले कर्मचारी पर डाल दी जाती है। ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारियों को पुलिस मामलों और मुकदमों तक का सामना करना पड़ता है।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच पाँच दिवसीय कार्य-सप्ताह की माँग पूरे भारतीय कर्मचारी आंदोलन को दिशा देने वाली माँग बन सकती है। वेतन-भत्तों से संबंधित माँगों के अतिरिक्त यह एक सैद्धांतिक और दूरगामी महत्व वाली माँग है। पाँच दिन का सप्ताह लागू होने से बैंक कर्मचारियों को राहत मिलेगी ही, साथ-साथ नई पीढ़ी के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

उदाहरण के लिए, वर्तमान 42 घंटे के कानूनी कार्य-सप्ताह के स्थान पर यदि पाँच दिन का 35 घंटे का कार्य-सप्ताह लागू किया जाता है, तो साप्ताहिक कार्यसमय में सात घंटे की कमी होगी, अर्थात कार्यसमय में लगभग 16.6 प्रतिशत की कमी आएगी। यदि कार्यसमय में 16.6 प्रतिशत की कमी होती है तो उपलब्ध काम को बाँटने पर रोजगार के अवसरों में लगभग 20 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना बनती है।

यह सिद्धांत अत्यंत सरल और महत्वपूर्ण है। तकनीकी उन्नति के साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा कर्मचारियों को अवकाश और व्यक्तिगत जीवन के लिए समय उपलब्ध करवाने का एक प्रभावी मार्ग कार्यसमय को सीमित करना है। इसका सीधा गणित यह है कि यदि कार्यसमय में 10 प्रतिशत की कमी की जाए तो रोजगार के अवसर लगभग 11 प्रतिशत बढ़ सकते हैं। इसी प्रकार 20 प्रतिशत कार्यसमय की कमी से रोजगार के अवसर 25 प्रतिशत, 30 प्रतिशत कमी से 42 प्रतिशत, 40 प्रतिशत कमी से 66 प्रतिशत और 50 प्रतिशत कमी से 100 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं।

अर्थात कार्यसमय में कटौती की तुलना में रोजगार के अवसरों में वृद्धि बढ़ती हुई दर से होती है। इससे नई पीढ़ी को रोजगार मिल सकता है और काम में लगे लोगों को सामाजिक, व्यक्तिगत तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए अधिक खाली समय उपलब्ध हो सकता है।

हालाँकि कर्मचारी और मजदूर आंदोलनों के सचेत विरोधी इस प्रकार की हड़तालों को बदनाम करने के लिए तरह-तरह का दुष्प्रचार करते हैं लेकिन जब उनसे रोजगार बढ़ाने और लोगों को खाली समय उपलब्ध करवाने के सवाल पर जवाब माँगा जाता है, तो वे निरुत्तर हो जाते हैं।

आज समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि काम में लगे लोगों को अधिक खाली समय मिले और जिनके पास काम नहीं है, उन्हें रोजगार उपलब्ध हो। इसके लिए कार्यसमय को सीमित करना आवश्यक है। यदि बैंकिंग क्षेत्र में 1966 के पहले समझौते के बाद से ही लगातार कार्यसमय कम करने की दिशा में कानून बनते और उनका प्रभाव समाज के अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों तक भी पहुँचता, तो आज देश की स्थिति काफी अलग हो सकती थी। बेरोजगारी की समस्या कम होती, लोगों के जीवन में खुशहाली आती और कामकाजी लोगों को अपने परिवार तथा समाज के लिए अधिक समय मिलता।

इसलिए बैंक कर्मचारियों की पाँच दिवसीय कार्य-सप्ताह की माँग को व्यापक जनसमर्थन मिलना चाहिए। यदि इस सैद्धांतिक विचार को जनता की चेतना का हिस्सा बनाया जा सके, तो इससे न केवल बैंक कर्मचारियों की माँग पूरी होने का मार्ग प्रशस्त होगा, बल्कि पूरे समाज को रोजगार, अवकाश और बेहतर जीवन की दिशा में एक नई राह भी मिलेगी।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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