जमीनी रपट/ हेमंत सरकार ने झारखंड में क्या बदला?

जमीनी रपट/ हेमंत सरकार ने झारखंड में क्या बदला?

झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार के पहले कार्यकाल को अब पीछे मुड़कर देखने का समय है। दिसंबर 2019 में सत्ता संभालने वाली सरकार को बीच में राजनीतिक और कानूनी संकट का सामना करना पड़ा, लेकिन 2019 से 2024 के बीच उसके पास इतना समय जरूर रहा कि उसकी नीतियों और कामकाज का मूल्यांकन किया जा सके।

किसी सरकार की उपलब्धि का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने कितनी योजनाएं घोषित कीं। असली प्रश्न यह है कि उन योजनाओं से लोगों के जीवन में कितना परिवर्तन आया। इसी कसौटी पर हेमंत सरकार के पहले कार्यकाल को देखना जरूरी है।

सामाजिक सुरक्षा में बड़ा विस्तार
हेमंत सरकार की सबसे स्पष्ट पहचान सामाजिक सुरक्षा के विस्तार के रूप में सामने आती है। सरकार के अनुसार 2019 तक लगभग 15 लाख लोगों को पेंशन मिल रही थी, जिसे चार वर्षों में बढ़ाकर करीब 37 लाख तक किया गया। बाद में अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों के लिए पेंशन की उम्र सीमा 50 वर्ष की गई।

यह केवल आंकड़े का विस्तार नहीं है। झारखंड जैसे गरीब और बड़ी ग्रामीण आबादी वाले राज्य में वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन परिवार की न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन है। हालांकि इसका अगला सवाल भुगतान की नियमितता और वास्तविक पात्रता का है। केवल लाभार्थियों की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं, समय पर पैसा पहुंचना भी उतना ही जरूरी है।

किसानों के लिए ऋण माफी
कृषि क्षेत्र में सरकार ने 50 हजार रुपये तक की ऋण माफी से आगे बढ़कर दो लाख रुपये तक के कृषि ऋण माफ करने का निर्णय लिया। सरकार ने इसके साथ किसान क्रेडिट कार्ड के विस्तार का भी दावा किया। उसके अनुसार चार वर्षों में लगभग 20 लाख किसानों को केसीसी से जोड़ा गया।

कर्जमाफी तत्काल राहत देती है, लेकिन झारखंड की कृषि समस्या केवल कर्ज की नहीं है। सिंचाई, बाजार, भंडारण, उत्पादकता और खेती से होने वाली आय का प्रश्न अधिक बड़ा है। इसलिए कृषि के क्षेत्र में हेमंत सरकार का स्थायी मूल्यांकन इस बात से होगा कि किसान की आय और कृषि की उत्पादकता में कितना सुधार हुआ।

शिक्षा में ‘स्कूल ऑफ एक्सीलेंस’
सरकार ने सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के लिए स्कूल ऑफ एक्सीलेंस की अवधारणा शुरू की। दिसंबर 2023 तक सरकार ने पहले चरण में 80 स्कूल ऑफ एक्सीलेंस शुरू करने की जानकारी दी थी। इन विद्यालयों में आधुनिक शिक्षण, अंग्रेजी माध्यम और बेहतर आधारभूत सुविधाओं पर जोर दिया गया।

इसके साथ सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना, गुरुजी क्रेडिट कार्ड और मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं भी शुरू हुईं। सरकार के अनुसार गुरुजी क्रेडिट कार्ड के माध्यम से उच्च शिक्षा के लिए 15 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जाना था।

यहां भी वास्तविक कसौटी यही है कि कितने विद्यार्थियों को लाभ मिला, कितने विद्यार्थी उच्च शिक्षा तक पहुंचे और सरकारी विद्यालयों के शैक्षणिक परिणामों में कितना सुधार आया।

महिलाओं के लिए नई योजनाओं की जमीन
महिलाओं के लिए सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना और फूलो-झानो आशीर्वाद योजना जैसी योजनाएं सरकार के सामाजिक एजेंडे का हिस्सा बनीं। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि लड़कियों की शिक्षा और कमजोर आयवर्ग की महिलाओं के लिए वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराना था।

पहले कार्यकाल के अंतिम चरण में मंईयां सम्मान योजना की शुरुआत हुई। अगस्त 2024 में सरकार ने इसके तहत लाखों महिलाओं को डीबीटी के माध्यम से राशि हस्तांतरित करने की जानकारी दी थी। हालांकि यह योजना मूलतः दूसरे कार्यकाल की बड़ी राजनीतिक-सामाजिक पहचान बनने वाली थी, इसलिए इसका पूरा मूल्यांकन 2024 के बाद के आंकड़ों के साथ ही किया जाना उचित होगा।

गांव तक सरकार पहुंचाने की कोशिश
‘आपकी योजना, आपकी सरकार, आपके द्वार’ कार्यक्रम हेमंत सरकार की प्रशासनिक शैली की एक महत्वपूर्ण पहल रही। इसका उद्देश्य अधिकारियों और सरकारी योजनाओं को ग्रामीण जनता के दरवाजे तक ले जाना था।

यह प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड की बड़ी चुनौती केवल योजना बनाना नहीं बल्कि दूरदराज के गांवों तक उसका लाभ पहुंचाना है। सरकार ने इस अभियान के माध्यम से लोगों को विभिन्न योजनाओं से जोड़ने और स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान का दावा किया।

अर्थव्यवस्था में मिश्रित बदलाव
झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार कोविड के बाद राज्य की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ। सर्वेक्षण के मुताबिक 2020-21 से 2022-23 के बीच वास्तविक जीएसडीपी की औसत वार्षिक वृद्धि दर 8.8 प्रतिशत रही और 2023-24 में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था।

यह आंकड़ा सकारात्मक है लेकिन इसे पूरी तरह सरकार की उपलब्धि मान लेना भी उचित नहीं होगा। झारखंड की अर्थव्यवस्था खनिज और बड़े औद्योगिक क्षेत्रों से गहराई से जुड़ी है तथा आर्थिक वृद्धि में राष्ट्रीय और वैश्विक परिस्थितियों का भी प्रभाव रहता है।

इसलिए असली प्रश्न यह है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ कितनी मात्रा में रोजगार, ग्रामीण आय और सामान्य परिवार की आर्थिक स्थिति में दिखाई दिया।

रोजगार अभी भी बड़ी कसौटी
सरकार ने नियुक्तियों और रोजगार सृजन को प्राथमिकता देने की बात कही। मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना के माध्यम से स्वरोजगार के लिए ऋण देने का कार्यक्रम भी चलाया गया। 2023 के एक सरकारी विवरण में इस योजना के तहत 902 लाभार्थियों को लगभग 37.92 करोड़ रुपये के ऋण की स्वीकृति की जानकारी दी गई।

फिर भी झारखंड के लिए रोजगार का प्रश्न सबसे कठिन प्रश्नों में बना हुआ है। सरकारी नौकरियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन राज्य की युवा आबादी के लिए पर्याप्त निजी रोजगार, औद्योगिक रोजगार और स्थानीय उद्यमिता का विस्तार उससे कहीं बड़ी चुनौती है।

बिजली और बुनियादी सुविधाएं
सरकार ने 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली और पुराने बिजली बिलों के बकाये में राहत की घोषणा की।

यह गरीब परिवारों के लिए प्रत्यक्ष राहत का माध्यम है। दूसरी तरफ झारखंड जैसे राज्य के लिए बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल मुफ्त बिजली से नहीं बल्कि उत्पादन, वितरण व्यवस्था, लाइन लॉस, नियमित आपूर्ति और बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति से भी होना चाहिए।

तो आखिर क्या बदला?
हेमंत सोरेन सरकार के पहले कार्यकाल की सबसे स्पष्ट दिशा ’’कल्याणकारी राज्य के विस्तार’’ की रही। पेंशन का विस्तार, कृषि ऋण माफी, छात्रवृत्ति, किशोरियों के लिए सहायता, स्कूल ऑफ एक्सीलेंस, ग्रामीण प्रशासन तक पहुंच और स्वरोजगार योजनाएं इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

सरकार की दूसरी महत्वपूर्ण पहचान झारखंड की ’’आदिवासी और स्थानीय सामाजिक संरचना को केंद्र में रखकर नीतियां बनाने’’ की रही। यह राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

फिर भी तस्वीर का दूसरा हिस्सा सामने रखना जरूरी है। झारखंड की मूल समस्याएंकृस्थायी रोजगार, गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, सिंचाई, ग्रामीण आय, औद्योगिक विविधीकरण, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक क्षमताकृइतनी बड़ी हैं कि कुछ कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि राज्य की विकास संबंधी सभी समस्याओं का समाधान हो गया।

इसलिए हेमंत सरकार के पहले कार्यकाल का निष्पक्ष निष्कर्ष शायद यही होगा कि उसने ’’राज्य की कल्याणकारी प्राथमिकताओं को बदला और सरकारी सहायता का दायरा बढ़ाया’’, लेकिन आर्थिक अवसरों और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में उसी अनुपात में संरचनात्मक परिवर्तन हुआ या नहीं, यह प्रश्न अभी खुला है।

आखिरकार किसी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि योजनाओं की संख्या नहीं होती। उपलब्धि तब मानी जाएगी जब झारखंड का गरीब नागरिक यह कह सके कि ’’सरकार की वजह से उसकी आय बढ़ी, उसके बच्चे बेहतर पढ़े, उसका इलाज बेहतर हुआ और उसके परिवार का भविष्य पहले से अधिक सुरक्षित हुआ।’’ हेमंत सरकार के पिछले पांच वर्षों का वास्तविक मूल्यांकन इसी अंतिम कसौटी पर होना चाहिए।

नोट : यह आलेख का प्रथम किस्त है। अगले किस्त में हमलोग हेमंत सरकार के तीसरे कार्यकाल की बात करेंगे।

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